चीन ने विरोध की आवाज़ों को दबाकर कैसे लिखी कोराना महामारी फैलने की नई कहानी

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साल की शुरुआत में चीन की सरकार के सामने दो चुनौतियां आ खड़ी हुईं थीं.
एक तो थी अनजानी बीमारी जिसका ख़तरा देश के लोगों पर मंडरा रहा था और दूसरी चुनौती थी उन आवाज़ों की जो इंटरनेट के ज़रिए दुनिया को बता रही थी कि क्या हो रहा है.
लेकिन साल 2020 के अंत तक अगर सरकार नियंत्रित मीडिया को देखें तो लगेगा कि दोनों ही चुनौतियां अब कंट्रोल में हैं.
बीबीसी की कैरी एलन और झाओयिन फेंग ने एक नज़र डाली कि कैसे चीन सरकार ने नकारात्मक ख़बरें दबाने के लिए लोगों को सेंसर किया, इसके बावजूद कैसे कुछ नागरिक जानकारी साझा कर पाए और फिर कैसे दुष्प्रचार मशीनरी ने दोबारा नैरेटिव बनाया.
साल की शुरुआत में ये स्पष्ट होने लगा था कि कुछ ऐसा हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ था.

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चीन का सोशल मीडिया
लोगों के गुस्से भरे हज़ारों पोस्ट चीनी सोशल मीडिया पर दिखने लगे थे. लोग सवाल कर रहे थे कि क्या स्थानीय सरकारें सार्स जैसे वायरस को छुपाने की कोशिश कर रही हैं. चीन में वीबो जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार-विरोधी पोस्ट अक्सर सेंसर कर दिए जाते हैं लेकिन इस बार ऐसे पोस्ट बड़ी संख्या में थे कि कुछ सेंसर से बच गए.
ऐसा इसलिए क्योंकि किसी बड़े संकट के वक़्त सरकार जल्द प्रतिक्रिया देती है और सेंसर एक्शन लेने में सुस्त पड़ जाते हैं. जनवरी और फरवरी में भी इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कई मीडिया आउटलेट्स ने खोजी रिपोर्ट छापी जो सोशल मीडिया पर खूब शेयर हुई.
बाद में जब चीन दुष्प्रचार की रणनीति लेकर आया तो इन रिपोर्ट्स को हटा दिया गया. हर तरफ़ दोष दिया जा रहा था. जनवरी के बीच में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीनी मीडिया की ख़बरों से एकदम गायब हो गए.
ना तो वे सार्वजनिक तौर पर कहीं नज़र आते थे और चीनी सरकारी मीडिया जैसे पीपल्स डेली के फ्रंट पेज पर उनकी तस्वीरें भी नहीं दिखती थी. ऐसा आशंका जताई जा रही थी कि वे दोष से बचने के लिए बिल्कुल गायब हो गए हैं.

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हालांकि एक हफ़्ते बाद ही स्थिति थोड़ी बदली. सरकार के बड़े अधिकारी स्थानीय सरकारों के चेतावनी देने लगे कि वे इतिहास में शर्मिंदगी के स्तंभ बन जाएंगे अगर उन्होंने उनके इलाक़े में कोरोना के मामलों को छुपाया तो.
चीनी मीडिया और सोशल मीडिया पर दोष वुहान के नेतृत्व पर डाला गया कि "वुहान ने पहले क्यों नहीं लोगों को बताया?"
इसके बाद फरवरी में चीन की रिकवरी के बीच शी जिनपिंग विश्वास और मज़बूती के स्तंभ के तौर पर फिर नज़र आने लगे.

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डॉक्टर को सेंसर किया गया

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भ्रम की स्थिति के बीच, एक बात साफ़ हुई कि उस एक व्यक्ति की आवाज़ को चुप करवाया गया जिसे नहीं करवाया जाना चाहिए था.
ली वेनलियांग का नाम एक व्हीसलब्लोअर डॉक्टर के तौर पर जाना जाने लगा था.
उन्होंने अपने सहकर्मियों को सार्स जैसे वायरस को लेकर चेतावनी दी थी. लेकिन सात फरवरी को डॉक्टर ली की मृत्यु हो गई.
पता चला कि झूठी टिप्पणियों को लेकर सामाजिक व्यवस्था को ख़राब करने के आरोप में उनकी जांच की जा रही थी.
उनकी मृत्यु के बाद लाखों यूज़र्स ने साइना वीबो पर उनके समर्थन में लिखा. हालांकि धीरे-धीरे इन पोस्ट्स को हटा दिया गया.
लेकिन इंटरनेट यूज़र्स ने इमोजी, मोर्स कोड और प्राचीन चीनी स्क्रिप्ट के ज़रिए उनकी याद को बनाए रखने का रचनात्मक तरीक़ा खोज लिया.

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फ़ेसबुक और वीचैट पर एक ट्रेंड शुरू हुआ कि लोग डॉक्टर ली की मृत्यु की प्रतिक्रिया में अपने मास्क पर लिखने लगे.
कई लोगों ने लिखा, "मैं नहीं कर सकता" और "मुझे नहीं समझ आता." पुलिस अपनी जांच में डॉक्टर ली से "झूठे बयानों" को बंद करने की चेतावनी देते हुए पूछ रही थी, "क्या आप ये कर सकते हैं?" और "क्या आपको समझ आता है?"
लोगों की प्रतिक्रिया इन्हीं सवालों पर थी जिनका जवाब वे अपने मास्क पर लिख कर दे रहे थे.
पत्रकार 'गायब' हो गए
चीन अथॉरिटी यूं तो डॉक्टर ली वेनलियांग को 'शहीद' का दर्जा देती है लेकिन कई जाने-माने कार्यकर्ताओं का नाम कोविड-19 के इतिहास से हटा दिया गया.

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वुहान में संक्रमण फैलने के वक़्त कई सिटीज़न जर्नलिस्टों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी काम किया और चीन की इंटरनेट फायरवाल तोड़ते हुए शहर से बाहर जानकारी पहुंचा पाए.
इनमें चेन क्वीशी, फेंग बिन, झांग झन शामिल हैं. यूट्यूब पर उनकी वीडियो के लाखों व्यूज़ हैं जिनमें वे दावा वुहान की असल तस्वीर पेश करने का दावा करते हैं.
हालांकि इसकी भी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ी. कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) ने बताया कि वुहान में अथॉरिटी ने कई पत्रकारों को गिरफ़्तार किया जो चीन सरकार के नेरेटिव के लिए ख़तरा थे.
सीपीजे ने बताया कि वे पत्रकार अब भी जेल में हैं. चीन में यूट्यूब ब्लॉक है लेकिन देश में कुछ लोग उनके प्रभाव को जानते हैं.
ये सवाल भी उठा कि गायब होने के बाद लौटकर आया एक पत्रकार क्या विदेश में दुष्प्रचार कैंपेन का हिस्सा बन गया है?

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ली झेहुआ ने फरवरी में यूट्यूब पर एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें उन्होंने बताया था कि पुलिस उनकी कार का पीछा कर रही है. इसके बाद वह लापता हो गए.
दो महीने तक किसी को उनके बारे में पता नहीं था लेकिन उसके बाद उनकी एक वीडियो आई जिसमें उन्होंने बताया कि वे क्वारंटीन में हैं और अथॉरिटी के साथ सहयोग कर रहे हैं.
उसके बाद से उन्होंने कोई वीडियो पोस्ट नहीं की है और कुछ लोगों का कहना है कि उनसे ज़बरदस्ती ये वीडियो पोस्ट करवाया गया था.
युवाओं ने खोजे रास्ते

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मार्च से ही चीन अपने आप को कोरोनावायरस पर विजयी साबित करने की कोशिश में था. लेकिन ये भी सच है कि सेंसर ने लोगों में पनप रहे असंतोष के सबूतों को गायब करने की कोशिश की.
चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वो वुहान की तरह दूसरा लॉकडाउन नहीं लगाना चाहता. लेकिन साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक़ कई विश्वविद्यालयों में 'ब्लैंकेट कैंपस लॉकडाउन' चलते रहे.
अगस्त में पहली बार छात्र क्लासरूम में लौटे. लेकिन जल्द ही देश भर के कॉलेजों में विरोध प्रदर्शन होने लगे क्योंकि विश्वविद्यालयों ने इंटरनेट की सुविधा सीमित कर दी थी.
ऐसी भी शिकायतें आई कि विश्वविद्यालयों की कैंटीनों ने निर्भरता देखते हुए खाने की कीमतें बढ़ा दी. ये सब बातें भी ज़्यादातर सेंसर कर दी गई.
गुस्से और असंतोष से भरे चीनी युवाओं ने इस साल पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म छोड़ कर कम लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स अपनाए ताकि अपनी बात रख सकें.

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न्यूज़ वेबसाइट सिक्सथ टोन के मुताबिक़ एक म्यूज़िक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म नेटइमो पर युवा परीक्षाओं, उदास रिश्तों और टूटे सपनों पर लिख रहे थे.
वेबसाइट के मुताबिक़ प्लेटफॉर्म ने इस ट्रेंड को मनगढ़ंत यूज़र कमेंट कहकर रोकने की कोशिश की.
नई किताबों और टीवी शो से इतिहास दोबारा लिखा गया
चीन ने भी एक बेहद सकारात्मक तस्वीर पेश करने की कोशिश की.
जिस तरह से चिंताएं थी कि 'द क्राउन' ब्रिटेन के रॉयल इतिहास का सही वर्ज़न नहीं दिखाएगा, वैसे ही कई चीनी लोगों में ये चिंता था कि कोविड के बाद लिखी जाने वाली किताबें और टीवी प्रोग्राम सही तरह से नहीं दिखाएंगे जो वुहान में हुआ.

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साल की शुरुआत में चीनी लेखक फेंग फेंग को वुहान में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखने के लिए तारीफ़ मिली. उनके लिखे से वुहान के लोगों के डर और उम्मीदों को जानने का मौक़ा मिला.
लेकिन उनकी ऑनलाइन डायरी लिखने के बाद से ही वे चीनी राष्ट्रवादियों की आलोचना का शिकार हो रही हैं जिनका आरोप है कि वे चीन की छवि ख़राब करना चाहती हैं.
सरकारी मीडिया ने भी दूसरी किताबों को प्रोमोट किया जिनमें अथॉरिटी के वायरस से निपटने को लेकर सरकार का सकारात्मक संदेश था.
कई बार तो ये भी हुआ कि सरकारी मीडिया को वुहान संक्रमण के नैरेटिव को लेकर नाराज़गी झेलनी पड़ी.
जब सितंबर में सत्य घटनाओं पर आधारित फ्रंट लाइन वर्कर्स के बारे में पहला शो 'हीरोज़ इन हार्म्स वे' दिखाया जा रहा था, तब इस शो को आलोचना झेलनी पड़ी थी क्योंकि इसमें महिलाओं की भूमिका को कम करके दिखाया गया था.

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चीन बनाम पश्चिम
ये बहुत साफ़ है कि चीन अपना हाथ ऊपर रखते हुए साल 2020 को विदा करना चाहता है.
अपने नागरिकों के साथ-साथ वो दुनिया को भी बताना चाहता है कि उसने कोविड-19 के ख़िलाफ़ युद्ध लगभग जीत लिया है.
लेकिन चीन अब इस बात से दूरी बना रहा है कि कोरोनावायरस की शुरुआत का संबंध उससे है.
अब वो इस बात का प्रचार कर रहा है कि कोविड-19 पर विजय का मतलब है कि उसका राजनीतिक मॉडल पश्चिम से ज़्यादा सफल है.
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शुरुआत में तो खुद चीन की मीडिया 'वुहान वायरस' टर्म का इस्तेमाल करती थी लेकिन अब बात उससे बहुत आगे निकल चुकी है. अब इस टर्म का तो अंत कर ही दिया गया है बल्कि इस तरह की बातें सामने रखी गई कि कोरोनावायरस पश्चिम से भी शुरू हुआ हो सकता है.
चीन की मीडिया ने भी पूरे साल अमेरिका और कुछ हद तक ब्रिटेन का नाम लेने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा कि कैसे ये देश कोरोना से ठीक से निपट नहीं पा रहे.
ये इस हद तक हुआ कि चीनी इंटरनेट यूज़र्स कोविड-19 को 'अमेरिकी वायरस' या 'ट्रंप वायरस' कहने लगे.
चीनी अख़बार और मीडिया ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि कैसे अमेरिकी नेताओं ने हेल्थकेयर से ज़्यादा चुनावी कैंपेन पर खर्च करने को प्राथमिकता दी और कैसे एक लंबे चुनाव की वजह से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ.
अगर एक संदेश जो चीन 2021 में लेकर जाना चाहेगा, वो ये कि देश इस साल को एकता और समृद्धि के साथ खत्म कर रहा है. वहीं, दूसरे देशो में विभाजन और अस्थिरता की आशंका है.
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