'हमारा कल्चर ही मेडल जीतने वाला नहीं है'

इमेज स्रोत, REUTERS
- Author, आकार पटेल
- पदनाम, वरिष्ठ विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
रियो ओलंपिक में भारतीय एथलीटों के ख़राब प्रदर्शन की ख़बरें पढ़कर कोई सोच सकता है और अचरज में पड़ सकता है कि खेलों में ये इतने फिसड्डी हैं...
बीते कई महीनों से मीडिया ये बताता रहा कि रियो ओलंपिक में हिस्सा लेने वाला भारतीय दल किसी भी दक्षिण एशियाई देश के मुक़ाबले में सबसे बड़ा है. इससे इस बात की संभावना बढ़ी थी कि भारतीय खिलाड़ी इस बार बेहतर प्रदर्शन करेंगे.
जब डोपिंग के आरोपों के बाद एक कुश्ती खिलाड़ी के निलंबन को वापस लिया गया तो वह दिन की मुख्य ख़बर थी. मैं ये इसलिए जानता हूं क्योंकि मैं उस दिन कुछ टीवी चैनलों पर रात के समय गेस्ट के तौर पर आमंत्रित था, लेकिन वे शो रद्द हो गए, क्योंकि टीवी चैनल इस ख़बर को फॉलो करना चाहते थे.

इमेज स्रोत, Getty
ऐसे में सवाल यही है कि क्या भारत ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है? जवाब है, हमेशा की तरह इस बार भी नहीं कर रहा है.
दरअसल इसकी दो बड़ी वजहें हैं. इसमें एक तो सर्वमान्य वजह है, जिसका बाहरी दुनिया से लेना-देना है. मेरा मतलब सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाएं और पोषण का उपयुक्त स्तर है.
जब आबादी स्वस्थ होगी और देश में बेहतर कोचिंग और ट्रेनिंग की व्यवस्था होगी, तब खिलाड़ी भी पदक जीतना शुरू कर देंगे.
इससे संबंधित कुछ क्षेत्रों में चीज़ें बेहतर हो रही हैं. उदाहरण के लिए, सुविधाएं और कोचिंग का स्तर बेहतर हुआ है, भले ज़्यादातर चीज़ें केवल क्रिकेट के लिए हुई हों, और वो भी विदेशी कोचों की मदद से. भारत में पश्चिमी देशों जैसी सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन चीज़ें बेहतर हो रही हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
भारत के अधिकतर लोग ग़रीब हैं. उन्हें उपयुक्त पोषण नहीं मिलता. देश के बहुत बड़े मध्य वर्ग को हर तरह का पोषण मिलता है.

इमेज स्रोत, AFP
हम ये भी कहते रहते हैं कि मध्य वर्ग की आबादी बढ़ रही है और इसकी संख्या कई देशों की आबादी से भी ज़्यादा है. इसके अलावा हर बार मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकार नकद इनाम और नौकरियों की घोषणा भी करती है. तो एक स्तर के बाद इस बात का बहाना नहीं बनाया जा सकता है.
हक़ीकत ये है कि एथलेटिक्स और दूसरे खेलों को क्रिकेट की तुलना में मीडिया से मदद नहीं मिलती. लेकिन ये किसी भी देश की हक़ीकत हो सकती है.
हो सकता है कि ओलंपिक इतिहास के सबसे कामयाब एथलीट माइकल फेल्प्स को न्यूयॉर्क की गलियों में लोग पहचान नहीं पाएं और बेसबॉल और बास्केटबॉल के सितारों के इर्द-गिर्द भीड़ जुट जाए. इसलिए जो चीज़ें दुनिया भर में हो सकती हैं, वही भारत में भी मौजूद हैं.
अब मैं आपको दूसरी और अहम वजह के बारे में बताता हूं. यह दुनिया और शारीरिक काम को देखने का ख़ास नजरिया है. इसे समझने के लिए एक राजनीतिक उदाहरण देखते हैं.

इमेज स्रोत, dattu bhokanal
अमरीका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफ़रसन अपने जीवन की तमाम सुबह घर से बाहर निकलते थे और हवा का दबाव अपने बैरोमीटर से नापते थे. अमरीका के 43वें राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश अपने फॉर्म हाउस में ख़ुद से काम करते थे.
भारत में नेता ऐसा कुछ करते होंगे, क्या आप इसकी कल्पना भी कर सकते हैं? नहीं, क्योंकि हममें से भी तो कुछ ही लोग ऐसा करते हैं. यह केवल आर्थिक कारणों से नहीं होता, हमारे यहां नौकरों की संस्कृति है.
हमें शारीरिक श्रम आकर्षित नहीं करता. ऐसा करना सामाजिक तौर पर निचले तबके से होने का सूचक है. अगर बाग की देखभाल करने वाला या फिर गाड़ी साफ़ करने वाला कोई मिल जाए, तो हम ये काम ख़ुद से नहीं करते. काम करने से मिलने वाले आनंद का तो सवाल ही नहीं उठता...
ऐसी संस्कृति में जहां हम शारीरिक श्रम नहीं करते हों, वहां सुविधाएं चाहे जितनी बेहतर हो जाएं, विश्वस्तरीय एथलीट नहीं निकल सकते. अहम बात ये है कि हम शारीरिक श्रम में आनंद नहीं महसूस करते. ज़्यादातर भारतीय शारीरिक श्रम जिम में करते हैं.
अगर घर पर भी कोई सोफा हटाना या दूसरी जगह ले जाना हो तो वो काम कोई दूसरा आदमी करेगा. मैं ऐसे कुछ अमरीकी और यूरोपीय करोड़पतियों को जानता हूं जो अपना काम किसी दूसरे से करने को नहीं कहते. वे ये भी नहीं चाहते कि कोई दूसरा शख़्स उनकी निजी ज़िंदगी में दखल दे. वो रोजमर्रा का अपना काम ख़ुद करते हैं.

इमेज स्रोत, PTI
हम ऐसे नहीं हैं और ये नज़र आने वाला तथ्य है.
ऐसी संस्कृति वाली जगह में कोई युवा पूरी एकाग्रता से अपनी शारीरिक क्षमता को बेहतर बना पाएगा, ये संभव नहीं लगता है.
साफ़ है कि ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ी पदक नहीं जीत पा रहे हैं, तो इसकी कोई बाहरी वजह नहीं है. यह हमारी संस्कृति है. ऐसी ही संस्कृति वाले पड़ोसी देश बांग्लादेश और पाकिस्तान को मिला लें तो हमारी आबादी 1.6 अरब है, दुनिया की आबादी का करीब एक चौथाई. लेकिन ओलंपिक में हम नगण्य हैं.
हमारी स्थिति ऐसी ही रहेगी, हमारी एथलीटों की संख्या को देखकर हमें एकाध पदक भी मिल जाए तो भी लंबे समय तक हालात यही रहेंगे.
हम इस पर अचरज कर सकते हैं कि हमारे साथ क्या ग़लत हो रहा है और नौकर की बनाई गई चाय पीते हुए हम इस पर चर्चा भी कर सकते हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












