...और जी उठा पेरुमल मुरुगन!

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बैंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
मद्रास हाईकोर्ट ने प्रसिद्ध तमिल लेखक और प्रोफ़ेसर पेरुमल मुरुगन के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं और वे लिखना फिर से शुरू कर दें.
पेरुमल के खिलाफ तिरुचेंगोडे के निवासियों की ओर से दायर किए गए आपराधिक मामले को भी अदालत ने ख़ारिज कर दिया है.
अदालत ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया है कि वह इस तरह के विवादों से निपटने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम बनाए.
पेरुमल मुरुगन ने इस फैसले के बाद फिर से लिख़ने का एलान किया है. उनके प्रकाशक कन्नन सुंदरम ने पेरुमल के हवाले से अपने फ़ेसबुक पन्ने पर (अंग्रेज़ी में) लिखा:
"मैं इस फैसले से बहुत खुश हूं.
मेरा दिल बुझ चुका था, इस फैसले से उसे नई जिंदगी मिली है.
मैं अदालत के आदेश की अंतिम लाइनों में छिपे उम्मीद के सहारे फिर से उठ खड़े होने की कोशिश कर रहा हूं.
अदालत ने फैसले में कहा- लेखक को वो करने दें जो वह सबसे अच्छा करता है. उसे लिख़ने दें.
मैं नए सिरे से शुरुआत करुंगा. इस मुश्किल घड़ी में जिन्होंने मेरा साथ दिया उनका शुक्रिया. और मेरे खिलाफ़ खड़े होने वाले दोस्तों का भी शुक्रिया.
फूल फिर से खिल उठा है
एक बड़े तूफ़ान के बाद
तेज़ खुशबू
मीठे भाव
भव्य शान लेकर आया
अब उसकी खुशबू सबको भिगोएगी
और सब पहले जैसा हो जाएगा."
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था- "कला अक्सर मन को झकझोड़ती है. यह सबके लिए नहीं होती. सबको पढ़ने के लिए मजबूर भी नहीं करती. पढ़ने न पढ़ने का फैसला पढ़ने वालों पर होता है."

इमेज स्रोत,
पेरुमल मुरुगन ने 2015 के शुरुआत में अपनी एक किताब का विरोध होने के बाद हमेशा के लिए लिखना छोड़ देने की घोषणा की थी.
स्थानीय हिन्दू संगठनों और जातीय समूहों ने उनके एक उपन्यास 'मधोरुबगन' के ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन किए थे.
मुरुगन ने अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा था, "लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है."
तमिल उपन्यास "मधोरुबगन" के प्रकाशक कन्नन सुंदरम ने भी अदालत के फ़ैसले पर प्रसन्नता ज़ाहिर की है. उन्होंने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा हैः ''यह फैसला हौसला बढ़ाने वाला है. लोग लगातार पेरुमल की किताबों की मांग कर रहे हैं. लेकिन पिछले 18 महीनों से उनकी कोई भी किताब पढ़ने के लिए उपलब्ध नहीं है."

उन्होंने आगे लिखा- "हम अदालत के फ़ैसले का इंतजार कर रहे थे. अब जब फैसला आ गया है तो वे बिना किसी डर के फिर से लिखना शुरू कर सकते हैं. वे अब लिखने के लिए पूरी तरह से आजाद हैं. उनकी सुरक्षा अब सरकार की जिम्मेदारी है. मैं उनकी पुरानी किताबों को फिर से प्रकाशित करने के लिए उनकी इजाज़त लूँगा. अब उन्हें थोड़ा वक्त दें. उन्होंने पुराने तमिल साहित्य का संपादन करने की इच्छा भी ज़ाहिर की है."
तमिल इतिहासकार प्रोफेसर एआर वेकंटाचलपट्टी भी मुरुगन की लेखन में वापसी से खुश हैं. उनहोंने ही अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में लिखते हुए इस मामले को सबके सामने रखा था.
वो कहते हैं, ''व्यक्तिगत तौर पर तमिल साहित्य का पाठक और पेरुमल का दोस्त होने के नाते मैं बहुत खुश हूं. लेकिन आज मुझे भारत का नागरिक होने पर बहुत गर्व हो रहा है क्योंकि अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी को फिर से रेखांकित किया है."

वेकंटाचलपट्टी ने कहा, ''पिछले डेढ़ साल का वक्त पेरुमल के लिए काफी कठिन रहा. उन्हें विवाद के कारण अपना पैतृक घर तक छोड़ना पड़ा."
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