कोरोना वायरस: क्या अमरीका और चीन के बीच फंस गया है WHO?

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- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद कोरोना के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई पर क्या असर पड़ने वाला है, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा.
फ़िलहाल ट्रंप प्रशासन के फ़ैसले ने कुछ दिनों से चले आ रहे विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमरीका के तनावपूर्ण रिश्ते को संकट की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है.
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने अपने प्रशासन को विश्व स्वास्थ्य संगठन को फ़िलहाल फंड बंद करने का निर्देश दिया है.
अमरीका विश्व स्वास्थ्य संगठन को सबसे ज़्यादा फ़ंड देता है. अमरीका ने पिछली बार भी विश्व स्वास्थ्य संगठन को क़रीब 40 करोड़ डॉलर का फ़ंड दिया था जो सबसे ज़्यादा है. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में भी इसका ज़िक्र किया था.
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अमरीका ने इस फ़ैसले से पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चीन को लेकर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया था और कहा था कि वो विश्व सवास्थ्य संगठन को देने वाले फ़ेड पर रोक लगाने जा रहे हैं.
अमरीकी राष्ट्रपति ने उस समय आरोप लगाया था कि कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुत ग़लतियां की हैं. उन्हें इस बीमारी को लेकर और पहले चेतावनी जारी करनी चाहिए थी.
इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जनरल टेड्रोस अदानॉम गेब्रियेसस ने जिनेवा में हुए एक प्रेस कांफ्रेस में कोरोना वायरस को लेकर राजनीति ना किए जाने की अपील की थी और कहा था कि इससे कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई कमज़ोर होती है.
गेब्रियेसस ने जब कोरोना के ख़िलाफ़ चीन के प्रयासों की तारीफ़ की थी तब भी अमरीका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर कड़ा एतराज जताया था.

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अमरीका ने ये फ़ैसला क्यों किया?
क्या अमरीका और चीन के संबंधों का ख़ामियाजा विश्व स्वास्थ्य संगठन को भुगतना पड़ रहा है?
जेएनयू के सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, ऑर्गेनाइजेशन एंड डिसआर्मामेंट के चेयरपर्सन प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, “अमरीका पर विश्व महाशक्ति होने के नाते जो ज़िम्मेदारी थी, उसमें वो असफल रहा है. इससे ध्यान भटकाने के लिए ट्रंप प्रशासन ने यह क़दम उठाया है. ऐसा नहीं है कि वो विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग हमेशा के लिए रोकने जा रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप की शैली आक्रामक ज़रूर है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चीन या विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ उनके संबंध स्थायी तौर पर बिगड़ने जा रहे हैं.”
वो ट्रंप के फ़ैसले के पीछे तीन कारणों को गिनवाते हैं. पहली ट्रंप की आक्रामक शैली, दूसरी अपने देश के अंदर अमरीका की असफलता और तीसरा चीन की उत्पादकता बढ़ने की वजह से उसका दुनिया में प्रभाव का बढ़ना.
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अमरीका और चीन में किसकी ग़लती?
हालांकि योजना आयोग के पूर्व सदस्य और अर्थशास्त्री प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा इससे पूरी तरह से इत्तेफाक नहीं रखते.
वो कहते हैं, “विश्व स्वास्थ्य संगठन में कई तरह के फ़ंड होते हैं. अमरीका जितना फंड देता है चीन उसकी तुलना में काफ़ी कम फंड देता है. राष्ट्रपति ट्रंप के फ़ैसले का असर निश्चित तौर पर होने वाला है ख़ासकर कोरोना संक्रमण के इस दौर में. लेकिन एक बात ये भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का योगदान दूसरे देशों में सिर्फ़ पैसों का नहीं होता. ये मदद टेक्निकल एडवाइस के रूप में होती है. इस बार टेक्निकल एडवाइस देने में काफ़ी देरी हुई है. अमरीका ने जो आरोप लगाए हैं, वो काफ़ी हद तक सच हैं. इसका ख़ामियाजा दुनिया को झेलना पड़ रहा है. इसलिए चीन को लेकर एक नाराज़गी भी है. इसमें दो राय नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ग़लतियां की हैं.”
लेकिन वो आगे कहते हैं, “अमरीका के फ़ैसले के पीछे उनकी वो लपरवाही भी है जो उन्होंने अपने देश में शुरुआती दौर में की और अब वो अपनी ग़लती छुपाने के लिए चीन पर दोष देने की रणनीति अपना रहे हैं. इस साल अमरीका में चुनाव भी है. इसलिए यह भी एक बड़ी वजह है कि ट्रंप अपनी सारी ग़लती विश्व स्वास्थ्य संगठन पर डाल देना चाहते हैं. ग़लती किसी की भी हो, अपने नागरिकों की ज़िंदगी बचाने की ज़िम्मेदारी आपकी है.”

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अमरीका अभी दुनिया में कोरोना वायरस से सबसे ज़्यादा प्रभावित देश है. यहां अब तक 25 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और क़रीब छह लाख लोग संक्रमित हैं. वहीं बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के फर्नांडो दुआर्ते अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि चीन अपनी सीमाओं के भीतर कोरोना वायरस का प्रकोप थामने के बाद कई देशों को संसाधन मुहैया करा रहा है. वो इटली को मास्क, मेडिकल उपकरण और टेस्टिंग किट उपलब्ध करा रहा है. चीन की ऐसी मदद रूस को भी मिल रही है. यह कोरोना के प्रकोप को थामने में मददगार साबित हो सकती है.
प्रोफेसर सवर्ण सिंह इस पर कहते हैं, “चीन की वृद्धि दर प्रभावित होने के बावजूद, उसकी उत्पादकता इतनी रहेगी कि वो दुनिया के दूसरे देशों को अपना उत्पाद भेज सकेगा. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वो दूसरे देशों की तुलना में पहले संकट की स्थिति से उबर रहा है. उनके यहाँ फ़ैक्टरियाँ शुरू हो चुकी हैं और उत्पादन शुरू हो गया है. हालांकि उनके उत्पादों को लेकर आलोचना भी हो रही है.”
वो आगे कहते हैं, “दूसरी ओर दुनिया में मांग बहुत है. अभी चीन 100 से ज़यादा देशों में अपनी सहायता भेज रहा है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सहायता भी ट्रेड का दूसरा रूप होता है. इसलिए कितनी भी आलोचना हो लेकिन उनके उत्पादों की मांग बढ़ेगी और चीन की आर्थिक स्थिति मज़बूत होगी.”
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विश्व स्वास्थ्य संगठन से वाकई में ग़लती हुई?
अमरीका और चीन दोनों ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी सदस्य हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को देने वाले फंड में इजाफा किया है. साल 2014 से लेकर 2018 तक चीन के फंड में 52 फ़ीसदी का उछाल आया है.
प्रोफेसर सवर्ण सिंह बताते हैं, “संयुक्त राष्ट्र के कई संस्थानों में चीन के लोगों का प्रभाव बढ़ा है. इन संस्थाओं के मुखिया चीन से हैं. अभी संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में चीन का 12 प्रतिशत का योगदान है. निश्चित तौर पर चीन का दखल संयुक्त राष्ट्र में बढ़ा है और जैसे-जैसे चीन की आर्थिक हिस्सेदारी इन अंतराराष्ट्रीय संस्थानों में बढ़ेगी वैसे-वैसे उसका दख़ल भी बढ़ेगा. राष्ट्रपति ट्रंप की चिंता का एक विषय यह भी है.”
विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जनरल पर चीन के प्रयासों की वजह से पद मिलने के आरोप लगते रहे हैं. वो विश्व स्वास्थ्य संगठन के पहले अफ्रीकी मूल के डायरेक्टर जनरल हैं.
प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, “चीन ने अफ्रीका में बड़ा हाथ खेला है. वो वहां की इंडस्ट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा योगदान दे रहा है. चीन की फंडिंग भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन में कम हो लेकिन यह सच है कि चीन ने ट्रेड्रोस की नियुक्ति में भी अफ्रीकी देशों का बड़ा साथ दिया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन से ग़लती हुई है इसमें कोई दो राय नहीं है. चीन ने चूंकि सूचनाओं को देने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पारदर्शिता नहीं अपनाई इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन से ग़लती हुई या फिर वो सब कुछ समझते हुए भी चीन का साथ दे रहा है, ये कहना थोड़ा मुश्किल है.”

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