कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का अपमान क्यों

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आमतौर पर जब लोग बीमार होते हैं तो उनके पड़ोसी और रिश्तेदार उनका साथ देते हैं और हिम्मत बढ़ाते हैं.
लेकिन, सोमवार को जिन 63 साल के बुर्ज़ुग की कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई, उन्हें और उनके परिवार को सहयोग की जगह अपमान और छुआछूत का सामना करना पड़ा.
मुंबई में रहने वाले इस बुज़ुर्ग की मौत कोरोना वायरस से मौत का तीसरा मामला था. वो दुबई से वापस लौटे थे.
दुनिया में कोरोना वायरस का ख़तरा बढ़ने के साथ ही इसे एक सामाजिक कलंक की तरह देखा जाने लगा है.
कई जगहों पर लोग मरीजों के प्रति सहानुभूति रखने के बजाय असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं. टीबी और एड्स की तरह ही लोग कोरोना वायरस में भी मरीजों और उसके करीबियों से अछूत की तरह व्यवहार कर रहे हैं.
जिस सोसाइटी में वो बुर्ज़ुग रहते थे वहां की कमिटी के सदस्य हैं दक्षेस संपत. दक्षेस बताते हैं कि आसपास की सोसाइटी ने मृतक और उनके परिवार को ही नहीं बल्कि पूरी सोसाइटी को अछूत बना दिया है.

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मौत से पहले ही बना दिया मृतक
दक्षेस संपत बताते हैं, "हमारी सोसाइटी के आसपास और भी सोसाइटीज़ हैं. हमने नहीं सोचा था कि वो लोग हमारे साथ ऐसा गलत व्यवहार करेंगे. उनकी मौत से पहले और अब भी हमें लेकर अफवाहें उड़ाई जा रही हैं और पूरी बिल्डिंग के लोगों को शक की निगाह से देखा जा रहा है."
"जैसे ही उनका टेस्ट पॉज़िटिव आया वैसे ही लोगों ने उनके लिए बुरा बोलना शुरू कर दिया. इनमें करीबी रिश्तेदार, सोसाइटी में रहने वाले लोग और जान-पहजान के लोगों शामिल थे. लोग उन्हें मैसेज करके इस बीमारी के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगे जैसे वो अपनी मर्ज़ी से बीमार होकर आए हैं."
"हद तो तब हो गई जब उनके ज़िंदा रहते व्हाट्सएप पर उनकी फोटो के साथ मौत की अफ़वाह उड़ाई गई. ये मैसेज उनके पास भी पहुंच गया. ऐसी बातों ने उनकी हिम्मत तोड़ दी जबिक वो इस सोसाइटी में कई सालों से रह रहे थे."
मृतक में इस बीमारी का पता लगने के बाद उनके परिवार, संपर्क में आए लोग, कामवाली और गार्ड का भी जांच की गई.

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डर के बावजूद ड्यूटी
दक्षेश संपत बताते हैं कि उनकी पत्नी और बेटे के सिवाए सभी के टेस्ट नेगेटिव आए थे. पत्नी और बेटे को आइसोलेशन में रहने के लिए कहा गया है.
अब हालात ये हैं कि पूरी सोसाइटी से ही आसपास की सोसाइटी वाले अलग-थलग व्यवहार कर रहे हैं. कुछ डर के वजह से दूरी बना रहे हैं तो कुछ मज़ाक उड़ा रहे हैं.
दक्षेश संपत का कहना है, "टेस्ट नेगेटिव आने के बावजूद भी दूसरी सोसाइटी वाले हमसे दूर भागते हैं. यहां आने वाली बाई को अपने यहां आने से मना कर देते हैं. रोजी-रोटी पर लात पड़ते देख वो बेचारी भी हमारे यहां आना छोड़ देती हैं. गेट के बाहर से हमारे गार्ड को कोरोना कहकर पुकारते हैं जबकि वो खुद डर के बावजूद अपनी ड्यूटी पूरी कर रहा है."
वह कहते हैं कि हाल ही में व्हॉट्सएप पर एक 18 साल के लड़के को कोरोना वायरस होने की अफ़वाह फैल गई थी जबिक ऐसा कुछ नहीं था. लोगों को थोड़ी समझदारी दिखानी चाहिए. हमारी सोसाइटी के अंदर ही कुछ लोग मृतक के परिवार को शक की नज़र से देखते हैं.
उनका कहना है कि ये लोग यहां क्यों रहे हैं. लेकिन, जब उन्हें घर में ही आइसोलेशन में रहने के लिए कहा गया है तो वो कहां जाएंगे. सोसाइटी वालों ने इस पूरे दुर्व्यवहार और अफ़वाहों को लेकर पुलिस में शिकायत की है लेकिन ये कब रुकेगा पता नहीं.

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साइकोलॉजिकल काउंसलिंग कराने की योजना
इस तरह के कुछ अन्य मामले भी महाराष्ट्र में स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचे हैं.
मुंबई में स्वास्थ्य आयुक्त अनूप कुमार कहते हैं, "शुरुआत में ऐसे एक-दो मामले जानकारी में आए थे. फिर हमने सरकारी अधिकारियों और अस्पतालों को दिशानिर्देश दे दिए थे कि वायरस से संक्रमित लोगों के साथ पूरी संवेदना और सम्मान के साथ व्यवहार करें."
"अब सोसाइटी और पड़ोसियों के मामले सामने आ रहे हैं तो उसके लिए परिवार के सदस्यों और आसपास के लोगों के साथ साइकोलॉजिकल काउंसलिंग कराई जाएगी. हम लोग सार्वजनिक तौर पर अपील कर चुके हैं और अपने सिस्टम में भी जागरूकता लाने की कोशिश की है लोगों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो."
"सोमवार को मुख्यमंत्री ने ज़िला कलेक्टर, स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ बैठक की थी और इसमें पूरी स्थिति की समीक्षा की थी. उन्होंने इसके लिए उपयुक्त कदम उठाने के आदेश दिए थे. समय-समय पर मुख्यमंत्री इस मामले की समीक्षा कर रहे हैं."

पूर्वोत्तर भारत के लोगों को कहा जा रहा कोरोना वायरस
सिर्फ़ बीमार लोगों को ही अपमान का सामना नहीं करना पड़ रहा बल्कि पूर्वोत्तर भारत के छात्र भी नस्लभेदी टिप्पणियां झेल रहे हैं. उन्हें कोरोना वायरस कहकर बुलाया जा रहा है.
पंजाब के चुन्नीकलां में पढ़ने वाले पूर्वोत्तर भारत के कई छात्र इसी तरह की नस्लभेदी टिप्पणियों का सामना कर रहे हैं. जबकि वो ना तो कोरोना वायरस से संक्रमित हैं और ना ही किसी ऐसी जगह से आए हैं जहां संक्रमण फैला हो. सिर्फ़ उनके चेहरे के कारण उन्हें अपमानित किया जा रहा है.
चुन्नीकलां में पढ़ने के लिए आए यापा बगांग बताते हैं, "पहले तो हमें चिंकी, चाइनीज़, जापानी कहते थे लेकिन अब कोरोना वायरस भी कहने लगे हैं. हमारी शक्ल-सूरत चीन के लोग से मिलती-जुलती है इसलिए लोग हमें चाइनीज़ ही समझ लेते हैं. हमसे पूछते भी नहीं की हम कहां के हैं."
"फिर कोरोना वायरस आने से तो हमें एक और नया नाम मिल गया है. राह चलते लोग भी कमेंट करके चले जाते हैं. बल्कि जब किराए पर घर लेने गए तब मकान मालिक ने कहा कि ये तो चाइनीज़ हैं, कोरोना वायरस फैल सकता है."
"कम पढ़े-लिखे लोग ऐसा बोलते तो फिर भी कोई बात नहीं. हम कई लोगों को समझा भी देते हैं कि हम भारतीय ही हैं और भारत के नक्शे में उन्हें अपना राज्य भी दिखा देते हैं. लेकिन, पढ़े-लिखे लोग भी ऐसा ही करते हैं तो बहुत दुख होता है."

नस्लभेदी व्यवहार
अरुणाचल प्रदेश के यापा के साथ ही पढ़ने वालीं रिडो नाका बताती हैं, "जब वो अपने दोस्तों के साथ ऋषिकेश घूमने गई थीं तो वहां लोगों ने हमें विदेशी समझकर घूरना शुरू कर दिया. हमने कोरोना वायरस के चलते मास्क भी लगा रहा था. तब वहां गाड़ी में बैठे एक शख़्स ने कहा कि अरे ये तो बहुत सारा कोरोना वायरस लेकर घूम रहे हैं."
"फिर राम झूले पर हम सब लोग सेल्फी ले रहे थे. वहां एक औरत ने अपने बच्चे को कहा कि हमारे नज़दीक ना जाए. यहां तक कि मुझे लोगों को नक्शा निकाल के ये बताना पड़ा कि मैं अरुणाचल प्रदेश की हूं और वो भारत में कहां है."
कुछ ऐसा ही अनुभव चुन्नीकलां में रह रहीं त्रिपुरा की स्मृति बिस्वास का है.
वह कहती हैं, "हम लोग पंजाब में 2016 से रह रहे हैं लेकिन हमारे लिए नस्लभेदी व्यवहार अभी तक चल रहा है. यहां तक कि दिल्ली में भी हमारे लिए कोरोना वायरस जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए. हम लोग कश्मीरी गेट आईएसबीटी पर बैठे थे तब वहां मौजूद कुछ लोगों ने कहा कि चीन का वायरस क्या यहां पर अभी से आ गया है."

जानकारी की कमी
यापा का कहना है, "हमें कुछ बोलने में डर भी लगता है कि कहीं झगड़ा ना हो जाए. इसलिए हम चाहते हैं कि पूर्वोत्तर के इलाक़ों के बारे में लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा बताया और पढ़ाया जाए. हम भी भारत के ही लोग हैं. इससे अच्छा व्यवहार तो विदेशी मेहमान के साथ होता है. अगर आपको हमारे चेहरे को लेकर कोई उलझन होती है तो कम से कम हमसे पूछ ही लें कि हम कौन हैं."
कोरोना वायरस को लेकर मेट्रो और बसों में भी लोगों का डर देखने को मिल रहा है. अगर कोई बार-बार छींकता या खांसता है तो लोग उसे घर पर ही रहने की सलाह दे रहे हैं. उससे दूर हटकर खड़े हो जा रहे हैं.
ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब किसी अस्पताल में कोरोना वायरस के मरीज़ को एडमिट किया गया तो पूरा अस्पताल ही खाली हो गया.
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इसकी वजह लोगों में मौजूद डर और जानकारी की कमी है. अगर उन्हें सही जानकारी होगी तो ये पता चलेगा कि ये वायरस कैसे फैलता है और संक्रमण के बाद पूरी तरह ठीक भी हुआ जा सकता है.

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