'ये हैं श्री वात्स्यायन, 'कामसूत्र' के लेखक'

- Author, ओम थानवी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सृजन को ऊँचा या नीचा बताना टेढ़ा काम है. ऐसा करना ख़तरे से ख़ाली भी नहीं. कौन लेखक बड़ा है कौन छोटा, कौन कलाकार महान है कौन चलताऊ, इसे कौन तय कर सकता है?
कह सकते हैं यह काम समय करता है. लेकिन सरकारें समय की कब सुनती हैं, जब उनके पास अपना समय थोड़ा होता है?
इसलिए क्या हैरानी कि हमारे संस्कृति मंत्रालय ने देश के कोई एक करोड़ लेखकों, चित्रकारों, गायकों, वादकों, नृत्यकारों, वास्तुकारों, मूर्तिकारों, हस्तशिल्पियों, कठपुतली-कलाकारों, रंगकर्मियों आदि की कोटि तय करने का बीड़ा उठाया है.
पिछले साल जारी किए गए एक विज्ञापन के जवाब में मिले आवेदनों की छँटनी कर लेखकों-कलाकारों का दरज़ा तय किया जा रहा है.

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सरकार का मंसूबा है कि इस तरह विज्ञापनों से आवेदन आमंत्रित कर देश के छह लाख गाँवों में कार्यरत कलाकारों की एक विशाल सूची और श्रेणी का निर्धारण कर लिया जाएगा.
यह काम संस्कृति मंत्रालय के अधीन काम करने वाला एक स्वायत्त संस्थान करेगा.
नए विधान के मुताबिक़, तीन दरज़े तय किए गए हैं - असाधारण (आउटस्टैंडिंग), उदीयमान (प्रॉमिसिंग) और आशारत (वेटिंग).
"स्वायत्त" संस्थान ने अपने आरम्भिक प्रयास में 185 कलाकारों का दरज़ा-बंधन कर भी डाला है.

इस दरज़ा-बंधन से ही तय होगा कि सृजन-क्षेत्र का कौन साधक सरकारी आयोजनों में आमंत्रित होगा, कलाकारों के समूह या प्रतिनिधिमंडल में विदेश जाएगा, उसे कितना मानदेय मिलेगा, कौन अभी बुलाया न जाएगा पर भविष्य के लिए सम्भावनाशील समझा जाएगा.
ज़ाहिर है, पहले दो दरज़े ही अहम होंगे.
अख़बारों में सामने आए नामों पर सरसरी नज़र डालें तो अव्वल दरज़े का एक भी भारतीय लेखक या कलाकार अहम सूची में नज़र नहीं आता.
जो नाम पहचान में आते हैं, उनमें बस एक कथक नृत्यांगना हैं और एक अंगरेज़ी नाट्यसंस्थान, जिन्हें "असाधारण" मानना अनावश्यक विवाद में पड़ना होगा.
एक उद्योगपति सांसद का नाम भी पहचान में आता है जिनकी कुचिपुड़ी नृत्यांगना पत्नी "उदीयमान" सूची में मौजूद हैं.
बहरहाल यह सूची प्रायोगिक है. सम्भव है एक करोड़ नामों की सूची बनने पर कुछ निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ हस्तियों के नाम भी इसमें जुड़ जाएँ.

लेकिन क्या प्रतिभाओं को श्रेणीबद्ध करने का यह तरीक़ा अच्छा है? क्या इससे कलाकारों की पहचान सही होगी और उनका मान बढ़ेगा?
क्या श्रेष्ठ या असाधारण कोटि के सभी कलाकार, विज्ञापनों की जानकारी रखते हुए अपनी कोटि के निर्धारण के लिए सरकार को 'आवेदन' करना चाहेंगे?
देखा जाय तो श्रेणीकरण नई चीज़ नहीं है. आकाशवाणी में दशकों से गायकों-वादकों-साजिंदों का दरज़ा तय होता आया है. उसी के अनुसार उनका मानदेय, उनके कार्यक्रमों का प्रसारण निर्धारित होता है.
लेकिन पहले वहाँ यह काम मुख्यतः कलाकारों की राय से होता था. फिर इसे अधिकारी तय करने लगे और स्तर गिरने लगा.

संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का कहना है कि प्रतिभाओं की श्रेणी उनकी 'लोकप्रियता, उम्र और अनुभव' के अनुरूप तय होगी. मगर यह कसौटी अपने आप में विवादास्पद साबित हो सकती है.
मसलन, 'लोकप्रियता' कला की दुनिया में कोई समादृत मूल्य नहीं है. कुछ क्षेत्रों में जैसे लोककलाओं में - लोकप्रिय होना स्वाभाविक होता है.
लेकिन गम्भीर काव्य, शास्त्रीय गायन-वादन या नृत्य आदि में लोकप्रियता बड़ा मूल्य नहीं है, कसौटी तो हरगिज़ नहीं.
अगर लोकप्रियता को कसौटी मान लिया जाय तो अशोक चक्रधर पहली श्रेणी के कवि साबित होंगे, विनोद कुमार शुक्ल को शायद प्रतीक्षा-श्रेणी हासिल हो!
इस क़िस्म के मूल्य-बोध और सांस्कृतिक दिवालियेपन के चलते ही क्या भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट, फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, फ़िल्म प्रमाणीकरण (सेंसर) बोर्ड, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र आदि में अयोग्य या ग़ैर-पेशेवर लोग नहीं थोपे गए हैं?

दूसरी ज़रूरी बात यह है कि कला जैसे संवेदनशील मामले में श्रेणीकरण आख़िर करेगा कौन? अधिकारियों और कलाकारों की एक समिति. लेकिन समिति कौन बनाएगा?
नेता और उनके चहेते अधिकारी. समिति के कलाकारों का चयन भी अधिकारी (या उनके आका) ही तो करेंगे.
कांग्रेस से लेकर भाजपा तक अगर लेखकों-कलाकारों को पद्म-सम्मानों से नवाज़ने का जायज़ा लिया जाय तो देश की बड़ी प्रतिभाएँ इस सूची से बाहर ही नज़र आएंगी.
ये सूचियाँ भी अधिकारी बनाते हैं. उनकी समितियाँ बनती हैं, सिफ़ारिशें मंगवाते हैं, चयन करते हैं.

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अधिकारियों में कला-संस्कृति के ज्ञानी अपवादस्वरूप ही मिलते हैं. वरना ज़्यादातर अधिकारी अपने आका अर्थात् सत्ताधारी नेताओं की भृकुटि के अनुसार चलते हैं.
औरंगज़ेब पता नहीं क्यों बदनाम हुआ, कुछ अधिकारी तो साहित्य, संस्कृति और कलाओं की दुनिया में अपनी बेअक़्ली के झंडे गाड़ने वाले साबित होते आए हैं.
प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने एक संस्मरण में लिखा है कि दूर देश में भारत के एक राजदूत ने उनके सम्मान में दूतावास में भोज किया, पर परिचय यों दिया, "ये हैं श्री वात्स्यायन, हमारी मशहूर रचना 'कामसूत्र' के लेखक"
अज्ञेय ने राजदूत की बुद्धि पर तरस खाते कुछ आभार जताते कहा, "मैं लेखक तो ज़रूर हूँ, वात्स्यायन भी हूँ, पर 'कामसूत्र' का रचयिता नहीं हूँ!"
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