क़ासिम सुलेमानी: क्या ईरान की सेना 'बदला' लेने की हालत में है?

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- Author, रियलिटी चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अपने सैन्य कमांडर क़ासिम सुलेमानी के अमरीकी हमले में मारे जाने के बाद ईरान ने 'बदले' की बात कही है.
ईरान के सर्वोच्च धर्मिक नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनई ने बग़दाद एयरपोर्ट पर हुए हमले में जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत की ख़बर आते ही कहा कि अपराधियों को छोड़ा नहीं जाएगा.
अगर ईरान 'बदले' की बात कर रहा है तो एक अहम सवाल ये है कि ईरान की सैन्य क्षमता कितनी है और उसकी सेना कितनी ताक़तवर है.
कैसी है ईरान की सेना?
ब्रिटेन के थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटिजिक स्टडीज़ के अनुसार ईरान में लगभग पाँच लाख 23 हज़ार सक्रिय सैनिक हैं.
इसमें ईरान की सेना के साढ़े तीन लाख और इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के डेढ़ लाख सैन्यकर्मी शामिल हैं.
इसके अलावा ईरान के पास रिवॉल्युशनरी गार्ड्स के 20 हज़ार नौसैनिक भी हैं. यह समूह होर्मूज़ की खाड़ी में कई सशस्त्र पोतों के ज़रिए संचालित होता है. होर्मूज़ की खाड़ी वही जगह है, जहां पिछले साल तेल के टैंकरों पर कई हमले हुए थे.
रिवॉल्युशनरी गार्ड्स एक स्वयंसेवी समूह बासिज पर भी काबू रखता है. इस समूह ने ईरान में विरोध की कई अंदरूनी आवाज़ों को दबाने का काम किया है. ये यूनिट अकेले ही लाखों सैनिकों को इकट्ठा कर सकती है.
इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड्स की स्थापना आज से 40 साल पहले की गई थी और इसका मक़सद था ईरान में इस्लामिक व्यवस्था का बचाव करना. 40 सालों के बाद आज रिवॉल्युशनरी गार्ड्स अपने आप में एक प्रमुख सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति बन गया है.
ईरान की आधिकारिक सेना से कम सैनिकों वाला समूह होने के बावजूद इसे ईरान का सबसे मज़बूत सैन्य संगठन माना जाता है.
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विदेशों में ऑपरेशन कैसे करती है ईरानी सेना?
ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स (जिसका नेतृत्व जनरल सुलेमानी करते थे), रिवॉल्युशनरी गार्ड्स के लिए विदेशों में ख़ुफ़िया ऑपरेशन करती है और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली ख़मेनई को रिपोर्ट करती है.
माना जाता है कि इसमें कम से कम पाँच हज़ार सैनिक हैं.
यह यूनिट सीरिया में भी तैनात की जा चुकी है जहां इसने सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद के वफ़ादार सैन्य समूहों और सशस्त्र शिया मिलिशिया को मशविरा देती थी.
हालांकि अमरीका का कहना है कि क़ुद्स फ़ोर्स मध्य-पूर्व में उन समूहों को फ़ंडिंग, ट्रेनिंग और हथियार मुहैया कराता है जिसे उसने आतंकी संगठन क़रार दिए हैं. उन संगठनों में लेबनान का हिज़्बुल्लाह और फ़लस्तीन का इस्लामी जिहाद भी शामिल है.
आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान के हथियार आयात को नुक़सान पहुंचाया है. आर्थिक पाबंदियों की वजह से ही ईरान का हथियार आयात मध्य-पूर्व के देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम हो चुका है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2009-18 के बीच ईरान के हथियारों का आयात इसी अवधि में सऊदी अरब के हथियार आयात का महज 3.5% था.
ईरान का ज़्यादातर आयात रूस और चीन से होता था.
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क्या ईरान के पास मिसाइलें हैं?
हां, ईरान के पास मिसाइलें हैं. मिसाइलें ईरान की सैन्य शक्ति का प्रमुख हिस्सा हैं. हालांकि अगर एयर फ़ोर्स की बात करें तो ईरान इसमें कहीं न कहीं सऊदी अरब और इसराइल से कमज़ोर पड़ता है. ऐसे में इस कमज़ोरी की भारपाई ईरान की मिसाइलें करती हैं.
अमरीका के रक्षा विभाग का मानना है कि ईरान की मिसाइल शक्ति मध्य पूर्व के देशों में सबसे ज़्यादा है. ऐसा तब है जब ईरान के पास सिर्फ़ छोटी और मध्यम दूरी वाली मिसाइलें ही हैं.
अमरीकी रक्षा विभाग का ये भी कहना है कि ईरान स्पेस टेक्नॉलजी का परीक्षण कर रहा है जिससे इसे और ज़्यादा शक्तिशाली विकसित करने में मदद मिलेगी.
हालांकि रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टिट्यूट थिंकटैंक के मुताबिक़ ईरान को अपनी लंबी दूरी की मिसाइल का परीक्षण 2015 की परमाणु संधि के तहत रोकना पड़ा था.
इंस्टिट्यूट का ये भी कहना है कि हो सकता है कि संधि की अनिश्चितताओं की वजह से ईरान ने मिसाइल पर काम फिर से शुरू कर दिया हो.
अब भी ईरान के पास जो छोटी और मध्यम दूरी वाली मिसाइलें हैं वो सऊदी अरब और खाड़ी में कई ठिकानों को निशाना बना सकती हैं. या शायद इसराइल के कुछ ठिकानों को.
पिछले साल मई में अमरीका ने ईरान के साथ तनाव बढ़ने पर मध्य-पूर्व में एक एंटी मिसाइल रक्षा व्यवस्था का इंतज़ाम किया था. इसका मक़सद बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज़ मिसाइलों और उच्च तकनीक वाले एयरक्राफ़्ट्स का सामना करना था.

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ईरान के ग़ैर-पारंपरिक हथियार
कई वर्षों की पाबंदी के बावजूद ईरान अपने लिए ड्रोन विकसित करने में कामयाब रहा है. ईरान इराक़ में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में साल 2016 से ही अपने ड्रोन का इस्तेमाल करता आया है.
थिंकटैंक की रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ईरान अपने सशस्त्र ड्रोन्स के साथ सीरिया के इसराइली एयर स्पेस में भी जा चुका है.
जून 2019 में ईरान ने अमरीका के एक निगरानी ड्रोन को गिरा भी दिया था. इसका दावा था कि अमरीकी ड्रोन ने होर्मूज़ की खाड़ी में ईरानी वायुक्षेत्र का उल्लंघन किया था.
बीबीसी में रक्षा और कूटनीतिक मामलों के संवाददाता जोनाथन मार्कस के अनुसार ईरान सहयोगी देशों को अपनी ड्रोन तनकीन बेचने की भी मंशा रखता है.
2019 में ही सऊदी के तेल सयंत्रों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले हुए थे. अमरीका और सऊदी अरब दोनों ने इन हमलों का आरोप ईरान पर लगाया था हालांकि ने इससे इनकार किया था और कहा था हमले के पीछे यमन के विद्रोही ज़िम्मेदार थे.
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क्या ईरान के पास साइबर शक्ति है?
साल 2010 में ईरान के परमाणु संयंत्रों पर साइबर हमला हुआ था जिसके बाद इसने साइबर क्षमता में बड़े सुधार किए.
माना जाता है कि अब रिवॉल्युशनरी गार्ड के पास अपना अलग साइबर कमांड है जो व्यावसायिक और सैन्य जासूसी जैसे मामलों पर काम करता है.
2019 में अमरीकी सेना की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान ने साइबर जासूसी के लिए एयरस्पेस, प्राकृतिक संसाधन, टेलिकम्युनिकेशन कंपनियों और डिफ़ेंस कॉन्ट्रैक्टर्स को निशाना बनाया था.
2019 में ही माइक्रोसॉफ़्ट ने कहा था कि 'ईरान और ईरानी सरकार से ताल्लुक रखने वाले' एक हैकर समूह ने अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान और अमरीकी अधिकारियों के अकाउंट में सेंध लगाने की कोशिश की थी.
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