अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा क्या चीन और पाकिस्तान के लिए ख़ुशख़बरी है?

तालिबान

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    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"चीन तालिबान के साथ दोस्ताना और आपसी सहयोग के रिश्ते विकसित करने के लिए तैयार है. चीन अफ़ग़ानिस्तान में शांति और पुनर्निर्माण के लिए रचनात्मक भूमिका निभाना चाहता है."

(चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनियांग)

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"अभी जो हो रहा है अफ़ग़ानिस्तान में, वहाँ ग़ुलामी की ज़ंजीरें तोड़ दीं उन लोगों ने. आप जब किसी की संस्कृति अपनाते हैं, तो आप मानने लगते हैं कि वो संस्कृति आपसे ऊँची है और आख़िर में आप इसके ग़ुलाम हो जाते हैं."

(पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान)

अफ़गानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा होने के बाद चीन और पाकिस्तान की तरफ़ से आए ये बयान तालिबान के लिए उनकी स्वीकृति साफ़ ज़ाहिर करते हैं.

इमरान ख़ान

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चीन और पाकिस्तान का तालिबान से 'रोमांस'

चीन और पाकिस्तान दोनों ही उन चुनिंदा देशों में भी शामिल हैं, जिनके दूतावास अफ़गानिस्तान में तालिबान के क़ब्ज़े के बाद भी सक्रिय हैं.

एक तरफ़ जहाँ अफ़गानिस्तान से हैरान-परेशान लोगों की चिंताजनक तस्वीरें सामने आ रही है. वहीं, दूसरी तरफ़ चीन और पाकिस्तान का तालिबान के लिए नरम रवैया भी चर्चा का विषय है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अफ़गानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए नियुक्त दूत ज़ालमे ख़लीज़ाद ने तालिबान से कहा था कि अगर वो बलपूर्वक सत्ता हथियाते हैं, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिलेगी.

हालाँकि पूरी तरह ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है.

कई विशेषज्ञ चीन-पाकिस्तान और तालिबान के बीच इस 'रोमांस' पर बिल्कुल हैरान नहीं हैं. वो इसे तालिबान की एक बड़ी 'कूटनीतिक जीत' के रूप में देख रहे हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और तालिबान को कहीं न कहीं एक दूसरे की ज़रूरत है. वहीं, पाकिस्तान पर तालिबान को समर्थन देने के आरोप पहले से लगते रहे हैं.

तो क्या ऐसा माना जाए कि अफ़गानिस्तान में तालिबान का क़ब्ज़ा चीन और पाकिस्तान के लिए अच्छी ख़बर है? क्या तालिबान से चीन और पाकिस्तान को कोई ख़तरा भी है?

तालिबान

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तालिबान की कूटनीतिक जीत?

प्रोफ़ेसर गौतम मुखोपाध्याय अफ़गानिस्तान, सीरिया और म्यांमार में भारत के राजदूत रह चुके हैं.

उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "चीन का समर्थन मिलने से तालिबान के हौसले ज़रूर बढ़ेंगे और एक तरह से यह उनकी कूटनीतिक जीत भी है लेकिन चीन के लिए इसके ख़तरे भी हैं."

गौतम मुखोपाध्याय के मुताबिक़, "पाकिस्तान की छवि पहले से ही बहुत ख़राब है और ऐसे में चीन का उसके साथ मिलकर तालिबान को समर्थन देना कुछ हद तक चीन की अपनी छवि ही ख़राब करेगा."

उन्होंने कहा, "चीन को लगता है कि तालिबान के साथ मिलकर उसके लिए इस्लामी चरमपंथी संगठनों और गतिविधियों को काबू में करना आसान होगा. ख़ासकर पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) को."

ईटीआईएम चीन के वीगर मुसलमानों का एक संगठन है जो शिनजियांग में एक स्वतंत्र देश के गठन की माँग करता है.

चीन ने पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट का मुद्दा पिछले महीने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बातचीत में भी उठाया था.

चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने तालिबान प्रतिनिधिमंडल से कहा था कि उसे 'चीन विरोधी आतंकवादी संगठन' ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से संबंध तोड़ने होंगे.

चीन

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आसान भी नहीं है चीन की डगर

लेकिन क्या यह चीन के लिए इतना आसान होगा? गौतम मुखोपाध्याय का जवाब है- नहीं.

वो कहते हैं, "ये सभी संगठन एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं हैं और न ही इन्हें पूरी तरह अलग करना आसान है. ये एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. इसलिए मुझे लगता है कि तालिबान के साथ हाथ मिलाकर एक ख़तरा ज़रूर मोल रहा है."

गौतम मुखोपाध्याय का मानना है कि चीन के लिए तालिबान को समर्थन देने के पीछे उसके आर्थिक-रणनीतिक हित ज़रूर छिपे हैं लेकिन आने वाले कुछ वक़्त में ईटीआईएम से निबटना उसके लिए एक बड़ी चुनौती होगी,

उन्होंने कहा, "चीन अपने दमन और हावी होने की क्षमता पर भरोसा करके तालिबान का साथ दे रहा है- जैसा कि उसने युन्नान और शिनजियांग में किया है. लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि युन्नान और शिनजियांग चीन के भीतर का मामला जबकि तालिबान के साथ ऐसा नहीं है. मुझे लगता है कि चीनी पक्ष इन सभी पहलुओं पर ग़ौर कर रहा होगा.''

वो कहते हैं, "सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि चीन के सामने कैसे मौक़े आते हैं और वो उनका कैसे इस्तेमाल करता है. हो सकता है कि वो तालिबान का साथ देकर अपने इरादों में कामयाब हो जाए लेकिन ऐसा न होने की भी पर्याप्त वजहें हैं."

गौतम मुखोपाध्याय को ऐसा भी लगता है कि अमेरिका ने अफ़गानिस्तान में तालिबान को एक तरह से सक्रिय इसलिए किया है ताकि वो चीन के लिए चीज़ें मुश्किल कर सके.

उन्होंने कहा, "अफ़गानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी उसके प्रतिद्वंद्वियों जैसे रूस और ईरान को सुरक्षा ही दे रही थी. अब अमेरिका को लगता है कि वो ख़ुद इसका सामना करें."

पाकिस्तान

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पाकिस्तान के सामने कैसी चुनौतियाँ?

पूर्व भारतीय राजनयिक और एशिया मामलों के विशेषज्ञ पी. स्तोबतन का मानना है कि पाकिस्तान 'डबल गेम' खेल रहा है.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पाकिस्तान ने एक तरफ़ अफ़गानिस्तान से सैनिकों की वापसी में अमेरिका का साथ दिया और अब वो चीन का साथ देते हुए तालिबान को मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है."

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स्तोबतन मानते हैं कि भविष्य में तालिबान के मसले पर चीन और अमेरिकी में तनाव ज़्यादा बढ़ जाएगा और बीच में पाकिस्तान फँसेगा.

उन्होंने कहा, "अफ़गानिस्तान में जो कुछ भी हुआ, वो अफ़गानिस्तान के बारे में नहीं बल्कि असल में अमेरिका और चीन के बारे में है."

वो कहते हैं कि अभी निकट भविष्य के लिए तो पाकिस्तान ने 'स्मार्ट गेम' खेला है लेकिन दूरगामी भविष्य में उसके लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं.

अफ़गान शरणार्थी

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पाकिस्तान

स्तोबतन मानते हैं कि अभी अफ़गानिस्तान में तालिबान के क़ब्ज़े को पाकिस्तान भी अपनी रणनीतिक जीत के तौर पर पेश कर सकता है क्योंकि वो पहले से ही कह रहा था कि अशरफ़ ग़नी 'सत्ता हस्तांतरण' की प्रक्रिया में बाधा रहे हैं और उनकी वजह से हिंसा बढ़ रही है.'

पाकिस्तान सरकार यह आरोप भी लगाती रही है कि अफ़ग़ानिस्तान में अशांति का माहौल बनाए रखने के लिए भारत साज़िश रचता है.

स्तोबदन कहते हैं, "ऐसे में पाकिस्तान तालिबान के क़ब्ज़े को अफ़गानिस्तान में भारत के कम होते प्रभाव के रूप में भी देखेगा."

पाकिस्तान में पहले से बड़ी संख्या में अफ़गान शरणार्थी रहते हैं और ताज़ा स्थिति के बाद उनकी संख्या बढ़ने की आशंका है. ऐसे में क्या उसके लिए मुश्किलें पैदा नहीं होंगी?

इस सवाल के जवाब में स्तोबतन कहते हैं, "शुरुआत में पाकिस्तान के लिए यह आर्थिक तौर पर मुश्किल हो सकता है लेकिन बाद में वो इन्हीं अफ़गान शरणार्थियों का हवाला देकर विश्व मुद्रा कोष और विश्व बैंक से बड़े पैमाने पर फ़ंड भी ले लेगा."

चीन के बारे में वो कहते हैं कि मौजूदा हालात को लेकर चीन ख़ुश भी होगा और आशंकित भी. हालाँकि उन्हें यह भी लगता है कि चीन के लिए मौक़े अपेक्षाकृत ज़्यादा होंगे और चुनौतियाँ कम.

उन्होंने कहा, "अमेरिका अफ़गानिस्तान से हट गया है, पाकिस्तान चीन के साथ है. रूस और ईरान भी चीन के साथ हैं. ऐसे में उसका पक्ष कमज़ोर नहीं है."

वीगर मुसलमान

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गौतम मुखोपाध्याय और पी. स्तोबतन के साथ बातचीत से जो महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए, वो कुछ इस तरह हैं:

  • चीन और वीगर मुसलमान

चीन तालिबान से इसलिए हाथ मिलाना चाहता है क्योंकि वो अपने यहाँ वीगर मुसलमानों के मसले पर चिंतित है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ चीन के शिनजियांग प्रांत में करीब 10 लाख वीगर मुसलमान है और शिनजियांग की सीमा अफ़गानिस्तान से भी मिलती है.

ऐसे में चीन को डर है कि वीगर मुसलमान और ईटीआएम के सदस्य अफ़गानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ गतिविधियों को अंजाम देने के लिए कर सकते हैं.

नतीजन, उसने पहले ही तालिबान को इस शर्त पर समर्थन देने की बात कही है कि वो अफ़गानिस्तान के किसी हिस्से को उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं होने देगा.

चीन पर वीगर मुसलमानों के उत्पीड़न के आरोप लगते रहते हैं और इसकी वजह से अमेरिका समेत कई यूरोपीय देशों से उसके रिश्तों में तनाव जारी रहता है.

  • चीन के आर्थिक और रणनीतिक हित

चीन की रोड एंड बेल्ट परियोजना जैसी कई महत्वाकांक्षाए हैं और उसके लिए सेंट्रल एशिया में बड़े पैमाने पर इन्फ़्रास्ट्रक्टर और कम्युनिकेशन की ज़रूरत होगी.

अगर अफ़गानिस्तान में चीन को पर्याप्त सहयोग नहीं मिलेगा तो यह इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की उसकी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है.

इसी तरह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर भी एशिया में उसका एक बड़ा इन्फ़्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है लेकिन पाकिस्तान में चीनी अधिकारियों पर हमले होते रहते हैं. ऐसे में तालिबान से हाथ मिलाकर चीन क्षेत्र में अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है.

चीन ने एनक कॉपर माइन और अमू दरिया एनर्जी जैसे निवेश अफ़गानिस्तान में किए हैं.

साथी ही अफ़गानिस्तान में सोना, कॉपर, ज़िंक और लोहे जैसी क़ीमती धातुओं का भंडार है. इसलिए वहाँ अपने लिए प्रतिकूल माहौल बनाकर चीन भविष्य में निवेश की संभावनाओं को कम नहीं करना चाहेगा.

मलाला यूसुफ़ज़ई

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  • पाकिस्तान और तालिबान

तालिबान के क़ब्ज़े से पाकिस्तान इसलिए ख़ुश है क्योंकि इसे वो अफ़गानिस्तान में भारत की रणनीतिक हार के रूप में देखता है.

लेकिन इसके साथ ही वहाँ चरमपंथी समूह पाकिस्तान तालिबान का मनोबल भी बढ़ जाएगा.

लड़कियों की शिक्षा और शांति के लिए आवाज़ उठाने वाली मलाला युसूफ़ज़ई को तालिबान के सदस्यों ने ही गोली मारी थी.

इसके साथ ही पाकिस्तान में बड़ी संख्या में अफ़गान शरणार्थियों के आने को लेकर भी चिंता जताई जा रही है.

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