आख़िर किस दिशा में जा रहा है ईरान?

विरोध प्रदर्शन

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ईरान में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला लगातार पांचवें दिन भी जारी है हालांकि वहां के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने देश में चल रहे विरोध को 'मामूली' बताकर खारिज कर दिया है.

राजधानी तेहरान में बीती रात प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियां जलाईं और सरकार विरोधी नारे लगाए. पुलिस का कहना है कि उनके एक अधिकारी की हत्या भी कर दी गई.

राष्ट्रपति रूहानी का कहना है कि ये विरोध-प्रदर्शन 'चेतावनी नहीं मौक़ा' हैं. रूहानी के मुताबिक़ सरकार 'क़ानून तोड़ने वालों' को बख्शेगी नहीं.

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शुरुआत कहां से हुई?

इस बीच अमरीका ने 'दिलेरी से खिलाफ़त कर रहे' प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है.

ईरान में चल रहे हंगामे की शुरुआत बीते मंगलवार को मशाद शहर से हुई जहां बढ़ती क़ीमतों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए गए.

लेकिन जल्दी ही यह गुस्सा सरकार के पूरे कामकाज और नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में बदल गया.

हिंसा की ताज़ा ख़बरों के बाद तेहरान में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है.

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दस लोगों की मौत की पुष्टि

ख़बरिया एजेंसी मेहर ने बताया कि प्रदर्शनकारियों ने तेहरान में एक टैक्सी में आग लगा दी और एंगलेब स्क्वायर में चल रही रैली की क़ाबू करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी का इस्तेमाल किया.

सरकारी मीडिया में पुलिस प्रवक्ता के हवाले से ख़बर आई कि नज़फाबाद में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पुलिस पर गोलियां चलाई जिसमें एक अधिकारी की मौत हो गई और तीन घायल हो गए.

सोशल मीडिया में बरजंद, करमनशाह और शेडेगन में भी प्रदर्शन होने की ख़बर आ रही है जिससे लगता है कि विरोध प्रदर्शन तक़रीबन पूरे देश में फैल चुके हैं.

इससे पहले सरकारी मीडिया दस लोगों की मौत की पुष्टि कर चुका है. जिनमें से छह तेहरान के पास ताइसरकेन में हुई गोलीबारी में मारे गए, दो लोगों की मौत आइज़े शहर में हुई और दो अन्य दोरूड में मारे गए.

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'ये विरोध कुछ नहीं हैं'

लेकिन राष्ट्रपति रूहानी को नहीं लगता कि इन घटनाओं को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.

रूहानी ने कहा कि "यह कुछ नहीं है. आलोचना और विरोध एक मौक़ा है, न कि चेतावनी."

हालांकि उन्होंने कहा कि "दंगाइयों और क़ानून तोड़ने वालों" से सख़्ती से निपटा जाएगा.

''कुछ लोग हैं जो क़ानून और जनता के चुनाव के ख़िलाफ़ नारे लगाते हैं और क्रांति की पवित्रता और मान्यताओं का अपमान करते हैं. हमारा देश उनसे निपट लेगा.''

आईआरजीसी (ईरान रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स) ने प्रदर्शनकारियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर यह चलता रहा तो देश उन पर उसी "लौह ताक़त" का इस्तेमाल करेगा जिसके लिए ईरान जाना जाता है.

मुख्य न्यायाधीश अयातुल्लाह सादेक अमोली-लरजानी ने "दंगाइयों" और "उपद्रव करने वालों" की धरपकड़ की मांग की. उन्होंने कहा कि "कुछ लोग मौक़े का फ़ायदा उठा रहे हैं. यह ग़लत है."

ईरान में बीते कुछ दिनों में तक़रीबन 400 लोग गिरफ़्तार हो चुके हैं.

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अमरीका ने विरोध का समर्थन किया

इस बीच अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार ईरान के हालात पर ट्वीट कर रहे हैं.

सोमवार को एक ट्वीट में ट्रंप ने कहा है, "ओबामा प्रशासन के ईरान के साथ बेहद ख़राब समझौता करने के बावजूद ईरान हर मोर्चे पर नाकाम हो रहा है. ईरान के महान लोग कई सालों से दमन में रह रहे थे. वो खाने और आज़ादी के भूखे हैं. मानवाधिकारों के अलावा ईरान की स्मृद्धि को भी लूटा जा रहा है. बदलाव का समय आ गया है."

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अमरीका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी ईरान के ख़िलाफ़ सख़्त लहज़े में ट्वीट किया है. पेंस ने कहा है कि "अमरीका अतीत में हुई शर्मनाक ग़लतियों को नहीं दोहराएगा. ईरान के लोगों का विरोध उन सभी लोगों को उम्मीद देता है जो अत्याचार के ख़िलाफ़ और आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हम इन लोगों को निराश नहीं करेंगे."

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रूहानी

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'ईरान का दुश्मन है अमरीका'

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने डोनल्ड ट्रंप को ईरान का दुश्मन बताया है.

रूहानी ने कहा, "अमरीका में ये जो सज्जन हैं, जो आजकल हमारे देश के साथ सहानुभूति जता रहे हैं, ऐसा लगता है कि वो ये बात भूल गए हैं कि कई महीने पहले उन्होंने ही ईरान को चरमपंथी देश कहा था. लेकिन सच तो ये है कि ये आदमी सिर से लेकर पैर तक ईरान का दुश्मन है."

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ईरान: अब यहां से कहां?

बीबीसी फारसी के कसरा नाजी के मुताबिक़, ईरान में बड़े स्तर पर सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष है. देश की माली हालत लगातार खराब होती जा रही है और लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है.

बीबीसी फारसी की एक जांच में सामने आया कि औसतन ईरान के लोग पिछले एक दशक में 15 फ़ीसदी और गरीब हो गए हैं.

एकाध जगह से शुरू हुए प्रदर्शन अब सारे देश में फैल गए हैं और इनके और बढ़ने की आशंका है.

विरोध कर रहे कुछ लोग राजशाही की वापसी की मांग कर रहे हैं. पिछले शाह के बेटे रज़ा पहलवी ने भी विरोध का समर्थन किया है.

रज़ा फ़िलहाल अमरीका में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं. हालांकि जानकारों का कहना है कि रज़ा को भी अंदाज़ा नहीं है कि ये विरोध प्रदर्शन ज़मीनी तौर पर जा किस दिशा में रहे हैं.

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