'नफ़रत के बीच अपनी राह बना गए मुफ़्ती'

इमेज स्रोत, PDP PRO
- Author, शिवम विज
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
अगर एक तकलीफ़देह विभाजन के दोनों पक्ष आपसे नफ़रत करते हैं और फिर भी आप फलते-फूलते हों, तो आप ज़रूर कुछ सही कर रहे होंगे- दूसरों के लिए न सही कम से कम अपने लिए. यह बात मुफ़्ती मोहम्मद सईद पर सही बैठती है.
कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन के केंद्र, श्रीनगर के व्यापारिक इलाक़ों की गलियों में लोग अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कांफ्रेंस की बजाय सईद की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के बारे में ज़्यादा ख़राब बातें कहते हैं. मुख्य भारत में बहुत से लोग सईद को अलगाववादी के रूप मे देखते हैं, जिसका भारत के प्रति कोई लगाव नहीं था.
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में हुई सईद की मौत से कश्मीर पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वह अपने पीछे एक पार्टी और एक करिश्माई बेटी छोड़ गए हैं. वह उस पार्टी का कुशलता से नेतृत्व कर रही हैं जिसने भारत के सबसे मुश्किल क्षेत्र का राजनीतिक विमर्श बदल दिया है.

इमेज स्रोत, Mukesh Gupta
कश्मीर लंबे समय तक अब्दुल्ला परिवार की जागीर रहा है. कांग्रेस पार्टी और भारत सरकार का नेशनल कांफ्रेंस के साथ परस्पर निर्भरता का संबंध था.
जब तक नेशनल कांफ्रेंस ने कश्मीर को भारत के साथ रखा, उसे भारत सरकार का समर्थन मिलता रहा. यह संबंध बनाए रखना आसान नहीं था क्योंकि कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस का कोई विकल्प नहीं था.
साल 1987 के विधानसभा चुनाव में एक विकल्प, मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के रूप में उभरने वाला था. लेकिन चुनाव में धांधली बदलाव का एक निर्णायक बिंदु साबित हुई.
इस विश्वास में कि भारत सरकार अपने वायदे के विपरीत राज्य में लोकतंत्र नहीं आने देगी कश्मीरियों ने पाकिस्तान-प्रायोजित सशस्त्र विद्रोह को जन समर्थन दे दिया.
भारत में सईद के आलोचक उन्हें सिर्फ़ एक बात के लिए याद करते हैं: यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी अगवा बेटी रुबैया सईद की रिहाई के लिए उसके अपहर्ता, जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट (जेकेएलएफ) की तीन चरमपंथियों की रिहाई की मांग पूरी कर दी जाए.

इमेज स्रोत, PDP PRO
यह घटना 1989 की है, जब सईद ने कुछ ही दिन पहले वीपी सिंह सरकार में बतौर केंद्रीय गृहमंत्री पद संभाला था. इसे चरमपंथियों और उनके समर्थकों को भारत सरकार से टक्कर लेने का हौसला देने और सशस्त्र संघर्ष को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.
हालांकि जिस मात्रा में राज्य में हथियार पहुंचे थे, उसे देखते हुए यह श्रेय देना थोड़ा ज़्यादा लगता है. अगर यह नहीं होता तो 1989 और 1990 के बीच कोई और घटना हो गई होती.
लेकिन भारतीय भूल जाते हैं कि आमतौर पर भारत सरकार के कश्मीरी मुसलमानों के प्रति अविश्वास को देखते हुए मुफ़्ती मोहम्मद सईद का केंद्रीय गृह मंत्री बनना ही तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की ओर से एक बड़ा सकारात्मक संकेत था.
यह भी महत्वपूर्ण था कि सईद, जिनका कश्मीर से चुनाव जीतना तय नहीं था, वह वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनमोर्चा के टिकट पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर से चुनाव जीते थे. आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि कोई कश्मीरी नेता मुख्य भारत से चुनाव लड़े और जीत जाए.

इमेज स्रोत, AFP
साल 1999 में सईद ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन कर कश्मीर घाटी में विपक्षी पार्टी की कमी को पूरा कर दिया.
चूंकि घाटी में राजनीति का दूसरा छोर 1987 की चुनाव धांधली की वजह से अलवागवाद और चरमपंथ की ओर खिसक गया था, इसलिए मुख्यधारा की एकमात्र पार्टी नेशनल कांफ्रेंस ही रह गई थी.
क्योंकि 'मुख्यधारा' या 'भारत-समर्थक' पार्टियों के प्रति उत्पन्न सत्ता-विरोधी रुझान का फ़ायदा उठाने वाला कोई नहीं था इसलिए हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादियों को इसका फ़ायदा मिला.
चरमपंथ कम होने और यह साफ़ होने के बाद कि 9/11 के बाद के समय में 'आज़ादी' मिलना दूर की कौड़ी हो गई है कश्मीरी मुसलमानों को बिजली-सड़क-पानी जैसे रोज़मर्रा के मुद्दों को लेकर राज्य विधानसभा चुनावों में बड़ी मात्रा में शरीक होने पर मजबूर होना पड़ा.

इमेज स्रोत, AP
इस नए राजनीतिक परिदृश्य में पीडीपी एक ऐसे दल के रूप में उभरी जिसके पास कुछ नया था.
इसने भारतीय संविधान के तहत चुनावों के राजनीतिक ढांचे के अंदर रहकर आज़ादी-पसंद लोगों के एजेंडे को जहां तक संभव को उठा लिया, अलगाववादियों की तकलीफ़ को अपनाने की कोशिश की. इस तरह सईद 2002 में सूबे के मुख्यमंत्री बने.
कश्मीर में 'आज़ादी पसंद' लोगों ने इसे ऐसे 'ख़तरे' के रूप में देखा जो कश्मीरियों के लिए भारत सरकार को कम बुरा दिखाने में कामयाब हो सकता है.
श्रीनगर में लोग आमतौर पर यह कहते मिल सकते हैं कि पीडीपी भारतीय गुप्तचर सेवाओं की पैदा की हुई पार्टी है, ठीक उसी तरह जैसे भारत में अतिवादी तत्व इस पर पाकिस्तान के लिए काम करने का आरोप लगाते हैं.

इमेज स्रोत, EPA
पीडीपी ने कश्मीरियों की तकलीफ़ का ठीकरा नेशनल कांफ्रेंस के सिर फोड़ा और ख़ुद को 'राहत देने' (हीलिंग टच) वाले के रूप में पेश किया.
एक दशक से ज़्यादा चले ख़ूनी संघर्ष से बुरी तरह परेशान आबादी को 'राहत देने' की वकालत कर सर्ईद कश्मीर में भारत की ही मदद कर रहे थे, हालांकि ज़्यादातर भारतीयों को ये नज़र नहीं आ रहा था.
कश्मीरियों में से कुछ के लिए यह एक स्वागतयोग्य बदलाव था. अब वहां एक राजनीतिक विकल्प है, लोग नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी को बारी-बारी से वोट देते हैं.
कश्मीर के संकट को दूर करने के लिए पीडीपी ने ऐसे सुझाव दिए जो भारतीयों को बहुत उग्र लगे, जैसे कि भारत-प्रशासित कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा की स्वीकार्यता.

इमेज स्रोत, PDP PRO
लेकिन जो भारतीय पीडीपी को पाकिस्तान का पिट्ठू कहकर ख़ारिज करते हैं वह कश्मीर घाटी की राजनीतिक स्थितियों को समझ नहीं पाते जहां सईद ने वह हासिल किया जो लगभग असंभव था.
जब नेता मरते हैं तो आमतौर पर कहा जाता है कि उन्हें राजनीति में उनकी कमी महसूस की जाएगी. लेकिन सच यह है कि सईद को भारतीय राजनीति में याद नहीं किया जाएगा क्योंकि वो अपनी राजनीतिक विरासत अपनी बड़ी बेटी महबूबा मुफ़्ती के पास छोड़ गए हैं.
पिता राजनीतिक रणनीतिकार थे. लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार सरकार में शामिल होने जा रहीं महबूबा पार्टी का चेहरा हैं जो वोटरों को रिझाने और कार्यकर्ताओं को लामबंद करने का काम करती हैं.
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन किया है जिससे जम्मू-कश्मीर की दो विपरीत ध्रुव की पार्टियां एक मंच पर आ गई हैं. यह ज़रूरत से पैदा हुआ गठबंधन है, भले ही भाजपा का समर्पित वोट बैंक इसे देख न पा रहा हो.

इमेज स्रोत, PTI. AP
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बाप-बेटी' की वंशवादी राजनीति की आलोचना की थी. लेकिन पिता के बेटी को विरासत सौंपने के बाद अब उन्हें यह देखकर राहत मिलनी चाहिए कि यह बदलाव पहले से समस्याग्रस्त क्षेत्र में नई राजनीतिक अनिश्चितताएं लेकर नहीं आ रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












