जर्मनी में मतदान: मर्केल के बाद किसके हाथ में होगी जर्मनी की कमान?

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जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल के बाद जर्मनी की कमान किसके हाथ में होगी?
आज चांसलर चुनने के लिए मतदान है. सभी प्रतिद्वंदियों के सामने एक जैसी मुश्किल चुनौती है- आप इतनी बड़ी राजनीतिक शख्सियत की परछाई में अलग कैसे दिखें?
एंगेला मर्केल 16 सालों से जर्मनी की चांसलर के तौर पर देश की राजनीति में हावी रही हैं. सितंबर में होने वाले संघीय चुनावों में उनके उत्तराधिकारी को अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी.
एक नज़र उन राजनेताओं पर जो जर्मनी के अगले चांसलर हो सकते हैं. बर्लिन में बीबीसी संवाददाता डेमियन मैकगिनीज़ ये विश्लेषण पेश कर रहे हैं.
आर्मिन लॉशेट, मध्यपंथी-दक्षिणपंथी सीडीयू/ सीएसयू

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चांसलर पद के लिए लॉशेट सबसे आगे चल रहे थे लेकिन फिर उनका अभियान उनकी अपनी ग़लतियों की वजह से ही पटरी से उतर गया. हालांकि वो पूरी तरह रेस से बाहर नहीं हुए हैं.
60 वर्षीय लॉशेट एंगेला मर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के नेता हैं और जर्मनी की सबसे अधिक आबादी वाले प्रांत नॉर्थ राइन वेस्टफालिया (एनआरडब्ल्यू) के प्रीमियर हैं.
पार्टी की तरफ़ से चांसलर का उम्मीदवार बनने के लिए उन्होंने बावेरिया से आने वाले नेता मार्कस सोडर को बेहद कम अंतर से पछाड़ा है और उम्मीदवारी हासिल की है. इस दौड़ में पार्टी ने लॉशेट का समर्थन किया.
महामारी की वजह से सीडीयू और उसकी सहयोगी पार्टी सीएसयू (बावेरिया में सक्रिय) के प्रति जनसमर्थन कम हो रहा था. लॉशेट पर भी एनआरडब्ल्यू में कोविड महामारी का ख़राब प्रबंधन करने के आरोप लगे हैं.
इसी साल जुलाई में बाढ़ से बर्बाद एक शहर में जर्मनी के राष्ट्रपति के भाषण के दौरान लॉशेट कैमरा के सामने हँसते हुए पकड़े गए थे. इस घटना के बाद से उनका समर्थन तेज़ी से घटा और ओपिनियन पोल में वो संघर्ष करते दिखे.
जर्मनी में रविवार को वोट डाले जाएंगे. ताज़ा ओपिनियन पोल के मुताबिक सीडीएस-सीएसयू गठबंधन को 23 फ़ीसदी मत मिल रहे हैं और ये नज़दीकी प्रतिद्वंदी मध्यमार्गी-वामपंथी एसपीडी से दो अंक पीछे है. लॉशेट की अपनी रेटिंग भी बहुत अच्छी नहीं है. सिर्फ़ बीस फ़ीसदी लोग ही उन्हें चांसलर के रूप में देखना चाहते हैं.
लॉशेट के पिता खदान में काम करते थे, वो स्वयं एक वकील हैं और दशकों तक वो जर्मनी के शक्तिशाली कोयला उद्योग का बचाव करते रहे हैं. वो 2038 के बाद ऊर्जा के लिए कोयले का इस्तेमाल न करने के निर्णय को और पहले लाग करने के ख़िलाफ़ खड़े रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उनके अच्छे संबंध हैं और वो यूरोपीय यूनियन के समर्थक हैं. वो फ्रांस की सीमा से लगे आखेन शहर से आते हैं जिसके फ्रांस से मज़बूत संबंध हैं, वे यूरोपीय यूनियन में सांसद भी रहे हैं.
लॉशेट साल 2005 में अपने गृह क्षेत्र में एकीकरण मंत्री बनें, ये जर्मनी में अपनी तरह का पहला मंत्रालय था. उन्होंने नस्लीय तुर्की समुदाय से मज़बूत रिश्ते बनाए. साल 2015 में जब क़रीब दस लाख प्रवासी जर्मनी पहुंचे तो चांसलर मर्केल ने उनका स्वागत किया. मर्केल की ये नीति विवादित भी रही थी लेकिन लॉशेट ने इसका समर्थन किया था.
लॉशेट पर कैथोलिक चर्च का प्रभाव रहा है, वो चर्च में संचालित स्कूल में पढ़े हैं और उनके माता-पिता धार्मिक रहे हैं. वे शादीशुदा हैं और उनके तीन जवान बच्चे हैं.
उनके जीतने की क्या संभावना है?
आर्मिन लॉशेट ने मर्केल-शैली के मध्यमार्गी होने का कोई भी दिखावा अचानक छोड़ दिया है और वे एक परंपरावादी दक्षिणपंथी सेनानी के रूप में सामने आए हैं. उनके रूढ़िवादी सहयोगी इससे भले ही रोमांचित हैं, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि उनका अभियान कितना ख़राब प्रदर्शन कर रहा है.
हाल के दिनों तक सीडीयू/सीएसयू को उम्मीद थी कि वह मध्य जर्मनी में मैदान मार लेगी और 30 प्रतिशत तक मत आसानी से हासिल करेगी. लेकिन अब ऐसा असंभव लग रहा है. ऐेस में लॉशेट ने अचानक दक्षिणपंथी रवैया अपना लिया है और वो रूढ़िवादी वोटरों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं.
ये एक जोख़िम भरी रणनीति है क्योंकि ये देखा गया है कि आमतौर पर चुनाव मध्य मार्ग से ही जीते जाते हैं. लेकिन ये रणनीति लॉशेट को जर्मनी का अगला चांसलर भी बना सकती है.
एनालेना बेयरबॉक, ग्रींस

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एनालेना बेयरबॉक एंगेला मर्केल के उत्तराधिकारी की दौड़ में अकेली महिला उम्मीदवार हैं और वो अब तक ग्रीन पार्टी की पहली चांसलर उम्मीदवार भी हैं.
बेयरबॉकउत्तरी शहर हेनोवर के पास एक गांव की रहने वाली हैं और पूर्व ट्रेमपोलीन चैंपियन हैं. 40 वर्षीय बेयरलोक ने हैमबर्ग और लंदन में क़ानून और राजनीति की पढ़ाई की है और यूरोपीय संसद में ग्रींस पार्टी के लिए काम किया है.
इस साल ओपिनियन पोल में ग्रींस का समर्थन तेज़ी से बढ़ा है और 25 फ़ीसदी तक पहुंच गया है. लोग बेयरलोक का भी समर्थन कर रहे हैं. लेकिन बेयरबॉक साहित्यिक चोरी और अपने सीवी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के आरोप लगे. इन आरोपों से उनकी साख को बट्टा लगा.
बेयरबॉक साल 2013 से जर्मनी की संसद की सदस्य हैं. वो दो जवान बेटियों की मां हैं और उन्होंने परिवार से जुड़े मुद्दों और पर्यावरण पर ज़ोर दिया है. सीडीयू/सीएसयू और सोशल डेमोक्रेट्स के मुक़ाबले वो रस और चीन के प्रति अधिक सख़्त नजरिया रखती हैं.
बेयरबॉक कभी भी मंत्री नहीं रही हैं और वो कहती हैं कि वो जर्मनी की मौजूदा राजनीति के प्रभाव से बची हुई हैं. वो राजनीतिक सुधारों की बात करती हैं.
ग्रींस पार्टी के उम्मीदवार की भले ही अपनी मुश्किलें हों लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी अगले सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा रहेगी. बेयरबॉक और उनके सह-नेता रॉबर्ट हेबेक पार्टी में अनुशासन लागू करने के लिए जाने जाते हैं. ये अलग बता है कि पार्टी मध्यमार्गियों और कट्टरवादियों के बीच विभाजित रही है.
क्या संभावनाएं हैं? तीनों प्रमुख उम्मीदवारों में चांसलर बनने की सबसे कम संभावना बेयरबॉक की ही है. लेकिन उनकी पार्टी सत्ता में शामिल होने के रास्ते पर चलती दिखाई दे रही है.
उनके अभियान में शुरुआत में भले गड़बड़ियां हुई हों लेकिन अब वो मतदाताओं के ध्यान को व्यक्तित्वों और रूढ़िवादी मुद्दों से हटाकर मध्यवर्ग के मुद्दों की तरफ़ ले जाने में कामयाब रही हैं.
रूढ़िवादी ये आरोप लगाते रहे हैं कि वो जर्मन के सॉसेज और कारों पर प्रतिबंध लगा देंगी, हालांकि बेयरबॉक इन धारणाओं को तोड़ने में भी कामयाब रही हैं.
अब बहस ठोस नीतियों की तरफ़ बढ़ गई है और इन्हें लेकर बेयरबॉक आत्मविश्वास से भरी हैं. जलवायु परिवर्तन जर्मन मतदाताओं के लिए अहम मुद्दा है, ऐसे में दूसरी पार्टियां भी अपने आप को पर्यावरण के प्रति सजग दिखाने की कोशिश कर रही हैं. इससे ग्रींस पार्टी की ही सरकार में शामिल होने की संभावनाओं को बल मिला है.
ओलाफ़ स्कोल्ज़- मध्यमार्गी वामपंथी, सोशल डोमेक्रेट (एसपीडी)

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आर्मिन लॉशेट की तरह ही 62 वर्षयी ओलाफ़ स्कोल्ज़ भी जर्मनी की राजनिति में कामयाबी से पदों पर रहे हैं. वो इस समय जर्मनी के वित्त मंत्री हैं और चांसलर एंगेला मर्केल के डिप्टी हैं.
चुनाव अभियान के दौरान उनके चांसलर बनने की संभावनाओं को मज़बूती मिली है. माना जा रहा है कि उनके हाथों में देश सुरक्षित रहेगा. स्कोल्ज़ 1998 से 2011 तक सांसद रहे हैं. ताज़ा पोल में आधे से अधिक मतदाताओं ने उन्हें चांसलर के लिए अपनी पहली पसंद बताया है.
स्कोल्ज़ 2011-18 के बीच हैमबर्ग शहर के मेयर भी रहे हैं और इस दौरान उन्होंने शहर की वित्तीय सेहत सुधारने में कामयाबी हासिल की थी. इसके बाद वो बुंडेस्टाग (जर्मन संसद) के सदस्य बन गए.
उत्तर-पश्चिमी जर्मनी के ओस्नाब्रक इलाक़े से आने वाले स्कोल्ज़ युवावस्था में ही राजनीति में शामिल हो गए थे और समाजवादी आंदोलन का हिस्सा बन गए थे. उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की है. एसपीडी के भीतर उन्हें एक रूढ़िवादी नेता माना जाता है. उनके और उनकी पत्नी ब्रिटा अर्नस्ट का कोई बच्चा नहीं है.
महामारी के दौरान उन्हीं के नेतृत्व में सरकार ने कारोबारियों और श्रमिकों के लिए 904 अरब डॉलर का राहत पैकेज लागू किया था.
उन्होंने कहा था कि काम को परा करने के लिए इसी मारक हथियार की ज़रूरत है. महामारी के दौरान उनके काम की तारीफ़ की गई. कोविड महामारी ने जर्मनी की वित्तीय सेहत और कारोबार पर गहरा असर डाला है.
जर्मनी के लोग मर्केल के कार्यकाल की स्थिरता चाहते हैं, ऐसे में स्कोल्ज़ मतदाताओं की पहली पसंद बने हुए हैं.
क्या संभावनाएं हैं? 1949 के बाद से ये जर्मनी के पहले चुनाव हैं जिनमें कोई निवर्तमान चांसलर चुनाव नहीं लड़ रहा है. जर्मनी की राजनीति में मौजूदा चांसलर को चुनावों में जो फ़ायदा मिलता है उसे चांसलर बोनस कहा जाता है. स्कोल्ज़ इस खालीपन को भर रहे हैं. ओलाफ़ स्कोल्ज़ भले ही प्रतिद्वंदी पार्टी से हों लेकिन वो ये दिखाने में कामयाब रहे हैं कि वो मर्केल के कार्यकाल को ही आगे बढ़ाएंगे.
उनकी शांत, अकाट्य शैली और अस्पष्ट शब्दों से मुक्त वाक्यों में बात करने की क्षमता मतदाताओं को उस महिला (मर्केल) की याद दिलाती है जिसके साथ उन्होंने इतने सालों तक काम किया है. ओपिनियन पोल से बता चलता है कि मध्यमार्गी जर्मन मतदाता इससे आश्वस्त लगते हैं.
मैदान में अन्य खिलाड़ी
26 सितंबर के चुनावों का नतीजा जो भी हो, ये तय है कि अगली सरकार गठबंधन की ही होगी. इसमें या तो सीडीएस/सीडीयू होंगे या सोशल डेमोक्रेट (एसपीडी) और बहु संभावना है कि ग्रींस पार्टी भी सरकार का हिस्सा होगी. लेकिन सत्ता की दौड़ में तीन अन्य पार्टियां भी शामिल हैं.
द फ्री डेमोक्रेट्स - मुक्त बाज़ार समर्थक उदारवादी

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चाहे एसपीडी आगे रहे या सीडीयू उसे बाज़ार समर्थक एफ़डीपी का समर्थन चाहिए ही होगा.
2017 में एफ़डीपी सीडीयू/सीएसयू और ग्रींस के साथ गठबंधन की वार्ता से ये कहते हुए बाहर हो गई थी कि ख़राब सरकार चलाने से बेहतर है सरकार से बहार रहना.
42 वर्षीय क्रिस्चियन लिंडनर पार्टी की तरफ़ से चांसलर के उम्मीदवार हैं. ताज़ा पोल के मुताबिक पार्टी को 11 फ़ीसदी वोट मिल सकते हैं..
लिंडनर साल 1995 में पार्टी में शामिल हुए थे और 2009 में सांसद चुने गए थे. उन्होंने बोन यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र की डिग्री ली है और सेना में वो एक रिजर्व अधिकारी भी हैं.
महामारी के दौरान उन्होंने लॉकडाउन प्रतिबंधों की आलोचना की थी और अधिक टेस्ट किए जाने का समर्थन किया था. उन्होंने कहा था कि संकट के ख़राब प्रबंधन ने जर्मनी की छवि एक सुपरस्टार से बदलकर एक 'अफ़रशाही दानव' की कर दी है.
उन्होंने जर्मनी को अधिक मॉडर्न , अधिक डिजीटल और अधिक स्वतंत्र करने का नारा दिया है. एफ़डीपी टैक्स की दरों को कम करना चाहती हैं और व्यक्तिगत प्रयासों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहती है.
क्या संभावनाएं हैं? एफ़डीपी को लगता है कि उसका वक़्त आ गया है. लिंडनर अति-आत्मविश्वासी हैं और चार साल पहले जब वो गठबंधन से बाहर हो गए थे तब उनपर ज़िम्मेदारी से हटने का आरोप लगाया गया था.
तब से उन्होंने एफ़डीपी की छवि सुधारी है और एक ऐसी पार्टी के तौर पर पेश किया है जो जर्मनी के अफ़सरों को लगाम में रखना चाहती है. जैसे, पार्टी मध्य-वामपंथी या मध्य-दक्षिणपंथियों के साथ काम करने की क्षमता रखती है. यदि लिंडनर इस बार अपने आप पर काबू रखते हैं तो पार्टी गठबंधन में किंगमेकर के तौर पर उभर सकती है.
कट्टरपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफ़डी)

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प्रवासी विरोधी पार्टी एएफ़डी साल 2017 में पहली बार संसद में दाख़िल होने में कामयाब रही थी. प्रवास संकट से उपजे ग़ुस्से का फ़ायदा उठाते हुए पार्टी प्रमुख विपक्षी दल बन गई है और अब उसके पास 91 सीटें हैं.
लेकिन तब से पार्टी का समर्थन गिर रहा है और उसे अब लगभग दस फ़ीसदी लोगों का समर्थन प्राप्त है. उसके दो प्रमुख उम्मीदवार हैं एलिस वीडेल और टीनो क्रुपाला.
एएफ़डी यूरोपीय संघ की विरोधी है और इस्लाम को जर्मनी की संस्कृति और परंपराओं के लिए ख़तरा मानती हैं. कोविड महामारी से पहले ही पार्टी का समर्थन गिरने लगा था क्योंकि प्रवासियों को लेकर मतदाताओं की चिंताएं कम हो रही थीं.
एएफ़डी ने कोविड प्रतिबंधों को दरकिनार कर पार्टी सम्मेलन किया था. पार्टी नेता कोविड प्रतिबंधों को व्यक्तिगत आज़ादी के ख़िलाफ़ मानते हैं. पार्टी ने कोविड प्रतिबंध हटाने और मास्क की अनिवार्यता ख़त्म करने की मांग की है.
एएफ़डी जर्मनी को ईयू से अलग करने की मांग भी कर रही है और फिर से बॉर्डर कंट्रोल लागू करना चाहती है. पार्टी जर्मनी की सीमाओं पर दीवार भी खड़ी करना चाहती है.
क्या संभावनाएं हैं?
ये माना जा रहा है कि एएफ़डी सरकार का हिस्सा नहीं होगी. अधिकतर जर्मन पार्टी की विचारधारा को ज़हरीला मानते हैं. पार्टी का नारा है- जर्मनी लेकिन सामान्य- इसका यही मतलब निकाला जा रहा है कि जर्मनी में अल्पसंख्यकों के लिए जगह नहीं है.
सभी अन्य पार्टियों ने एएफ़डी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को नकार दिया है. 2013 में गठन के बाद से पार्टी कई बार टूट चुकी है. हर बार पार्टी अधिक कट्टरपंथी हुई है और उसका समर्थन कम हुआ है. लेकिन पार्टी के समर्थक वफ़ादार हैं और कई सीटों पर पार्टी अच्छा प्रदरशन कर सकती है.
वामपंथी- द लेफ्ट (लेफ्ट डाई लिंके)
माना जा रहा है कि डाई लिंके भी गठबंधन का हिस्सा हो सकती है. जर्मनी की पुरानी पार्टी ईस्ट जर्मन सोशलिस्ट पार्टी की अवशेषों से इस पार्टी का गठन हुआ था. 90 के दशक में जो वामपंथी एसपीडी से अलग हुए उन्हें भी पार्टी में जगह मिली.
पार्टी को 6 फ़ीसदी वोट मिल सकते हैं जो संसद में दाख़िल होने की 5 प्रतिशत की शर्त से एक ही अंक ऊपर है. पार्टी के प्रमुख उम्मीदवार हैं जेनीन विस्लर और डाइटमार बार्त्शच.
पार्टी सभी जर्मन सैनिकों को अंतरराष्ट्रीय अभियानों से वापस बुलाना चाहती है. न्यूनतम वेतन बढ़ाना और बेरोज़गारों की सुविधाओं में कटौती की व्यवस्था को ख़त्म करना पार्टी का प्रमुख एजेंडा है.
पूर्वी प्रांत थूरिंगिया में 2014 के बाद से पार्टी की सरकार है और बोडो रामेलो प्रांत के प्रीमियर है.
क्या संभावनाए हैं. ?
डाई लिंके की चांसलर बना लेने की कोई संभावना नहीं है. लेकिन ओपिनियन पोल से संकेत मिलते हैं कि यदि एसपीडी के नेतृत्व में वामपंथी सरकार बनी तो डाई लिंके शामिल हो सकती है.
जर्मनी में वामपंथी विचारधारा के लोग इस पार्टी को पसंद करते हैं. हालांकि पार्टी नेटो के ख़िलाफ़ है और इससे वो लड़खड़ा सकती है.
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