COP26: बांग्लादेश की एक महिला की ज़िंदगी पर जलवायु सम्मेलनों से क्या फ़र्क़ पड़ा?

शोरबानो ख़ातून
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    • Author, डेविड शुकमैन
    • पदनाम, साइंस एडिटर, बीबीसी न्यूज़

बांग्लादेश में गबुरा में रह रहे लोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले हर संभव ख़तरे को सह रहे हैं.

तटीय सुरक्षा को बर्बाद करते तूफ़ान हैं, और समुद्र का बढ़ता स्तर ख़ारे समुद्री पानी को लोगों के कुओं और खेतों में धकेल रहा है.

बांग्लादेश जलवायु परिवर्तन के कारण बेहद ख़राब मौसम से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में से एक है, और यहां के कमज़ोर समुदाय को लोग ठीक उसी ख़तरे में जी रहे हैं जिसे भविष्य में होने से रोकने के लिए ग्लासगो में COP26 जलवायु सम्मेलन किया जा रहा है.

इसके अलावा गरीब देशों के लिए वित्तीय मदद देने के वादे की हक़ीकत भी ये गांव बयां कर रहा है. दुनिया के अमीर देशों का गरीब देशों से किया गया वादा, जो 12 सालों बाद भी अधूरा है.

शोरबानो ख़ातून की कहानी बताती है कि कैसे अंतराष्ट्रीय पहल जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने में अब तक नाकाम रही है.

साल 2009 में मेरी मुलाकात शोरबानो से हुई, उस वक़्त गबूरा एक चक्रवात के बाद पैदा हुए हालात से जूझ रहा था.

वह अपने चार बच्चों के साथ एक ऊँची संकरी पहाड़ी पर बने एक अस्थायी शिविर में रह रही थीं, जो लगभग 5,000 लोगों के लिए एकमात्र सुरक्षित जगह थी.

जलवायु परिवर्तन
इमेज कैप्शन, जलवायु परिवर्तन के कारण गांव की दुर्दशा

बांग्लादेश से डेनमार्क तक का सफ़र

गांव की दुर्दशा और जलवायु परिवर्तन से पीड़ित सभी विकासशील देशों की हालत को दुनिया के सामने लाने के लिए- ऑक्सफैम ने शोरबनो को वैश्विक मंच पर अपना पक्ष रखने का मौका दिया.

दिसंबर, 2009 में वह एक लंबा सफ़र तय करके डेनमार्क की राजधानी कोपेहेगन में होने वाले COP15 जलवायु कॉन्फ्रेंस में पहुंचीं. अभी इसी कॉन्फ़्रेंस का 26वां संस्करण चल रहा है.

जब मैंने उनसे पूछा कि इतने बड़े आयोजन में शामिल होकर उन्हें क्या मिला तो जवाब मिला 'कोपेनहेगन'. यानी उन्हें डेनमार्क की राजधानी कोपेहेगन में आकर बेहतरी की उम्मीद जगी.

उन्होंने कहा, '' इन सभी बड़े लोगों के साथ मंच साझा करना अच्छा लगा. ''

वह नेताओं को सुन कर उत्साहित लग रही थी.

जब शोरबानो कोपेहेगन में थीं तो अमीर देशों ने ग़रीब देशों से वादा किया कि वे साल 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर देंगे ताकि ये देश जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपट सकें.

उस समय, इसे एक बड़े प्रस्ताव के रूप में देखा गया क्योंकि इसने विकासशील देशों को संकेत दिया कि उनकी जरूरतों और नुकसानों को गंभीरता से लिया जा रहा है.

लेकिन आज 12 साल बाद ये लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, और जिस तरह के हालात हैं,इसे पूरा होने में 2023 तक का समय लगेगा.

'हर तरफ़ पानी ही पानी'

शोरबानो और गबुरा के लोगों तक सहायता तो पहुंची है, लेकिन ये सहायता कोपेनहेगन में किए गए वादे के आस-पास भी नहीं टिकती, जो शोरबानो और गबुरा को सहायता मिली है, उसका अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश में ही जुटाया गया.

पानी

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इमेज कैप्शन, पीने के पानी का संकट झेल रहे गुबरा के लोग

मदद में मिट्टी के तटबंधों को मज़बूत करने के लिए रेत के थैलों जैसी मदद भी दी गई लेकिन तूफ़ान में ये थैले किसी काम नहीं आते.

गांव में एक नया स्कूल बनाया गया है और, जब चक्रवात आते हैं, तो स्कूल एक शरणस्थली में तब्दील कर दिया जाता है.

लेकिन हर वक़्त समुद्र के मिलीमीटर दर मिलीमीटर बढ़ने और ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से यहां स्थानीय कुएं दूषित हो चुके हैं, इनमें समुद्र का खारा पानी आ चुका है. ऐसे में यहां पीने के पानी की समस्या बढ़ चुकी है.

शोरबानो कहती हैं, '' हमारे चारो तरफ़ पानी ही पानी है लेकिन ये हमारे किसी काम का नहीं है, हम एक गंभीर संकट से जूझ रहे हैं. ''

यहां पीने के पानी के लिए सबसे नज़दीक स्रोत भी एक मील से भी अधिक दूर है.

पानी का स्रोत चैरिटी संस्था ऑक्सफ़ैम ने बनाया है. ये सौर ऊर्जा से चलने वला एक संयंत्र है लेकिन उस तक पहुँचने के लिए लोगों को भीषण गर्मी में हर दिन एक मील की दूरी तय करना पड़ता है.

कई लोग जो आस-पास के पानी के स्रोतों को इस्तेमाल करते रहे, उन्हें प्रदूषित पानी के कारण त्वचा संबंधी बिमारियां हो गईं. खास कर महिलाओं के ऐसे पानी को इस्तेमाल करने के कारण उनमें संक्रमण के मामले भी सामने आए.

शोधकर्ता इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या ये खारा पानी पी कर यहां रहने वाली महिलाओं में गर्भपात के मामले बढ़े हैं?

शोरबानो, अब 44 साल की हैं और पहले से कहीं अधिक चिंतित और हताश लगती हैं.

वह कहती हैं, "हमें नहीं पता कि हम क्या कर सकते हैं. अगर लोग हमारी मदद करते हैं, तो शायद कुछ बदल सकता है.''

"हमारे पास दूसरी जगहों पर जाने के लिए पैसे नहीं हैं. मेरे पास अपने बच्चों को देने के लिए कुछ भी नहीं है."

2009 में आइला तूफ़ान के एक साल बाद गबुरा के एक तटबंध पर आसरा लिए ग्रामीण

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इमेज कैप्शन, 2009 में आइला तूफ़ान के एक साल बाद गबुरा के एक तटबंध पर आसरा लिए ग्रामीण

उनका एक बेटा अब झींगे के खेत में नौकरी करता है. यह इस इलाके में एक बढ़ता हुआ उद्योग है क्योंकि इसमें खेतों को तालाबों में बदल दिया जाता है. लेकिन यहां स्थानीय रूप से उगाए जाने वाले अनाज की भीषण कमी हो चुकी है और इसके कारण कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.

शोरबानो अपनी कहानी पढ़ने वालों से सबसे ज्यादा क्या चाहती हैं? खासकर ग्लासगो में वार्ता के नतीजे तय करने वाले नेताओ से उनकी क्या उम्मीद है?

वह एक मजबूत तटबंध चाहती है, जो इतनी आसानी से नष्ट न हो, और आसानी से पीने के लिए पानी की उपलब्धता चाहती हैं.

लेकिन इन सबसे ऊपर वो दुनिया के नेताओं से कार्रवाई की उम्मीद कर रही हैं.

वह कहती हैं, '' हमने बहुत कुछ सहा है. हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों और पोते-पोतियों को और अधिक सहना पड़े."

डेविड शुकमैन जलवायु परिवर्तन पर बीते 20 साल से रिपोर्टिंग कर रहे हैं और बतौर रिपोर्टर वह 10वीं बार COP सम्मेलन कवर कर रहे हैं.

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