यहां राष्ट्र गान से शुरू होता है दफ़्तर का काम

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार के वैशाली ज़िले के सरकारी दफ़्तरों में रोज़ाना कामकाज की शुरुआत राष्ट्र गान से होती है.
ज़िलाधिकारी रचना पाटिल के विशेष आदेश पर ऐसा होता है.
यह आदेश इस साल एक जनवरी से ही लागू है.
इसकी पुष्टि करते हुए रचना पाटिल ने बीबीसी से कहा, "हम सब राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपना योगदान दे रहे हैं. देशभक्ति की भावना काम करने में ऊर्जा देती है."
इसी तरह ज़िलाधिकारी ने सरकारी दफ़्तरों में जीन्स जैसे अनौपचारिक कपड़ों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है.
कोई सैंडल पहन कर भी इन दफ़्तरों में नहीं घुस सकता.

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पाटिल ने कहा, "आपका परिधान आपके व्यवहार को दर्शाता है. इससे बेहतर कार्य संस्कृति को बल मिलता है."
कई सरकारी अफ़सरों और कर्मचारियों ने राष्ट्रगान की पहल का स्वागत किया है.

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डिप्टी कलेक्टर मोहम्मद ज़फ़र आलम के मुताबिक़ इससे कर्मचारियों में अनुशासन पैदा हुआ है और वे समय पर दफ़्तर आने लगे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "अब 98 फ़ीसदी कर्मचारी समय पर दफ़्तर पहुँच रहे हैं. यह व्यवस्था पहले ही की जानी होना चाहिए थी."
सहायक ध्रुवदेव कुमार भी उनकी बातों से सहमत हैं.
तो क्या ज़िलाधिकारी की इस पहल से सरकारी दफ़्तरों की कार्य संस्कृति भी बदल रही है?

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अपने निजी कामों के सिलसिले में बाबुओं और अफ़सरों से मिलने वाले इससे पूरी तरह इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते.
मंझौल से कलेक्ट्रेट दफ़्तर पहुँचे विनोद कुमार ने बीबीसी से कहा, "सब कुछ पहले जैसा ही है. काम में कोई बदलाव नहीं आया है. लोग समय से दफ़्तर आ जाते हैं, लेकिन हाज़िरी बनाकर उसी पुराने ढर्रे से काम करते हैं."

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हाजीपुर के ओमप्रकाश यादव कहते हैं कि राष्ट्रगान का कार्यक्रम तो अच्छा है, लेकिन जनता का कोई काम संतोषजनक तरीक़े से नहीं हो पा रहा है.
महनार से आईं सुनीता देवी कहती, "मैडम हैं, तब तक राष्ट्रगान चलेगा. बाद में भी जारी रहे, तो इसका कुछ असर ज़रूर दिखेगा."
रचना पाटिल 2010 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं और मूलतः छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव की रहने वाली हैं.
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