भारत ने किससे सीखा 'मुरब्बा' बनाना?

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, मधुलिका दाश
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अब तक आपने जाना कि तंदूर, दम बिरयानी, पनीर, चीज़, सॉस, और शर्बत वग़ैरह कैसे भारतीय रसोई तक पहुंचे. तीसरी और अंतिम कड़ी में जानते हैं कुछ और प्रमुख व्यंजनों के बारे में.
ब्रिटिश लोगों ने भारत में अपने भोजन की थाली को ज़ायकेदार और अपने स्वाद के हिसाब से तैयार करने के लिए कुछ प्रयोग किए. अंग्रेज़ों ने भारत के गरम मसाले के साथ ही कुछ और मसालों को मिलाकर आज भारत में हर जगह पसंद किया जाने वाला कढ़ी पाउडर तैयार किया था.

इसकी पूरी संभावना है कि अगर ऐसा नहीं होता तो गरम मसाले के अलावा कुछ और मसाले आज भी भारत के लोकप्रिय मसालों में शामिल नहीं होते.
हमारे पास इससे पहले 'पोटली' मसाला हुआ करता था जो भोपाली व्यंजनों के साथ ही बाक़ी कई व्यंजनों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था.
वास्तव में पोटली मसाला 'पंच फोरन' की तरह का एक मिश्रण था. यह साबुत मसाला होता था जो स्वाद और सेहत के लिहाज से इस्तेमाल किया जाता था.

इमेज स्रोत, AP
अब अगर रोटी की बात करें तो यह भारत का व्यंजन नहीं था. अगर बेकिंग या सेंकने की कला अमरीका से भारत नहीं पहुंची होती और बाद में इस कला को डच लोगों ने और भी बेहतर नहीं किया होता तो यह भी माना जा सकता है कि भारत में 'चपाती' कभी पहुंचती ही नहीं.
बेकिंग के लिए डच लोगों ने ही भारत में बेकिंग पाउडर और ताज़ा ख़मीर डालने की शुरूआत की थी. यूं तो भारत में मोहनजोदड़ो की सभ्यता के काल से ही गेहूं की खेती की जाती थी, लेकिन इसका ज़्यादातर इस्तेमाल रोटी नहीं बल्कि पूड़ी जैसे व्यंजन बनाने के लिए होता था.
आज भारत में 'पोटल टोलमा' या 'परिंदे पे परिंदा' या फिर 'रोस्ट (भूना हुआ गोश्त)' बहुत ही ख़ास व्यंजन है. लेकिन इसके लिए अरबों, अमरीकियों, पारसियों और तुर्कों का धन्यवाद करना होगा.

उनकी सब्ज़ियां, मछली और गोश्त को भूनकर लज़ीज पकवान बनाने की कला भारत तक पहुंची और यहां खूब लोकप्रिय हुई.
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि भूनने की यह कला लोगों को पहले मालूम नहीं थी. खाना पकाने का यह तरीका समंदर के तटीय इलाक़ों में रहने वाले लोग खूब अपनाते थे.
इन इलाक़ों में मछली को जड़ी-बूटियों, बदरी और साबुत हल्दी के साथ भूना जाता था फिर इसे सीधे आग में डालकर पकाया जाता था. इस दौरान कोई भी पकवान बिल्कुल सूख न जाए इसलिए इस पर बार-बार घी डाला जाता था, जिससे इसमें नमी की मात्रा बनी रहती थी. इससे पकवान ज़ायकेदार और मुलायम रहता था.

और अगर आप गोआ के सॉसेज के शौक़ीन हैं तो इसके लिए आपको पुर्तगालियों का धन्यवाद करना होगा. पुर्तगालियों ने ही गोश्त को थोड़ा नमकीन स्वाद देने और पकवान को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इसमें सिरका मिलाकर पकाना सिखाया.
असल में 'अचार' तैयार करने की कला के लिए भी उनका ही शुक्रिया करना होगा. पुर्तगाली लोग शुरूआत में इसके लिए हल्दी और नमक का इस्तेमाल करते थे और आगे चलकर इसी से आज का 'अचार' अस्तित्व में आया.
इसके अलावा भारत के साथ व्यापार करने वालों या भारत पर आक्रमण करने वालों से भारत ने सब्ज़ियों और फलों का मुरब्बा बनाना सीखा, ख़ास तौर पर तुर्कों और मुग़लों से जो इसे 'चटनी' कहते थे.
भारत में लाल चींटी और अंडा चटनी जैसी चीज़ें मेघालय और कर्नाटक में प्रचलन में तो थीं, लेकिन चटनी, जैम और मुरब्बा नहीं. इन व्यंजनों को तैमूरलंग के उत्तराधिकारी फ़ारस से भारत तक लेकर आए थे.

इडली आज भले ही भारत का एक लोकप्रिय व्यंजन है लेकिन यह 1250 ई. के बाद भारत तक पहुंचा और इसके लिए केटी आचार्य की पुस्तक को धन्यवाद देना होगा. उनका अनुमान है कि आज की इडली संभवतः इंडोनेशिया से भारत पहुंची है, जहां इस तरह के फ़रमेन्टेड फ़ूड की पुरानी परंपरा रही है.
उनके मुताबिक़ इंडोनेशिया के हिन्दू शासकों के अधीन काम करने वाले रसोइयों ने भाप में पका इडली इज़ाद किया होगा और फिर 800 से 1200 ई के बीच यह भारत पहुंचा.
हालांकि पुराने दस्तावेज़ों में 'भात के गोले' का ज़िक्र है, संभवतः आगे चलकर इसी से इडली का जन्म हुआ. इस तरह के चावल या भात के गोले अरबों के भोजन में शामिल थे. धार्मिक वजहों से अरब लोग इसे खुद की पकाए कढ़ी के साथ खाते थे.
इसका मतलब है कि क्या इडली के आने के पहले से ही भारत में भाप से भोजन पकाने की कला मौजूद थी? इसका उत्तर यही हो सकता है- 'हां, इसकी पूरी संभावना है.'
सेफ कुमार के मुताबिक़ आंध्र प्रदेश के आस पास, कलिंग के क्षेत्र में और विजयनगर साम्राज्य में मालपुआ पकाने के लिए भाप (स्टीमिंग) का प्रयोग किया जाता है.
जो चीज वास्तव में मौजूद नहीं थी वह है इसके लिए उपयोग में आने वाला बर्तन. असल में स्टीमिंग वेसेल्स इंडोनेशिया से इडली के साथ ही भारत पहुंचा. ऐसी इडली चावल और मसूर से तैयार की जाती थी. जबकि आज यह मसूर, बाजरे और चावल को मिलाकर तैयार की जाती है.












