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COP26 में बोले मोदी, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है जलवायु परिवर्तन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो में आयोजित हो रही सीओपी26 में कहा है कि भारत जैसे विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है.
लाइव कवरेज
पवन सिंह अतुल, कमलेश मठेनी and अनंत प्रकाश
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को याद आया एक ख़त्म हो चुका कस्बा

इमेज कैप्शन, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने ग्लासगो में जारी सीओपी26 सम्मेलन में एक कनाडाई कस्बे की कहानी सुनाते हुए जलवायु परिवर्तन के ख़तरों की ओर ध्यान खींचा.
उन्होंने कहा, “कनाडा में एक कस्बा था जिसका नाम लिटन था. मैं कह रहा हूं कि ‘एक कस्बा था’ क्योंकि बीती 30 जून को ये कस्बा जलकर खाक हो गया. इससे पहले तापमान 49.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था. ये हमारे देश में दर्ज किया गया सबसे ज़्यादा तापमान था.
कनाडा शेष दुनिया के मुकाबले औसतन दोगुनी दर से गर्म हो रहा है. और हमारा उत्तरी हिस्सा तीन गुनी दर से गर्म हो रहा है. इसमें विज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है. हमें और ज़्यादा और जल्दी करना चाहिए.”
COP26 में बोले मोदी, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है जलवायु परिवर्तन

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो में आयोजित हो रही सीओपी26 में कहा है कि भारत जैसे विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है.
उन्होंने कहा, "दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रही चर्चा में अनुकूलन (एडेप्टेशन) को उतना महत्व नहीं मिला है जितना प्रभाव कम करने को (मिटिगेशन) को मिला है. यह उन विकासशील देशों के साथ अन्याय है जो जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित हैं."
"भारत समेत जितने विकासशील देश जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है. फसल से जुड़े पैटर्न में बदलाव आ रहा है. असमय बारिश और बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है."
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उन्होंने कहा कि “इस मामले में मेरे तीन विचार हैं, हमें एडेप्टेशन को अपनी विकास नीतियों और परियोजनाओं का एक अभिन्न अंग बनाना होगा.
भारत में नल से जल, स्वच्छ भारत मिशन और उज्जवला जैसी परियोजनाओं से हमारे जरूरतमंद नागरिकों को अनुकूलन लाभ तो मिले ही हैं, उनके जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है.
कई पारंपरिक समुदायों में प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का ज्ञान है. हमारी अनुकूलन नीतियों में इन्हें उचित महत्व मिलना चाहिए. स्कूल के पाठ्यक्रम में भी इसे जोड़ा जाना चाहिए
अनुकूलन (अडपटेशन) के तरीके चाहे लोकल हों पिछड़े देशों को इसके लिए ग्लोबल सहयोग मिलना चाहिए.
लोकल अडपटेशन के लिए ग्लोबल सहयोग के लिए भारत ने कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिस्टेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की शुरूआत की थी. मैं सभी देशों को इस पहल से जुड़ने का अनुरोध करता हूं."
बाइडन बोले, हममें से कोई भी उन बुरे हालातों से अपने आपको नहीं बचा पाएगा...

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सीओपी26 में कहा है कि “हममें से कोई भी उन बुरे हालातों से अपने आपको नहीं बचा पाएगा, अगर हम इस मौके का फायदा नहीं उठा सके."
बाइडन ने कहा है कि ये एक बेहद अहम दशक है और अमेरिका 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन में एक गीगा-टन से भी ज़्यादा की कमी लाएगा.
लेकिन अमेरिका के सामने एक बड़ी ज़िम्मेदारी है क्योंकि इस समय दुनिया में सिर्फ चीन अमेरिका से ज़्यादा कार्बन का उत्सर्जन करता है.
साल 2019 में अमेरिका ने 5,107 मेगाटन कार्बन का उत्सर्जन किया था.
ऐतिहासिक रूप से भी अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार रहा है.
अवर वर्ल्ड इन डाटा से मिले आंकड़ों के मुताबिक़, अमेरिका ने 1750 के बाद से 410 अरब टन कार्बन का उत्सर्जन किया है जो कि चीन द्वारा उत्सर्जित कार्बन से दोगुना है.
बारबडोस की प्रधानमंत्री बोलीं, द्वीपीय देशों के लिए मृत्युदंड जैसी है 2 डिग्री की बढ़ोतरी

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इमेज कैप्शन, बारबडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ब्रिटेन के ग्लासगो में जारी सीओपी26 में अलग-अलग देश अपने आपको जलवायु परिवर्तन से होने वाले ख़तरों से दुनिया को अवगत करा रहे हैं.
इनमें से कई देश ऐसे हैं जो कि जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा हो रहे ख़तरों के चलते अस्तित्व संकट झेल रहे हैं.
बारबडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ने बताया है कि द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ते समुद्री जलस्तर और गंभीर पर्यावरणीय घटनाओं जैसे समुद्री तूफान आदि का ख़तरा झेल रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हम 1.5 डिग्री सेल्सियस पर जी सकते हैं लेकिन दो डिग्री हमारे लिए मृत्युदंड की तरह है. हम ये मृत्युदंड नहीं चाहते हैं और यहां यही कहने के लिए आए हैं कि ‘ज़्यादा कोशिश’ की जाए."
दूसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक अमेरिका पर होंगी दुनिया की नज़रें

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जलवायु परिवर्तन के संबंध में कार्बन उत्सर्जक देशों चीन और भारत को लेकर काफ़ी चर्चाएं हो रही है लेकिन ग्लासगो में कुछ लोगों की नज़रें दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश अमेरिका पर भी होंगी.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी इस मुद्दे पर बजट से जुड़े एक अधिनियम के माध्यम से एक बड़े निवेश की योजना बना रही है. लेकिन इस बिल पर कांग्रेस (अमेरिकी संसद) में मतदान होना है और इस अधिनियम में शामिल चीजों को लेकर बातचीत जारी है.
लंदन स्थित एसओएएस यूनिवर्सिटी से जुड़ीं अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जानकार डॉ लेसली विंजामुरी मानती हैं कि ये संभव है कि बाइडन के बिल को अंतिम रूप न मिल पाए लेकिन अगर ये पास होता है तो ये काफ़ी परिवर्तनकारी साबित हो सकता है.
वह कहती हैं कि इस अधिनियम को लेकर जो कुछ बातचीत चल रही है, उसके केंद्र में ये है कि वो कौन सी चीजें जिन्हें निकालकर इस बिल को पास करने के लिए ज़रूरी समर्थन जुटाया जा सकता है.
लेकिन इस बिल में अभी भी 550 अरब अमेरिकी डॉलर हैं जिसमें सोलर और विंड पॉवर के लिए टैक्स क्रेडिट, और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में निवेश शामिल है.
अमेरिका में जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के विचार एक जैसे नहीं हैं. बल्कि दोनों पक्षों के विचार एक दूसरे से काफ़ी भिन्न हैं.
ऐसे में राष्ट्रपति बाइडन के लिए इस अधिनियम को पास कराना एक खड़ी चढ़ाई पर चढ़ने जैसा है.
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संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की चेतावनी, हम अपनी कब्रें खोद रहे हैं

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इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनिओ गुटेरेस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनिओ गुटेरेस ने सोमवार को ग्लासगो में कहा है कि जीवाश्म ईंधन की हमारी लत मानवता को विनाश की ओर धकेल रही है.
उन्होंने कहा कि, "अब या तो हम इसे रोक दें या ये हमें रोक दे. अब ये कहने का वक़्त आ गया है कि अब बहुत हो चुका है, खुद को कार्बन से मारने का दौर अब बहुत चल गया, प्रकृति को शौचालय की तरह इस्तेमाल करना बहुत हुआ, बहुत हुआ गहरे और गहरे माइनिंग एवं ड्रिलिंग करते जाना, हम अपनी ही कब्रें खोद रहे हैं."
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COP 26: बोरिस जॉनसन ने दिया जेम्स बॉण्ड का हवाला, कहा-थमने वाली है घड़ी

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इमेज कैप्शन, ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने COP 26 में शामिल होने के लिए ग्लासगो पहुंचे सभी विश्व नेताओं का स्वागत करते हुए उनकी तुलना जेम्स बॉण्ड से की.
उन्होंने कहा कि बॉण्ड फिल्मों में अक्सर हीरो दुनिया ख़त्म करने पर आमादा ताकतों को रोकने के लिए जूझता है.
इसके बाद उन्होंने कहा, “ट्रैजिडी ये है कि ये कोई फ़िल्म नहीं है...प्रलय लाने वाली ये मशीन एक हक़ीकत है.”
उन्होंने कहा कि वैश्विक तापमान में सिर्फ दो डिग्री की बढ़त खाद्य आपूर्ति को ख़तरे में डाल सकती है, तीन डिग्री की बढ़त जंगलों में आग और चक्रवाती तूफानों की घटनाओं में बढ़ोतरी कर सकती. चार डिग्री की बढ़त में हम शहरों से हाथ धोना पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, “हम इसे रोकने की दिशा में कार्रवाई करने में जितनी देर करेंगे, हालात उतने ही बदतर होते जाएंगे. और हम आख़िर में तबाही की वजह से कार्रवाई करने के लिए विवश हो जाएंगे.”
उन्होंने ये भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कार्रवाई करने में हम पहले ही काफ़ी पिछड़ चुके हैं, कुछ वक़्त शेष है और हमें अब कार्रवाई करने की ज़रूरत है.
COP 26: जलवायु संकट के हल के लिए इन चेहरों पर टिकी हैं निगाहें

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करीब दो सौ मुल्कों के 20 हज़ार प्रतिनिधि ग्लास्गो में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले हैं. इसके लिए बड़ी संख्या में जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ, कार्यकर्ता और पत्रकार भी ग्लास्गो में हैं.
लेकिन इस भीड़ में प्रमुख किरदार कौन-कौन हैं -
जो बाइडन
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने, डोनाल्ड ट्रंप के उस फ़ैसले को पलट दिया था जिसमें ट्र्ंप ने पेरिस एग्रीमेंट से अमेरिका को अलग कर लिया था. अब बाइडन ने क्लाइमेंट चेंज के विरुद्ध लड़ाई को अपनी प्राथमिकता बना लिया है. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कार्बन उत्सर्जन के मामले में दूसरे स्थान पर है. बाइडन इस सम्मेलन में अहम रोल अदा कर सकते हैं.
शेई ज़ेनहुआ
शेई क्लाइमेट पर चीन के विशेष दूत हैं. वे इस सम्मेलन में अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. शेई साल 2007 से 2018 तक जलवायु से जुड़े मुद्दों पर हुई वार्ताओं में चीन के प्रमुख वार्ताकार थे. माना जाता है कि पेरिस एग्रीमेंट में भी शेई ने अहम भूमिका निभाई थी. जलवायु परिवर्तन पर चीन जो भी तय करेगा, उसका असर सारी पृथ्वी पर पड़ेगा क्योंकि दुनिया भर में होने वाले कार्बन उत्सर्जन का 28% हिस्सा चीन का ही है.
पेट्रिशिया एस्पिनोसा
इस्पिनोसा मैक्सिको की पूर्व विदेश मंत्री हैं. वे संयुक्त राष्ट्री चीफ़ क्लाइमेंट नेगोशिएटर हैं. वे इस शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने कुछेक महिलाओं में से एक हैं.
नरेंद्र मोदी
चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है. भारत ने न तो अपने ‘नेट-ज़ीरो’ वर्ष की घोषणा की है और न ही संयुक्त राष्ट्र को अपनी अपडेट्ड जलवायु योजना पेश की है.
नेट-ज़ीरो का अर्थ है कि जितना संभव हो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और फिर पृथ्वी पर पेड़ आदि लगाकर या दूसरे क़दम उठाकर संतुलन बनाना.
पेरिस समझौते के तहत हर पांच साल ये योजना जारी करनी होती है. बहुत से जानकारों को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी ग्लास्गो में कुछ ठोस वादे करेंगे.
आलोक शर्मा
ब्रितानी सांसद आलोक शर्मा COP 26 के अध्यक्ष हैं. उनका काम यहां आए प्रतिनिधियों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने के लिए राज़ी करना है.
स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हो रहा COP 26 क्या है और क्यों अहम है?






मुंबई पर जलवायु परिवर्तन का कैसा असर पड़ रहा है?
COP 26 में नेता पहुंचने शुरू, बोरिस जॉनसन ने कहा - बातें नहीं, अब काम हो

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दुनिया भर के नेता धीरे – धीरे ग्लासगो में आयोजित हो रही क्लाइमेट समिट सीओपी26 में भाग लेने पहुंच रहे हैं.
दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के न आने से जहां एक ओर पर्यवेक्षकों में निराशा का भाव है.
माना जा रहा है कि कि ये सम्मेलन दुनिया को जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से बचाने का आख़िरी मौका है.
ऐसे में जलवायु परिवर्तन की सीधे –सीधे मार झेल रहे और अपना अस्तित्व बचाने में लगे तमाम देशों के नेता मांग कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की गति धीमी करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं.
ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी दुनिया के नेताओं से आग्रह किया है कि जलवायु परिवर्तन की दर को धीमा करने के लिए आकांक्षाओं से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है.
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संभावित ख़तरा नहीं अस्तित्व संकट का सवाल
पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में 500 द्वीपों को मिलाकर बने देश पालउ के राष्ट्रपति सुरंगेल व्हिप्स जूनियर भी इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए ग्लासगो पहुंचे हैं.
सुरंगेल व्हिप्स जूनियर इस सम्मेलन में शामिल हो रहे ऐसे कई देशों के नेताओं में शामिल हैं जो हर दिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की वजह से अस्तित्व संकट का ख़तरा झेल रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, पलाउ के राष्ट्रपति सुरंगेल व्हिप्स जूनियर सुरंगेल व्हिप्स जूनियर का द्वीप समुद्री के बढ़ते जलस्तर और टायफून की मार झेल रहा है.
बीबीसी से बात करते हुए सुरंगेल व्हिप्स जूनियर ने बताया है कि उन्हें ग्लासगो सम्मेलन से क्या उम्मीदें हैं.
जूनियर बताते हैं, “हम चाहते हैं कि इस सम्मेलन में शामिल होने वाले लोग ये समझें कि हम अब सिर्फ बात करते हुए नहीं रह सकते. हम नाम मात्र के लिए कदम नहीं उठा सकते. हमें तत्काल प्रभाव से कदम उठाने की ज़रूरत है. और ये कदम प्रभावशाली होने चाहिए.
हमें लक्ष्य तय करने चाहिए, वे लक्ष्य जो एक परिवर्तन लेकर आएं और हम इस बात का दबाव बना रहे हैं कि हम उन लक्ष्यों में से आधे लक्ष्यों की प्राप्ति 2030 तक कर लें जो हमने 2050 के लिए तय किए हैं.
हमें कदम उठाने की ज़रूरत है और हमें तत्काल प्रभाव से कुछ करने की ज़रूरत है. क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेंगे तो ये हमारे विलुप्त होने की बात होगी.
जब ये द्वीप पानी में चले जाएंगे तो आप वो सभ्यता खो देंगे. आप भाषा, और लोगों की पहचान खो देंगे. हमें बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों के कदमों की वजह से विलुप्त नहीं होना चाहिए.”
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जलवायु परिवर्तन से कितना प्रभावित हो रहे हैं असम के चाय बागान
COP 26 सम्मेलन में नहीं होंगे शी जिनपिंग, चीन की प्रतिबद्धता पर उठे सवाल

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दुनिया में सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश चीन के सर्वोच्च नेता राष्ट्रपति शी जिनपिंग ग्लासगो में जारी क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे हैं.
उन्होंने इस कॉन्फ्रेंस के लिए एक लिखित संदेश भेजा है. इसके बाद कुछ लोग जलवायु परिवर्तन के प्रति चीन के समर्पण पर सवाल उठा रहे हैं.
बीजिंग पॉवर प्लांट के बाहर से रिपोर्ट कर रहे बीबीसी के चीन संवाददाता स्टीफ़न मैकडॉनल बताते हैं -
"(आज) हुएनेंग पॉवर स्टेशन के कूलिंग टावरों से भाप निकलती है. कभी यहां पर कोयला जलाकर बिजली बनाई जाती थी. (लेकिन) अब यहां गैस की मदद से टरबाइन चलाई जा रही है.
चीन की राजधानी में अधिकारी बातते हैं कि इस शहर में कोयला जलाकर बिजली का उत्पादन नहीं किया जाता है. लेकिन पड़ोसी राज्यों में ऐसा नहीं है. और चीन कार्बन उत्सर्जन कम करने के अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में काफ़ी चुनौती महसूस कर रहा है.
चीन के नेता शी जिनपिंग ग्लासगो समिट में शामिल नहीं होंगे. यही नहीं, वह कोरोना वायरस फैलने के बाद से किसी भी वजह से चीन से बाहर नहीं गए हैं. लेकिन उनकी ओर से कॉन्फ्रेंस में सिर्फ एक लिखित बयान भेजे जाने की वजह से कुछ पर्यवेक्षकों ने इसकी आलोचना की है.
इसे दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश की ओर से बेहद कम योगदान के रूप में देखा जा रहा है."
FB LIVE: दक्षिण भारत पर जलवायु परिवर्तन का कितना असर, हैदराबाद से लाइव बीबीसी की सुरेखा अब्बुरी...
COP 26 सम्मेलन पर लियोनार्डो डिकैप्रियो ने कहा - हम और वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते

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स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में चल रहे जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में दो सौ देशों के प्रतिनिधि जमा हैं.
इसी COP 26 सम्मेलन पर फ़िल्म स्टार लियोनार्डो डिकैप्रियो ने ये ट्वीट किया -
जलवायु संकट आ चुका है. #COP 26 सम्मेलन लोगों और पृथ्वी ग्रह की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बनना चाहिए. लीडर्स दुनिया आपको देख रही है और आपसे इस इस मौके पर खरा उतरने की उम्मीद कर रही है. हम और वक्त बर्बाद नहीं कर सकते.
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COP 26 सम्मेलन-उद्घाटन भाषण में युद्ध-स्तर पर कार्रवाई का आह्वान करेंगे प्रिंस चार्ल्स

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प्रिंस ऑफ वेल्स आज शाम स्कॉटलैंड में हो रहे COP26 शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे. वे अपने भाषण में कहने वाले हैं कि जलवायु संकट से निपटने के लिए "युद्ध स्तर" पर काम करने की आवश्यकता है.
ग्लासगो में सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रिंस चार्ल्स दुनिया के प्राइवेट सेक्टर के संसाधनों के ज़रिए जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध एक अभियान चलाने का आह्वान करने वाले हैं.
ब्रितानी राजघराने की ओर से चार्ल्स COP 26 सम्मेलन में शामिल होने वाले सबसे वरिष्ठ व्यक्ति होंगे. चार्ल्स स्कॉटलैंड हो रहे सम्मेलन को ‘आख़िरी मौका’ कह चुके हैं.
वे अरसे से पर्यावरणीय मुद्दों को उठाते रहे हैं और आज अपने भाषण में जलवायु परिवर्तन संकट को तुरंत सुलझाने पर ज़ोर दे सकते हैं.
प्रिंस चार्ल्स आज शाम अपने भाषण में कहेंगे, “हमें युद्ध-स्तर पर तैयारी करनी होगी. हमें फ़ौज के तौर-तरीकों वाला अभियान चलाना होगा जिसमें दुनिया के प्राइवेट सेक्टर की ताक़त का भी इस्तेमाल हो सके जिनके पास खरबों डॉलर हैं.”
रविवार को प्रिंस चार्ल्स ने रोम में जी 20 सम्मेलन के दौरान दुनिया के नेताओं को संबोधित किया था.
उन्होंने कहा था, “अपने बीच के भेदभादों को भूलकर, इस अवसर का लाभ उठाते हुए हम सभी को ग्रीन रिकवरी की ओर बढ़ना होगा ताकि दुनिया की अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास आए और हम अपने ग्रह को बचा पाएं.”
जलवायु परिवर्तन: उत्तराखंड क्या तबाही के ढेर पर बैठा है? देखिए ये रिपोर्ट
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COP 26 सम्मेलन: जलवायु परिवर्तन पर क्या कह रहे हैं आम लोग?

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स्कॉटलैंड में दुनिया के नेता इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि विश्व जलवायु संकट से कैसे बचाया जाए. नीचे पढ़िए दुनिया के विभिन्न हिस्सों के लोग जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के बारे में क्या सोचते हैं?




COP 26 सम्मेलन के लिए स्कॉटलैंड में इकट्ठा हुए देशों से क्या हैं उम्मीदें?
वीडियो कैप्शन, Cover Story: COP26 में इकट्ठा होने जा रहे देशों से क्या हैं उम्मीदें? दुनियाभर के वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन का ख़तरा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है.
जलवायु परिवर्तन के ख़तरे पर बात करने के लिए स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में क़रीब 200 देश जमा हो रहे हैं.
ये देश मंथन करेंगे कि इस वैश्विक संकट से कैसे निपटा जाए.
दुनिया का फ़ोकस कार्बन उत्सर्जन कम करने और ग्रीन टेक्नॉल्जी विकसित करने पर है.
लेकिन, इस राह में क्या चुनौतियां हैं और वो कौन सा एजेंडा होगा, जिस पर दुनिया के तमाम देश सहमत होंगे, इसी की चर्चा कवर स्टोरी में.
देखिए इन्हीं चुनौतियों पर बीबीसी हिंदी टीवी की ये ख़ास रिपोर्ट -

