COP26: जलवायु परिवर्तन से विकलांग लोगों के लिए बढ़ती चुनौती

इसराइल की मंत्री काराइन एलहरर

इमेज स्रोत, PA Media

इमेज कैप्शन, इसराइल की मंत्री काराइन एलहरर को उम्मीद है कि आने वले वक्त में सम्मेलनों में विकलांगों के लिए बेहतर सुविधाएं मिलेंगी.
    • Author, केइली बेकर
    • पदनाम, बीबीसी आउच

जलवायु में हो रहे बदलाव को लेकर हो रहे सीओपी26 शिखर सम्मेलन के दौरान इसराइल की मंत्री काराइन एलहरर सुर्ख़ियों में आ गईं. ऐसा इसलिए क्योंकि व्हीलचेयर के लिए बेहतर इंतज़ाम न होने के चलते वो इस सम्मेलन में शामिल नहीं हो सकीं. काराइन विकलांग होने के कारण व्हीलचेयर से ही चलती हैं.

दूसरे विकलांग लोगों के लिए उनका इस सम्मेलन में शरीक न हो पाने की घटना, वैसा ही अनुभव है जैसा वो खुद अनुभव करते हैं. कई विकलांगों को अक्सर ये महसूस होता है कि उनकी शारीरिक चुनौतियों के कारण उन्हें जलवायु में हो रहे बदलाव जैसे मसलों पर होने वाली बातचीत से दूर कर दिया जाता है या फिर वो ऐसी चर्चा में पीछे छूट जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अनुसार, विकलांग लोग अभी भी "आपदा से बुरी तरह प्रभावित" लोगों में होते हैं. चाहे जंगल की आग हो या बाढ़, जलवायु संकट के कारण ऐसी आपदाओं की आशंका काफी बढ़ गई है.

आख़िर विकलांग लोग जलवायु में हो रहे बदलाव से इतने प्रभावित क्यों हैं और हम इसके लिए क्या कर सकते हैं?

मैकगिल यूनिवर्सिटी के जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर सेबेस्टियन जोडोइन

इमेज स्रोत, Professor Sébastien Jodoin

इमेज कैप्शन, मैकगिल यूनिवर्सिटी के जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर सेबेस्टियन जोडोइन

हीटस्ट्रोक और डीहाइड्रेशन की समस्या

जुलाई 2018 में कनाडा का मॉन्ट्रियल लू की तगड़ी चपेट में आ गया. कई दिनों तक वहां का तापमान 35.5 सेल्सियस (95.9 फारेनहाइट) तक बढ़ा रहा. अस्पताल हीटस्ट्रोक के मरीज़ों से पट गए और 61 लोग इससे मारे गए. इनमें से एक चौथाई को स्कित्ज़ोफ्रेनिया की बीमारी थी.

मैकगिल यूनिवर्सिटी के जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर सेबेस्टियन जोडोइन को मल्टीपल स्केलेरोसिस (एक प्रकार का मनोरोग) की समस्या है और वो मानवाधिकार, विकलांगता और जलवायु संकट के संबंधों का अध्ययन करते हैं.

वो बताते हैं कि स्कित्ज़ोफ्रेनिया के कई मरीज़ अपने इलाज के लिए एंटी-साइकोटिक दवा लेते हैं. इससे दवा लेने वाले मरीज़ों की गर्मी झेलने की सहनशीलता कम हो जाती है. इससे शरीर में पानी के काफी कम हो जाने का ख़तरा बढ़ जाता है, जो मरीज़ों के लिए घातक हो सकता है.

प्रोफेसर जोडोइन का कहना है कि अधिकारियों और जोखिम वाले समूहों के बीच संवाद की कमी है जो ऐसे हालात को और गंभीर बना देती है.

वो कहते हैं, "जो लोग स्कित्ज़ोफ्रेनिया से पीड़ित हैं, उनका सामाजिक जुड़ाव कम होता है और वे ज्यादा ग़रीब होते हैं. इसलिए जलवायु में हो रहे बदलाव की चपेट में विकलांगों के आने की आशंका भी ज्यादा होगी.''

जलवायु में हो रहे बदलाव से गर्म और शुष्क मौसम का ख़तरा बढ़ जाता है. इससे लू चलने और जंगल में आग लगने की आशंकाएं बहुत अधिक हैं. वातावरण के गर्म रहने पर बहुत अधिक बारिश होने और बाढ़ आने की आशंका भी बढ़ जाती है.

प्रोफेसर जोडोइन कहते हैं कि मॉन्ट्रियल में जो हुआ वो आने वाले वक़्त का एक उदाहरण भर है.

2019 में कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में लगी आग

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 2019 में कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में लगी आग को फैलने से रोकने के लिए कंपनियों ने बिजली की आपूर्ति लोगों को बिन बताए ही रोक दी. इससे कई मरीज़ों की मौत हो गई.

बिजली आपूर्ति ठप्प होने का विकलांगों पर असर

2019 में कैलिफ़ोर्निया में कई बार बिजली की आपूर्ति ठप्प हो गई. वो इसलिए कि जंगल की आग फैलने से रोकने के लिए कंपनियों ने बिजली की आपूर्ति रोक दी.

उत्तरी कैलिफ़ोर्निया के सांता रोजा के गेराल्ड निमी सालों से फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे थे. सांस लेने के लिए वो ऑक्सीजन वेंटिलेटर पर निर्भर थे. लेकिन जब बिजली गुल हो गई तो उनका वेंटिलेटर भी बंद हो गया. वो और उनकी पत्नी ने चालू वेंटिलेटर की खूब खोज की, लेकिन उसका जुगाड़ करने में वे नाकाम रहे. इसका नतीजा ये रहा कि दो दिन बाद गेराल्ड निमी की मौत हो गई.

बिजली की आपूर्ति करने वाली कंपनी पैसिफिक गैस एंड इलेक्ट्रिक ने बाद में माना कि आपूर्ति बंद करने से पहले उनकी कंपनी सैकड़ों मरीज़ों सहित हज़ारों ग्राहकों को सूचित करने में नाकाम रही.

जंगल में आग लगने के दौरान कैलिफ़ोर्निया के कई विकलांगों को अपने घरों से भागने में कठिनाई हुई. जो भागने में सफल रहे, उन्होंने पाया कि पानी, बाथरूम और सुरक्षित स्थान मुहैया कराने वाले कई आपातकालीन केंद्रों तक पहुंचने में वे नाकाम थे.

जर्मनी के सिंजिग शहर में विकलांगों की देखरेख करने वाले एक घर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इस साल जर्मनी के सिंजिग शहर में विकलांगों की देखरेख करने वाले इस घर में अचानक आई बाढ़ की चपेट में आकर यहां रह रहे 12 विकलांगों की मौत हो गई.

बाढ़ में विकलांगों को होने वाली समस्याएं

इस गर्मी में, जर्मनी के सिंजिग शहर में विकलांगों की देखरेख करने वाले एक घर में रह रहे 12 विकलांगों की बाढ़ की चपेट में आकर मौत हो गई. अचानक पानी बढ़ जाने पर ये लोग उस घर से निकल पाने में नाकाम रहे. वैज्ञानिकों और नेताओं ने इस बाढ़ का कारण जलवायु परिवर्तन को बताया है.

ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक और शोध करने वाले डॉ. चार्ल्स विलियम्स को स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) की समस्या है. वो कहते हैं, "व्हीलचेयर पर चलने के कारण बाढ़ आने पर मैं रबड़ की डिंगी (एक तरह की नाव) में सवार नहीं हो सकता."

डॉ. चार्ल्स विलियम्स

इमेज स्रोत, Dr Charles Williams

इमेज कैप्शन, डॉ. चार्ल्स विलियम्स

2005 में न्यू ऑरलियन्स में कैटरीना तूफान के आने पर ऐसी ही कहानियां सुनने को मिली थीं. उस तूफान से वहां भयंकर बाढ़ आई थी. अमेरिका की नेशनल काउंसिल ऑन डिसएबिलिटीज़ की एक रिपोर्ट में पाया गया कि विकलांगों को मदद हासिल करने में काफी संघर्ष करना पड़ा.

लोगों को निकालने में जुटी अधिकांश बसों में व्हीलचेयर लिफ़्ट नहीं थी. कई आपातकालीन ठिकाने विकलांगों के लिए दुर्गम थे. वहीं देखने और सुनने में अक्षम लोग स्थानीय सुरक्षा जानकारी प्राप्त करने से लाचार थे.

पिछले 50 सालों में कैटरीना तूफान जैसी मौसमी आपदाएं पांच गुना बढ़ गई हैं. ऐसे में विकलांगों को बेहतर तरीके से मदद करने के लिए क्या करने की आवश्यकता है?

प्लास्टिक स्ट्रॉ

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, प्लास्टिक के मुड़ने वाले स्ट्रॉ उनके लिए काफी ज़रूरी होते हैं, जो एक कप भी नहीं उठा सकते. लेकिन ऐसे लोगों के बारे में बिना सोचे इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

नए क़ानून बनाते वक़्त विकलांगों की अनदेखी

डिसेबल्ड पीपल अगेंस्ट कट्स (डीपीएसी) के ऐंडी ग्रीन का मानना ​​​​है कि जलवायु में हो रहे बदलाव पर होने वाली चर्चा में विकलांगों के अधिक शरीक होने की ज़रूरत है. ख़ासकर तब जब नए क़ानून बनाए जाते हों.

ग्रीन का कहना है कि सरकारें अक्सर विकलांगों पर क़ानून के पड़ने वाले असर की अनदेखी करती हैं. उदाहरण के तौर पर प्लास्टिक से बने स्ट्रॉ पर लगे क़ानूनी प्रतिबंध को ही ले लें.

सर डेविड एटनबरो की एक डॉक्यूमेंट्री से पता चला कि कैसे माल ढोने वाले जहाज़ों से समुद्र में कचरा फैल रहा है. उसके बाद काफी हंगामा होने पर एक ही बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक स्ट्रॉ पर प्रतिबंध लगाने वाला क़ानून बना दिया गया.

सर डेविड एटनबरो
इमेज कैप्शन, ब्लू प्लैनेट II डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले सर डेविड एटनबरो

नए क़ानून में स्वास्थ्य समस्याओं के चलते प्लास्टिक स्ट्रॉ का उपयोग करने वालों को इसके उपयोग से छूट मिली है. हालांकि ग्रीन कहते हैं कि अभी भी कई विकलांग इस क़ानून का नुकसान झेल रहे हैं. वो इसलिए कि कोई चीज पीने के लिए वो प्लास्टिक स्ट्रॉ पर निर्भर हैं.

प्लास्टिक स्ट्रॉ के अन्य विकल्प जैसे धातु या पास्ता स्ट्रॉ कड़े होते हैं और पीने वाले को नुकसान पहुंचा सकते हैं. उदाहरण के लिए, उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान के हाथ फिसल या ऐंठ सकते हैं. वहीं कागज के बने स्ट्रॉ बर्बाद हो जाते हैं. इसलिए मुड़ने वाले प्लास्टिक स्ट्रॉ उनके लिए अहम हैं, जो कप भी नहीं उठा सकते.

वो कहते हैं, "स्ट्रॉ का उपयोग करने वाले विकलांगों की संख्या काफी कम है. लेकिन इस प्रतिबंध का वास्तविक असर उन्हीं पर पड़ता है.'' उनका मानना ​​है कि विकलांगों को भुला देने और उनके पीछे छूटने का ये एक और उदाहरण है.

इस तरह का भेदभाव बताने के लिए अब "पारिस्थितिकी-सक्षमता" शब्द का प्रयोग किया जा रहा है. ये फ़ैसला लेने वालों की उन नाकामियों के बारे में बताता है, जब वो कोई ऐसा निर्णय लेते हैं जिससे विकलांगों की दिक्कतें और बढ़ जाती हैं. जैसे साइकिल लेन बनाने के लिए विकलांगों की पार्किंग की जगह को हटाने का फ़ैसला लिया जाए.

ग्लासगो में हो रहे में क़रीब 200 देश शामिल

इमेज स्रोत, Getty Images

अब आगे क्या होगा?

सीओपी26 में साथ-साथ होने वाले कुछ कार्यक्रमों में विशेष रूप से विकलांगता और जलवायु में हो रहे बदलाव पर विचार होना है. एक कार्यक्रम में जलवायु अनुकूल शहरों के लिए समावेशी डिजाइनों पर चर्चा होनी है. वहीं दूसरे कार्यक्रम में जलवायु में हो रहे बदलाव का विकलांगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव पर बातचीत की जाएगी.

प्रो जोडोइन कहते हैं कि सरकारें अक्सर "विकलांग लोगों की ख़ास ज़रूरतों" के बारे में नहीं सोचतीं. लेकिन वो सीओपी26 सम्मेलन को "विकलांगों के अधिकारों को आगे बढ़ाने के अवसर" के रूप में देखते हैं.

इस बारे में डॉ. विलियम्स कहते हैं, "जलवायु में हो रहे बदलाव से निपटने के लिए आशावान होने के कारण हैं." उनका कहना है कि निजी और राजनीतिक स्तर पर बदलाव लाने के लिए अब तक "प्रेरणा और इच्छाशक्ति की साफ कमी" रही है.

वो कहते हैं, "ये केवल वक़्त ही बताएगा कि इन नज़रियों में बदलाव होगा या नहीं. हालांकि पिछले 10 सालों में नाटकीय बदलाव देखने को मिला है, जिसे बरकरार रखने की ज़रूरत है."

वीडियो कैप्शन, जलवायु परिवर्तन: चाय के बाग़ानों में बिगड़ रहे हैं हालात

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)