बिहार में शिक्षक दिवस के दिन 'अपमान दिवस'

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
"पहला वेतन नौकरी शुरू करने के आठ महीने बाद मिला था. इसके बाद से चार-पांच महीना बीतने पर दो महीने का वेतन मिलता है. तीन साल की नौकरी में मुझे समय पर वेतन कभी नहीं मिला."
संतोष पाठक बिहार के क़रीब चार लाख नियोजित शिक्षकों में से हैं जिनके सामने वेतन सही समय पर नहीं मिलने से परिवार चलाने का संकट है.
अभय आर्या पटना ज़िले के ही गोपालपुर इलाक़े में एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं.
नियमित वेतन न मिलने से होने वाले परेशानियों को गिनाते हुए आर्य कहते हैं, "पैसों के अभाव में मैं किसी अच्छे मनोचिकित्सक से अपने पिता का इलाज नहीं करवा पा रहा हूं."
अपनी परेशानी को मुद्दा बनाने के लिए अब संतोष पाठक और अभय आर्य जैसे शिक्षक सोमवार को शिक्षक दिवस की जगह 'शिक्षक अपमान दिवस' मना रहे हैं.

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शिक्षक नियमित वेतन और समान वेतन सहित अपनी दस प्रमुख मांगों के समर्थन में सोमवार को बिहार के सभी ज़िला मुख्यालयों पर एक दिवसीय भूख हड़ताल पर हैं.
वे राज्यकर्मी का दर्जा दिए जाने, नियमित शिक्षकों की तरह सेवा शर्त दिए जाने, जीविका कर्मियों से निरीक्षण के निर्णय को अबिलंब वापस लेने जैसी मांगे कर रहे हैं.
नियमित वेतन की मांग की बात करें तो बिहार पंचायत नगर प्रारंभिक शिक्षक संघ के मुताबिक बीते करीब बारह वर्षों में सरकार ने नियोजित शिक्षकों को कभी भी नियमित रूप से वेतन का भुगतान नहीं किया है.

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हाल के वर्षों में शिक्षकों को ईद, दशहरा, दीवाली, होली जैसे मौके के आस-पास कुछ महीनों का वेतन एक साथ मिलता रहा है.
पुरण कुमार इस शिक्षक संघ के अध्यक्ष हैं.
वे कहते हैं, "बिहार सरकार ने संघ के साथ हुई वार्ता में कई बार यह भरोसा दिलाया कि शिक्षकों को महीने के पहले सप्ताह में सैलरी मिल जाएगी. लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है. ऐसा कर सरकार लगातार शिक्षकों को अपमानित कर रही है. इसलिए इस बार हमने शिक्षक दिवस के दिन अपमान दिवस मनाने फैसला लिया."
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