कश्मीर में शांति के विकल्पों पर विचार

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
लगभग एक पखवाड़े से अशांत भारत प्रशासित कश्मीर में शांति व्यवस्था किस तरह बहाल की जाए, इस सवाल का जबाव प्रशासन अभी तक नहीं खोज पाया है.
सुरक्षाबलों के साथ झड़प में हिज़बुल कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद प्रदर्शनकारी और सुरक्षाबलों के बीच टकराव में 40 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं जिनमें से अधिकतर की उम्र 25 साल से कम है.
घाटी में मौजूदा संकट से जूझ रही मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की सरकार पृथकतावादियों की मांगों के अलावा शांति के अन्य विकल्पों पर विचार कर रही है.
पिछले कई दिनों से बंद स्कूलों को दोबारा खोलने के फैसले की आलोचना हो रही है.

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दो बच्चों के पिता मंज़ूर डार कहते हैं, ''कर्फ्यू और संचार के अन्य साधन बहाल किए बिना उन्होंने अचानक घोषणा कर दी कि 21 जुलाई से स्कूल खुल रहे हैं. ये तो हद हो गई. वे हमारे बच्चों को ढाल बनाना चाहते हैं.''
हालांकि अख़बारों पर लगी पाबंदी हटा ली गई है, लेकिन सड़कें अभी भी सूनी हैं. श्रीनगर के एक छात्र का कहना है, ''पिछली रात हमने एक मशाल जुलूस निकाला, लेकिन सुरक्षाबलों ने हमें भला-बुरा कहा. हमने भी पत्थर फेंके लेकिन उन्होंने हम पर गोलियां चलाईं.''
गुरुवार को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्वदलीय बैठक बुलाई. लेकिन इसमें मुख्य विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस शामिल नहीं हुआ. नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने इसकी वजह बताई, ''महबूबा नियंत्रण में नहीं हैं, वो निर्णय नहीं ले सकती हैं. उन्होंने जनता का भरोसा खो दिया है.''

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सर्वदलीय बैठक में शामिल होने से पहले कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ ने बीबीसी से कहा, ''वर्ष 2010 में हमने तब सैन्य कानून खत्म करने के तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आह्वान का समर्थन किया था. तब भारत के गृहमंत्री ने मुझसे कहा था कि वो इसके लिए तैयार हैं लेकिन रक्षा मंत्री सैन्य जनरलों की सुनेंगे जो इस क़ानून को हटाने के लिए तैयार नहीं है.''
भारत प्रशासित कश्मीर में बीते 25 वर्षों से ऑर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर्स एक्ट लागू है जिसका स्थानीय लोग विरोध करते रहे हैं.
इस बीच पृथकतावादी नेताओं ने एक साझा बयान जारी किया है जिसमें बंद और विरोध प्रदर्शन चार दिन के लिए बढ़ा दिए हैं.
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