क़ासिम सुलेमानी की तुलना कर्बला की लड़ाई से क्यों?

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ईरान अब भी यूक्रेन के यात्री विमान 'हादसे' में मारे गए अपने लोगों को लेकर ग़म में डूबा हुआ है. हालांकि वहां के सरकारी मीडिया में इसे ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही है. दुर्घटनाग्रस्त यूक्रेनी विमान पर सवार 176 लोगों में 82 ईरान के थे.
बग़दाद में अमरीकी हवाई हमले में मारे गए ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी के लिए ईरानी मीडिया का लगाव दीवानगी की हद तक बना हुआ है. क़ासिम सुलेमानी को ईरानी मीडिया में अक्सर 'लोगों के दिलों का कमांडर' बताया जा रहा है.
उन्होंने ईरान की एलीट क़ुद्स फ़ोर्स की 20 साल से ज़्यादा समय तक अगुवाई की. ये एलीट क़ुद्स फ़ोर्स ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का एक हिस्सा है. क़ासिम सुलेमानी की शख़्सियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगया जा सकता है कि उन्हें देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान मिला था.
यहां तक कि मौत के बाद उन्हें लेफ़्टिनेंट जनरल के रैंक का प्रमोशन दिया गया. आठ सालों तक चले ईरान-इराक़ युद्ध (1980-88) के दौरान वे 41 साराल्लाह ब्रिगेड के कमांडर के तौर पर लड़े. मौत के बाद जनरल क़ासिम सुलेमानी का क़द ईरानी मीडिया में एक राष्ट्रीय हीरो से शिया क़ौम के मज़हबी लेजेंड के तौर पर पेश किया जाने लगा है.
सुलेमानी की ये इबादत ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए भी मुफ़ीद बैठती है, क्योंकि इससे आंतरिक मतभेदों को कम करने में मदद मिल रही है. फ़रवरी में ईरान में चुनाव होने हैं. ऐसे समय में सुलेमानी की मौत ने ईरान के कट्टरपंथियों और रूढ़िवादियों के बीच एकता का संदेश दिया है.

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मज़हबी किरदार
ईरान में ऐसा कम ही होता है कि सियासी और मज़हबी बहसों में अंतर पाया जाए. इनमें पैग़ंबर मोहम्मद के परिवार, कर्बला की लड़ाई और इमाम हुसैन की शहादत का हवाला दिया जाता है. ईरान के शिया लोगों की रूह में कर्बला की लड़ाई एक बहुत ही संवेदनशील और अहम घटना की तरह बसी हुई है.
पैग़ंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन अपने परिवार और क़रीबी 72 लोगों के साथ यज़ीद की फ़ौज के हाथों इस लड़ाई में मारे गए थे. यज़ीद उमैय्या ख़िलाफ़त के दूसरे ख़लीफ़ा थे. हुसैन 'सैयद अल-शुहादा' के तौर पर जाने जाते हैं जिसका अर्थ है 'शहीदों के सरताज.'
तब से ही शिया इस्लाम में 'शहादत' की एक ख़ास संकल्पना है जिसे 'तलवार पर ख़ून की जीत' के तौर पर देखा जाता है. ये लड़ाई वर्तमान इराक़ के कर्बला में इस्लामी महीने मुहर्रम की दसवीं तारीख़ पर हुई थी क्योंकि हुसैन ने यज़ीद का वफ़ादार बनने से इनक़ार कर दिया था. हुसैन के सौतेले भाई अब्बास इब्न अली सेना के झंडाबरदार थे.
उन्हें लड़ाई में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करने के लिए कहा गाय था. शिया पौराणिक कथाओं के अनुसार, अंत में अब्बास को मार दिया गया और जब वो पानी ला रहे थे तब उनके हाथ काट दिए गए. अब्बास के कटे हुए हाथों की छवि शिया मुसलमानों के लिए बहुत अहमियत रखती है.

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एक और कर्बला
लड़ाई के बाद हुसैन के परिवार को दमिश्क भेज दिया गया जो उमैय्या ख़िलाफ़त की राजधानी थी. वहां इमाम हुसैन की बहन ज़ैनब यज़ीद के ख़िलाफ़ उग्र भाषण दिया करती थीं. शिया इस्लाम में ज़ैनब की छवि उत्पीड़न के ख़िलाफ़ एक अवहेलना के प्रतीक की तरह है. शिया लोग हर मुहर्रम पर इमाम हुसैन की शहादत का मातम मनाते हैं.
क़ासिम सुलेमानी की हत्या के तीन हफ़्ते बाद ईरान के सरकारी मीडिया और नेता मरहूम कमांडर की तारीफ़ में लगे हुए हैं. जैसे ही सुलेमानी के मारे जाने की ख़बर आई मीडिया इसे 'शानदार शहादत' बताने में लग गया.
सभी टीवी चैनलों ने अपने चैनल की स्क्रीन में ऊपर बाईं ओर काले रंग का बॉक्स बना दिया और कमांडर की प्रशंसा में गीत बजाए गए. सुलेमानी के जनाज़े में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए. ऐसी तस्वीर केवल मुहर्रम में मातम के समय ही सामने आती है जब सभी ईरानी एक साथ सड़कों पर आते हैं.
प्रेस टीवी ने इस जनाज़े की तुलना इस्लामिक रिपब्लिक के संस्थापक अयातुल्ला रूहुल्लाह ख़ुमैनी के जनाज़े से की. जनाज़ा जैसे-जैसे ईरान की सड़कों से गुज़र रहा था लोग ताबूत पर अपनी निजी चीज़ें फेंक रहे थे ताकि वो ख़ुद को सुलेमानी के जनाज़े के क़रीब महसूस कर सकें.

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'ज़िंदा शहीद'
सुलेमानी का जनाज़ा कर्बला से निकला और बाद में उनके जन्मस्थान केरमान पहुंचने से पहले ईरान की सड़कों पर भी पहुंचा. इस दौरान भीड़ 'झंडाबरदार' के नारे लगा रही थी, जिसको अब्बास से जोड़कर देखा गया. सरकारी टीवी चैनल के प्रस्तोता ने कहा कि लोगों के 'जोश और उत्साह' की तुलना दूसरी कर्बला की लड़ाई से की जा सकती थी.
सरकारी टीवी चैनल पर जनरल सुलेमानी को श्रद्धांजलि देने के लिए म्यूज़िक वीडियो चलाए गए. ऐसी डॉक्यूमेंट्री चलाई गई जिनमें इराक़, सीरिया और लेबनान में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में उनके योगदान की प्रशंसा की गई थी.
देश के क्षेत्रीय गठबंधन 'रेसिस्टेंस फ़्रंट' को सुलेमानी के समर्थन के बाद इस फ़्रंट ने उन्हें 'रेसिस्टेंस का सैयद अल-शुहादा' कहा यानी प्रतिरोध के शहीदों के सरताज. जीते जी सुलेमनी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़ामेनेई के काफ़ी क़रीब थे और उन्हें मलिक अल-अश्तर के रूप में देखा जाता था.
मलिक अल-अश्तर इमाम हुसैन के पिता पहले शिया इमाम अली के वफ़ादार साथी थे. अपने भाषणों में ख़ामेनेई सुलेमानी की मौत पर कहते हैं कि 'शहीद होना उनकी इच्छा थी' और 'उनको इनाम मिला.' ख़ामेनेई अपने शीर्ष जनरलों को सीमा पर उनकी बहादुरी के लिए उन्हें 'ज़िंदा शहीद' के रूप में मान्यता देते हैं.

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शरीर टुकड़े-टुकड़े हो गया था
कहा जाता है कि अमरीकी ड्रोन हमले में सुलेमानी का शरीर टुकड़े-टुकड़े हो गया था. उनके हाथ की एक तस्वीर दिखाई जा रही जिसमें एक घड़ी बंधी हुई है. इस तस्वीर को कर्बला की लड़ाई से जोड़कर दिखाया गया और लोगों के दिमाग़ में अब्बास की छवि बनी हुई थी.
ईरान के नेता अपने मारे जाने के ख़तरनाक़ तरीक़ों पर चर्चा करने में शर्माते नहीं हैं.
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने बदला लेने का वादा किया था और कहा था, "उन्होंने हमारे प्यारे सुलेमानी के हाथ काट दिए. आपने तस्वीरें और वीडियो में उनके शरीर के पास उनका हाथ देखा होगा. बदले में अमरीका के पैरों को इस क्षेत्र से उखाड़ दिया जाएगा."
इस दौरान ख़ामेनेई ने सुलेमानी के 'टुकड़ों में बंट चुके शरीर' का ज़िक्र करते हुए विलाप कर रही भीड़ को और ग़मगीन किया. उन्होंने इमाम हुसैन का ज़िक्र करते हुए सुलेमानी की छवि लोगों के दिमाग़ में बनाई. ख़ामेनेई ने उनके जनाज़े को एक दूसरा 'यौम अल्लाह' (ख़ुदा का दिन) कहा जिसको आशुरा के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

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सुलेमानी की बेटी
इस दौरान सुलेमानी की बेटी ज़ैनब (इमाम हुसैन की बहन का नाम भी ज़ैनब था) ईरानी मीडिया की कवरेज में छाई रहीं. सार्वजनिक रूप से और मीडिया के सामने ज़ैनब काला बुर्क़ा पहनकर आईं और वो लगातार भीड़ को संबोधित करती रहीं.
केरमान में अपने पिता को दफ़नाए जान से पहले उन्होंने ज़ोरदार भाषण दिया जहां उन्होंने अमरीका से बदला लेने को कहा. उन्होंने कहा, 'बड़े शैतान के ख़िलाफ़ ये आमने-सामने की लड़ाई है.' साथ ही उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति को 'अज्ञानता का प्रतीक' बताते हुए कहा कि वो यहूदियों के हाथों में खेल रहे हैं.
उन्होंने कहा कि उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि उनके पिता की शहादत के बाद सब ख़त्म हो जाएगा. इसके बाद भीड़ ने 'अल्लाहू अकबर' के नारे लगाए. पिछले हफ़्ते बेरूत के नज़दीक अल-दहिया में उनके पिता की याद में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने भाग लिया.
बेरूत में उन्होंने लेबनान के हिज़बुल्ला के नेता हसन नसरल्ला से मुलाक़ात की. ये एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण उपस्थिति थी क्योंकि अब तक मीडिया ताक़तवर महिलाओं को जगह नहीं देता था. ईरान के दुश्मनों के ख़िलाफ़ उनके कड़े व्यवहार की तुलना इमाम हुसैन की बहन जैनब बिंत अली से की जाती है जिनका मक़बरा दमिश्क में है.
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तस्वीर फाड़ना अपमान
जनरल सुलेमानी का सम्मान इतना व्यापक हो चुका है कि उनकी तस्वीर के साथ किसी भी अपमान को अनादर से जोड़कर देखा जा सकता है.
यूक्रेनी विमान को गिराए जाने के बाद प्रदर्शनों में सुलेमानी के पोस्टर फाड़ते हुए वीडियो प्रसारित हुए इसको लेकर कहा गया कि ये लोग ईरानी नहीं हैं.
ईरानी प्रशासन ने मारे गए कमांडर की 'तौहीन' करने पर तेहरान में एक नाबालिग़ को गिरफ़्तार किया गया था. जिसको बाद में छोड़ दिया गया.

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