जलवायु परिवर्तन पर COP26 बैठक में अब तक लिए गए फ़ैसले

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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बीते दो हफ़्ते से ब्रितानी शहर ग्लासगो में जारी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन COP26 अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है.

भारतीय समयानुसार, शुक्रवार रात 11:30 बजे ये सम्मेलन ख़त्म हो सकता है.

दुनिया के तमाम राजनेताओं ने पिछले दो हफ़्तों से जारी इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ज़रूरी उपाय करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है.

लेकिन इसके बावजूद आशंकाएं जताई जा रही है कि ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना संभव नहीं होगा.

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आशंकाओं के बादल

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने बीते शुक्रवार समाचार एजेंसी एपी से बात करते हुए कहा है कि ये लक्ष्य पहले से ही "जीवन रक्षक" प्रणाली पर था.

उन्होंने कहा कि ये संभव है कि इस सम्मेलन में सरकारें कार्बन उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती करने के लिए राज़ी न हों.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर दिया गया तो हमारी दुनिया जलवायु परिवर्तन के सबसे ख़राब प्रभावों से बच सकती है.

साल 2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए एक ऐसे ही सम्मेलन में वैश्विक नेताओं ने संकल्प लिया था कि दुनिया के तापमान में 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि रोकने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती की जाएगी.

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नवीनतम आकलन की बात करें तो दुनिया के तापमान में अब 2.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने जा रही है.

इसके प्रभाव की कल्पना करने के लिए आप ये समझ सकते हैं कि अगर मात्र दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई तो दुनिया भर में मौजूद कोरल रीफ़ ख़त्म हो जाएंगी.

संयुक्त महासचिव ने कहा है कि सरकारों द्वारा उत्सर्जन कम करने के वादों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सरकारें लगातार जीवाश्म ईंधन में निवेश करना जारी रखा.

उन्होंने कहा, "वादों का कोई मतलब नहीं हैं क्योंकि जीवाश्म ईंधन उद्योग को अभी भी कई ट्रिलियन डॉलर की सरकारी सब्सिडी दी जा रही है."

गुटेरेस ने ग्लासगो में अब तक किए गए वादों को "नाकाफ़ी" बताते हुए कहा है कि "हमें पता है कि क्या करना चाहिए"

लेकिन उन्होंने कहा है कि उम्मीद "आख़िरी पल तक" बनी हुई.

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शुक्रवार को क्या हो सकता है?

सीओपी26 में तैयार किए गए मसौदे में सरकारों को पहले से तेज़ गति से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की बात की गयी है.

लेकिन इसके साथ ही ये मसौदा सरकारों की ओर से जीवाश्म ईंधन एवं कोयले आदि के प्रयोग को कम करने के संकल्प को कमज़ोर करता हुआ दिखता है.

इस डील में देशों से अपील की गयी है कि वे जलवायु परिवर्तन का सामना करने में आर्थिक रूप से कमज़ोर देशों की मदद करें.

इस डील से जुड़ी शर्तों और देशों की प्रतिबद्धताओं आदि को लेकर चर्चा-परिचर्चा शुक्रवार देर शाम तक चल सकती है.

वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर दुनिया के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़त को रोका जा सके तो जलवायु परिवर्तन के सबसे ख़तरनाक प्रभावों से बचा जा सकता है.

ये पेरिस समझौते का मुख्य बिंदु है जिस पर दुनिया के ज़्यादातर देश राज़ी हुए थे.

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए साल 2030 तक दुनिया के वैश्विक उत्सर्जन में 45 फ़ीसदी की कम लाने की ज़रूरत है. और साल 2050 तक दुनिया का वैश्विक उत्सर्जन पूरी तरह ख़त्म करना शामिल है.

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क्लाइमेट फाइनेंस मुद्दे पर विवाद जारी

बीते बुधवार जारी हुए इस मसौदे के दूसरे संस्करण को 'कवर डिसीज़न' का नाम दिया गया है.

इस मसौदे की शर्तों को लेकर अभी भी देशों के प्रतिनिधि बातचीत कर रहे हैं.

लेकिन क्लाइमेट फाइनेंस एक ऐसा मुद्दा है जिसे लेकर विवाद बना हुआ है.

क्लाइमेट फाइनेंस का मतलब ये है कि दुनिया के धनी देशों को दुनिया के ग़रीब देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में आर्थिक मदद करनी है.

इस पर विवाद इसलिए है क्योंकि दुनिया के विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं जबकि विकासशील देश जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं.

क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, सीओपी26 में जो कुछ भी संकल्प किए गए हैं, उनके बावजूद ये दुनिया अभी भी 2.4 डिग्री सेल्सियस की ओर बढ़ रही है.

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सीओपी26 में अब तक क्या तय हुआ है?

अमेरिका और चीन ने चौंकाने वाले समझौते की घोषणा करते हुए इस दशक में वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए साथ काम करने की घोषणा की है.

अमेजन के वर्षावनों वाले देश ब्राज़ील समेत 100 से ज़्यादा देशों ने साल 2030 तक वनों की कटाई रोकने और नए पेड़ लगाने का वादा किया है.

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने साल 2030 तक ग्रीन हाउस गैस मीथेन के उत्सर्जन को कम करने के लिए वैश्विक साझेदारी की घोषणा की है. वायुमंडल में मीथेन की कटौती को ग्लोबल वॉर्मिंग को तेजी से कम करने की दिशा में एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है.

दुनिया के चालीस से ज़्यादा देशों ने कोयले का इस्तेमाल कम करने का संकल्प लिया है लेकिन अमेरिका और चीन जैसे देश जो सबसे ज़्यादा कोयले का इस्तेमाल करते हैं, वे इस संकल्प से दूर रहे.

विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन का सामना करने और इससे होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए नए आर्थिक कोष बनाने की घोषणा हुई है. लेकिन कई पक्ष मानते हैं कि ये काफ़ी नहीं है.

एक गठबंधन बनाया गया है जो दुनिया के तमाम देशों को तेल एवं गैस का प्रयोग बंद करने की तारीख़ तय करने एवं तेल एवं ईंधन की खोज के लिए नए लाइसेंस जारी नहीं करने के लिए संकल्पित करता है.

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