'...और चूल्हे से प्यार हो गया'

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- Author, इंदु पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारतीय व्यंजनों की बात की जाए तो कुछ पकवान ऐसे हैं जो बरसों से आज तक अपने मूल रूप में बने हुए हैं, लेकिन कुछ समय के साथ ग़ुम हो रहे हैं.
दिल्ली में कुछ लोग ऐसे हैं जो इन व्यंजनों को बनाने की कला सहेज कर रखना चाहते हैं.
बंगाल के कुछ पारंपरिक पकवान ऐसे हैं जो दुकानों पर नहीं मिलते. आम लोगों को इन पकवानों को सिखाने का ज़िम्मा लिया है संहिता दासगुप्ता सेन शर्मा ने.

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संहिता पेशे से कॉरपोरेट वकील हैं, लेकिन उन्हें खाना बनाना पसंद है और इसे सिखाने की इच्छा भी है.
संहिता और उनकी साथी अनुमित्रा ने इन व्यंजनों को एक बार फिर से नई पीढ़ी तक लाने की कोशिश शुरू की है.

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ये दोनों आज की पीढ़ी को पारंपरिक पकवान बनाना सिखाती हैं.
पंजाब से इस क्लास में आई नेहा को भी खाना बनाने का शौक़ है.

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वह बताती हैं कि जिन पकवानों को बनाना उन्होंने यहां सीखा, वो न उन्होंने कभी चखे थे और न ही उनके बारे में कभी सुना था. उन्हें सिर्फ प्रसिद्ध बंगाली मिठाई के बारे में ही पता था.

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संहिता कहती हैं कि आज की भाग-दौड़ की ज़िंदगी में जो आसानी से मिल जाए वही खाया जा रहा है. ऐसे में कुछ पकवानों को सहेज कर रखना ज़रूरी हो जाता है.
भारत व भारत के बाहर संहिता खाने की खोज में लगी हैं. वो मानती हैं कि खाना इंसानों को जोड़ने का काम करता हैं और दादी के सिखाए हर व्यंजन को वे ज़िंदा रखना चाहेंगी.

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संहिता की तरह ही राजीव गोयल घर में पारंपरिक व्यंजन बनाना सिखाते हैं. इसके साथ ही वह पुरानी दिल्ली में पर्यटकों के साथ फ़ूड वॉक में पकवान खिलाते चलते हैं.
उनका कहना है कि उन्हें चूल्हे से प्यार हो गया है और खाने को ही करियर बना लिया है.

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पुरानी दिल्ली में भारतीय व्यंजनों का मज़ा लेती हुईं कनाडा की क्रिस्टीना कहती हैं कि बिना सोडा डाले उबले हुए छोले-कुलचे खाकर मज़ा आ गया.
दिल्ली के आस-पास के लोग भी आकर इन व्यंजनों का स्वाद लेते हैं.

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लक्ष्मी नगर से पुरानी दिल्ली आई ज़ोया का कहना है कि कुल्फ़ी जैसी कहीं और कोई आइसक्रीम नहीं होती.
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