कोविड-19: कैसे होता है वायरस म्यूटेट?

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- Author, हेलेन ब्रिग्स
- पदनाम, बीबीसी पर्यावरण संवाददाता
कोरोना वायरस के दो नए वैरिएंट मिलने के बाद एक बार फिर दुनिया भर में चिंता है. वैज्ञानिक ये पता लगाने में जुटे हैं कि क्या ये वैरिएंट ज़्यादा संक्रामक हैं और क्या कोविड वैक्सीन इन पर काम करेगी?
सभी वायरस प्राकृतिक तौर पर म्यूटेट करते हैं यानी अपनी संरचना में बदलाव करते हैं. उसी तरह सार्स-कोव-2 भी करता है. अनुमानित तौर पर एक महीने में एक या दो बदलाव.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पैथोजन इवोल्यूशन की विशेषज्ञ डॉक्टर लूसी वैन डॉर्प कहती हैं, "अक्सर म्यूटेशन की वजह से वायरस की प्रॉपर्टी पर कम असर पड़ता है."
"सार्स-कोव-2 के जीनोम में ज़्यादातर म्यूटेशन यात्री की तरह हैं, यानी वे वायरस का व्यवहार नहीं बदलती, वे बस साथ चलती रहती हैं."
लेकिन कभी-कभी वायरस इस तरह म्यूटेट कर जाता है जिससे उसके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को मदद मिलती है.
अब ये जानने की कोशिश हो रही है कि क्या नए ब्रिटेन वेरियेंट में भी यही हुआ है जो तेज़ी से फैलता नज़र आ रहा है.
म्यूटेशन की प्रक्रिया

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एक ऐसा ही लेकिन इससे नहीं जुड़ा एक वैरिएंट दक्षिण अफ्रीका में भी सामने आया है.
चिंता की बात ये है कि दोनों ही म्यूटेशन स्पाइक प्रोटीन की जीन में हुई हैं. इसी स्पाइक प्रोटीन के ज़रिए वायरस मानव कोशिका से चिपक कर दाख़िल होता है.
ब्रिटेन वाले वैरिएंट में 14 म्यूटेशन हुई हैं जिससे प्रोटीन बनाने वाले एमिनो एसिड में बदलाव आया और जेनेटिक कोड में कुछ हिस्से ख़त्म हो गए जिसे डिलीशन कहा जाता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ इसमें से कुछ म्यूटेशन वायरस फैलने की गति को भी प्रभावित कर सकती हैं.
कई वैरिएंट में स्पाइक प्रोटीन एन-510वाई में म्यूटेशन पाई गई है, दक्षिण अफ्रीका वाले एक वैरिएंट में भी. सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक़ लैब प्रयोग ये सुझा रहे हैं कि शायद ये म्यूटेशन वायरस को मानव कोशिका से जुड़ने में मदद कर सकती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ एक और स्पाइक प्रोटीन पी-681एच में म्यूटेशन महत्वपूर्ण हो सकती है.
इस प्रोटीन में 69-70 पोज़ीशन पर जो डिलीशन हुई, उसका संबंध कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले मरीज़ों से भी जोड़ा गया जिनके अंदर कई महीनों तक वायरस रहता है.

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इस डिलीशन की वजह से हमें पता चल सकता है कि वैरिएंट कैसे बना. शायद उस मरीज़ में जिसका इम्यून सिस्टम कमज़ोर था, जो वायरस से नहीं लड़ पाया और इस वजह से कई महीनों तक वायरस उसके शरीर में रहा और साथ-साथ म्यूटेट करता रहा.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग्लासगो के प्रोफ़ेसर डेविड रॉबर्टसन ब्रिटेन के उस ग्रुप का हिस्सा हैं जिसने नए वैरिएंट का आकलन किया है.
प्रोफ़ेसर रॉबर्टसन बताते हैं, "फ़िलहाल सोच ये है कि वायरस लंबे संक्रमण के दौरान कई म्यूटेशन से बना है."
हालांकि मिंक जानवर के साथ किसी तरह का संबंध नज़र नहीं आ रहा. प्रोफ़ेसर रॉबर्टसन कहते हैं, "अभी ऐसा कोई सबूत नहीं कि मिंक या कोई और जानवर का इससे संबंध है लेकिन समझदारी इसी में है कि इसे पूरी तरह से ख़ारिज ना किया जाए."
वैज्ञानिक अब ब्रिटेन में मिले वैरिएंट के बारे में ज़्यादा पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. ये वैरिएंट ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, इटली, आइसलैंड और नीदरलैंड्स में भी मिला है.
दक्षिण अफ्रीका में मिला वैरिएंट भी चिंता का विषय है. इसमें भी वायरस के स्पाइक प्रोटीन एन-501वाई में म्यूटेशन हुई है लेकिन ये अलग से वायरस में निकल रहा है. दूसरी म्यूटेशन की भी जाँच की जा रही है.
ऐसी आशंका है कि दोनों वैरिएंट उम्मीद से ज़्यादा तेज़ी से फैल रहे हैं लेकिन अब भी ये साफ़ तौर पर नहीं कहा जा सकता.
वैक्सीन पर प्रभाव

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जनवरी में चीन के पहले जीनोम सीक्वेंस को जारी करने के बाद से ही सार्स-कोव-2 को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व वैज्ञानिक कोशिशें हो रही हैं.
किसी भी जीव या वायरस के पूरे जीन सेट को जीनोम कहा जाता है. वैज्ञानिकों ने अब तक सार्स-कोव-2 के 250,000 जीनोम क्रमित (सीक्वेंस) किए हैं और खुले तौर पर साझा किया है.
संक्रमित मरीज़ के स्वैब यानी सैंपल से वायरस के जेनेटिक कोड को निकाला जा सकता है और रीड होने से पहले सीक्वेंसर की मदद से जेनेटिक कोड की संख्या बढ़ाई जा सकती है.
किसी भी जीव के डीएनए या आरएनए की मोनोमर यूनिट को न्यूक्लियोटाइड कहते हैं. इन न्यूक्लियोटाइड्स की वजह से जीनोम और म्यूटेशन की तुलना की जा सकती है.
डॉक्टर वैन डॉर्प कहती हैं, "इन्हीं कोशिशों और ब्रिटेन की टेस्ट लैबों की वजह से बताया जा सका कि ब्रिटेन में आया वैरिएंट चिंताजनक हो सकता है."
वैज्ञानिक जानकारी अब बहुत तेज़ी से साझा की जा रही है.
एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या म्यूटेशन की वजह से वैक्सीन प्रभावित होगी, हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा नहीं होगा. कम से कम शॉर्ट टर्म में तो नहीं.
डॉक्टर वैन डॉर्प कहती हैं, "वैक्सीन भी अब आ गई हैं तो ये सवाल अब धीरे-धीरे और महत्वपूर्ण हो जाएगा ताकि किसी संभावित केस का जल्द पता लगा लिया जाए, उसको फ़ॉलो किया जाए और ट्रैक किया जाए."
"हमें वैक्सीन की संरचना और इसकी डिलीवरी की स्ट्रैटेजी के आकलन के लिए थोड़ा ज़्यादा वक़्त चाहिए. इसलिए ये कोशिश जारी रहेगी. हालांकि अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी."
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