यूंहीं नहीं भड़के राज ठाकरे, चुनाव नज़दीक हैं

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- Author, रक्षित सोनावने
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
ग़ैर मराठियों के ऑटोरिक्शा परमिट के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे का बयान मुंबई के नगरपालिका चुनावों के पहले राजनीतिक हैसियत बचाने की उनकी कोशिश है.
राज ठाकरे के चिढ़ने की कई वजहें हैं. साल 2014 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी का सफ़ाया हो गया था और उसके बाद कुछ नज़दीकी लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया.
बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन पर शिव सेना का क़ब्ज़ा है और यहां साल 2017 में चुनाव होने हैं.
इसे देखते हुए ही राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे सड़कों पर उतरें. उन्होंने मान लिया है कि ऑटोरिक्शा के ज़्यादातर नए परमिट ‘बाहरी’ लोगों को दिए गए हैं.

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एमएनएस का मुख्य राजनीतिक विरोधी दल शिव सेना है, जहां उनके चाचा बाल ठाकरे ने उन्हें सियासी गुर सिखाया था.
चूंकि दोनों ही राजनीतिक दलों का वोट बैंक एक ही है, लिहाज़ा राज स्थानीय मतदाताओं को आश्वस्त कराना चाहते हैं कि उनकी पार्टी शिव सेना से बेहतर है.
राज उसी ठाकरे ख़ानदान के हैं, जो ख़ुद को मराठी मानुष का स्वयंभू रक्षक मानता है.
उनका जन्म 14 जून, 1968 को हुआ था. उनके संगीतकार पिता श्रीकांत बाल ठाकरे के भाई थे. राज का बचपन का नाम स्वराज श्रीकांत ठाकरे था.
उनका बचपन दादर के शिवाजी पार्क में उच्च वर्ग के लोगों के इलाक़े में सुख से बीता. वे अपने चाचा के शब्द और उनकी भाव भंगिमा की नक़ल करते बड़े हुए.

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उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पढाई की. वे अपने चाचा की पत्रिका ‘मार्मिक’ के लिए कार्टून बनाया करते थे.
बालासाहेब ठाकरे के बेटे उद्धव फ़ोटोग्राफ़र थे और शुरुआती दिनों में राजनीति में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. लिहाज़ा राज को उम्मीद थी कि वे अपने चाचा की जगह ले सकेंगे.
युवा नेता के रूप में राज ने मराठी मानुष को रोज़गार और व्यवसाय के मौक़े देने के लिए शिव उद्योग सेना की स्थापना की.
उन्होंने इसके लिए पैसे इकट्ठा करने के मक़सद से पॉप स्टार माइकल जैक्सन का एक शो भी मुंबई में आयोजित किया.
मराठी थिएटर की शख़्सियत मोहन वाघ की बेटी शर्मिला से राज ठाकरे की शादी हुई और उनके दो बच्चे हैं, अमित और उर्वशी.
राज को कुत्ते, ख़ासकर ग्रेट डेन्स पसंद हैं और वे उनके साथ खेलते हैं.

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राज के नज़दीक के लोगों का कहना है कि उन्हें हिटलर की कार्यशैली पसंद है और उनके पास इस जर्मन नेता से जुड़ी सीडी और डीवीडी हैं.
चाचा की तरह ही राज को भी बॉलीवुड की शख़्सियत से हेलमेल पसंद है. स्थानीय लोगों की भावनाएं देखते हुए उन्होंने कई बार बॉलीवुड के इन लोगों की ‘बाहें मरोड़ी’ हैं.
उनके दोस्तों में खिलाड़ी, उद्योगपति और महाराष्ट्र के सभ्रांत वर्ग के लोग शामिल हैं. उनका दावा है कि उनके पास महाराष्ट्र के विकास के लिए एक ब्लूप्रिंट है और एमएनएस के सत्ता में आने पर इसे लागू किया जाएगा.
राज ठाकरे के लिए साल 2003 तक शिव सेना में सब कुछ ठीक चल रहा था. पर उसी समय बालासाहेब ने अपने बेटे उद्धव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. इससे दोनों में कार्यशैली को लेकर झगड़े शुरू हो गए.
उद्धव ने ‘मी मुंबईकर’ का मुद्दा उठाया, जिसका मक़सद मुंबई के सभी नागरिकों को अपने से जोड़ना था. पर इससे उनके विरोधी काफ़ी निराश हुए.

साल 2004 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के समय टिकट देने के मुद्दे पर गंभीर मतभेद उठ खड़े हुए.
साल 2005 में नारायण राणे ने शिव सेना छोड़ी और कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्होंने आरोप लगाया था कि उद्धव को घेरे रहने वाले क्लर्कों का एक गुट शिव सेना चलाता है.
इसके बाद राज ठाकरे ने 2006 में पार्टी छोड़ दी और एमएनएस बना ली. वे अपनी पार्टी के पोस्टरों में बालासाहेब की तस्वीर का इस्तेमाल करते थे, पर बाद में शिव सेना प्रमुख ने उन्हें ऐसा न करने को कहा.
शुरू में राज अपनी पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए दलितों और मुसलमानों के बीच पहुंच बनाना चाहते थे. वे इस तरह एमएनएस के झंडे में नीला और हरा रंग जोड़ना चाहते थे.
पर एक साल तक कुछ ख़ास हासिल न होने के बाद उन्होंने ‘भूमि पुत्रों’ पर ही ध्यान केंद्रित करने को अपना एजेंडा बनाया.

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बाद में मुंबई में भोजपुरी फ़िल्मों को कर में छूट देने के फ़ैसले और उत्तर भारतीयों के छठ पूजा आयोजित करने की शिव सेना की कोशिशें एमएनएस के लिए वरदान साबित हुईं.
रेलवे में नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं के दौरान उत्तर भारतीयों पर एमएनएस के कार्यकर्ताओं के हमले बढ़े. इससे स्थानीय युवाओं के बीच उनका समर्थन बढ़ा.
एमएनएस ने साल 2007 में हुए म्युनिसिपल चुनावों में पहली बार सीटें जीती. इसे कुल 45 सीटें हासिल हुईं, जिनमें बीएमसी की सात और नासिक की 12 सीटें शामिल हैं.
एमएनएस ने साल 2008 में अंग्रेजी के साइन बोर्डों के साथ तोड़फोड़ की और मराठी भाषा में साइन बोर्ड लगाने की मांग की. उत्तर भारत से आए फेरी वालों और रेलवे की परीक्षा देने आए छात्रों पर हमले बढ़े.

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इसके बाद साल 2009 में स्थानीय चुनावों में एमएनएस ने 13 सीटें जीतकर अपनी धाक जमाई.
इसे लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं मिली, पर इसने एक दर्जन से ज़्यादा सीटों पर शिव सेना या भारतीय जनता पार्टी का खेल ज़रूर बिगाड़ दिया.
एमएनएस विधायकों ने समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आज़मी को हिंदी में शपथ नहीं लेने दी.
एमएनएस ने बाहरी लोगों के प्रति घृणा की राजनीति जारी रखी और शिव सेना के लिए दिक़्क़तें पैदा कीं. इसने 2012 में नासिक के नगरपालिका चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठजोड़ किया और शिव सेना के हाथ से सत्ता छीन ली.
राज ठाकरे ने नियत समय बीतने के बाद भी सड़कों की सही देखभाल किए बिना ही टोल टैक्स वसूलने का मुद्दा ज़ोरों से उठाया. सरकार को टोल टैक्स वसूलने वाले 45 नाके बंद कर देने पड़े.

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राज की नई आक्रामकता मराठी मानुष का विश्वास फिर से जीतने की कोशिशों का नतीजा है. उनकी नज़र बीएमसी चुनावों पर है और वे प्रवासियों पर हुए 2008 के हमलों का दौर एक बार फिर शुरू करना चाहते हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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