पेरूमल जी, आपकी घोषणा से जीता कौन....

- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
तमिल भाषा के मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपने फ़ेसबुक पेज पर ये ऐलान किया कि वे लिखना छोड़ रहे हैं.
वे अपने उपन्यास 'मधोरुबगन' के विरोध से गुस्से में हैं और निराश भी. 'मधोरुबगन' का स्थानीय हिंदूवादी और जातिवादी समूह भारी विरोध कर रहे हैं.
मुरुगन पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया जा रहा है. दिसंबर में दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी समूह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इस किताब की प्रतियां जलाईं थीं.
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भाई पेरूमल मुरुगन जी, ये क्या बात हुई कि आपने आइंदा न लिखने की क़सम खा ली. आपका क्या ख़्याल है कि अपनी सब क़िताबें जला देने का एलान करके आपने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है.
आपके इस जज़्बाती एलान से वे लोग शर्मिंदा हो जाएंगे जो चाहते हैं कि सब अंधे हो जाएं और ज़बानें कट जाएं और सब के दिमागों का अपहरण हो जाए.
नहीं पेरुमल जी, ऐसा बिलकुल नहीं है. जरा अपनी खिड़की से झांक कर तो देखिए कि वे लोग शर्मिंदा होने की बजाय जीत का निशान बना रहे हैं. तो फिर जीता कौन?
अब वो किसी और की तरफ़ चल पड़ेंगे, बंद करो, बंद करो के नारे लगाते हुए, क्या यही चाहते हैं आप.
'लिखते रहिए'

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आप जैसा महान लेखक यही करेगा तो हम जैसे छुटभइये लिखाड़ किस गिनती में शुमार हैं. इसलिए पेरुमल जी अपना एलान वापिस लें और घोषणा करें कि मैं तो लिखूंगा और लिखता ही रहूंगा.
अब पुराने उदाहरण क्या दूं, ये अपने तुर्क लेखक हैं न, उरहान पामुक, उसको तो जेल की सजा भी हो गई थी फिर उसी की तरह की एक और अदालत ने कहा कि पामुक साहब, मिस्टेक हो गई, आप लिखते रहिए.
मंटो पर मुकदमा

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और पामुक साहब से भी बहुत पहले उर्दू के किस्सागो सआदत हसन मंटो पर नंगे-पुंगे अफ़साने लिखने के पांच मुकदमे ठोंके गए पर हर बार मजिस्ट्रेट ने मुक़दमा करने वाले व्यक्ति से एक ही सवाल पूछा कि ये नंगापन क्या होता है? कोई समझाएगा. सब एक दूसरे को देखने लगे.
क्योंकि मैं जिसे नंगा समझता हूं, हो सकता है कि वो आपके ख़्याल में नंगा न हो तो फिर? और ये अपने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और जोश मलीहाबादी थे न, नाम तो आपने ज़रूर सुना होगा.
फ़ैज़ की शायरी

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उन पर अयूब ख़ान की सरकार ने पाबंदी लगाई कि रेडियो पाकिस्तान पर उनकी शायरी नहीं बजेगी. क्योंकि दोनों सुरखे हैं और पाकिस्तान की विचारधारा के खिलाफ भी.
आज अयूब ख़ान तो नहीं हैं, लेकिन फ़ैज़ और जोश आज भी हैं. आप ये देखिए पेरुमल जी कि कल का लड़का रायफ़ बदावी जिसे इस तरह के ब्लॉग लिखने के जुर्म में बस एक हज़ार कोड़ों और दस साल कैद की सजा सुना दी गई कि मुझे भी बोलने की आज़ादी दो.
रायफ़ बदावी का मामला

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पचास कोड़े उसकी पीठ पर पड़ भी चुके हैं, मग़र मजाल है कि इस लड़के ने मुंह से 'सी' की आवाज़ भी निकाली है. अब भी वह माफ़ी मांगने की बजाय 950 कोड़े खाने को तैयार बैठा है.
मग़र सुना है कि सउदी सरकार उसकी सजा पर दोबारा ग़ौर कर रही है. पेरुमल मुरुगन साहिब, अच्छे लेखक की एक निशानी ये भी होती है कि उससे सब लोग खुश नहीं रहते हैं.
अगर किसी लेखक से सभी पढ़ने वाले सहमत हो जाएं तो फिर उस लेखक को खुद पर शक करना चाहिए. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपने कुछ ऐसा ज़रूर लिख दिया है कि इससे सामाजिक विभाजन के प्रचारकों की दुम पर पांव पड़ गया है.
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