‘पाक को निशाना बनाने वाले भारत में भी कामयाब’

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों ने पठानकोट एयरबेस हमले और दोतरफ़ा संबंधों को फिर पटरी पर लाने की कोशिशों पर काफ़ी कुछ लिखा है.
जंग, दुनिया, वक़्त, एक्सप्रेस और जसारत जैसे सभी बड़े अख़बारों में पठानकोट हमले और पाकिस्तान की तरफ़ से कड़े शब्दों में इसकी निंदा को पहली ख़बर बनाया गया है.
‘जंग’ में भारत के केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू का ये बयान प्रमुखता से छपा है कि हमलावरों को सरहद पार से कुछ तत्वों की मदद हासिल थी जबकि पंजाब कांग्रेस के प्रमुख अमरिंदर सिंह का ये बयान भी अख़बार में है कि ये दोतरफ़ा बातचीत में बाधा पहुंचाने की कोशिश है.

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वहीं ‘जसारत’ में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का ये बयान भी है कि पाकिस्तान दहशतगतगर्दी के ख़िलाफ़ भारत समेत सभी देशों से सहयोग करता रहेगा.
रोज़नामा ‘वक़्त’ लिखता है कि जिस तरह पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ, ठीक उसी तरह पाकिस्तानी एयरबेसों पर दो बार हमले हो चुके हैं और इससे ज़ाहिर होता है कि वही हमलावर जिन्होंने पाकिस्तान को निशाना बनाया था, वही भारत में भी घुसपैठ करने में कामयाब रहे.

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दूसरी तरफ़, पठानकोट हमले से पहले पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस बयान पर कई अख़बारों ने संपादकीय लिखे कि पड़ोसियों के साथ दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त बनकर रहना वक़्त का तकाज़ा है.
ये बात उन्होंने पिछले दिनों पाकिस्तान-चीन आर्थिक कॉरिडोर के पश्चिमी रूट की आधारशिला रखते हुए कही थी.

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‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ के बारे में पहले से माना जाता है कि वह भारत को लेकर नरम हैं और उसके साथ कश्मीर, पानी, सर क्रीक और सियाचिन जैसे गंभीर मसले बरक़रार होने के बावजूद भारत से दोस्ती और तिजारत के पैरोकार हैं.
लेकिन एक तरफ़ अख़बार कश्मीर को अपना अटूट अंग बताने वाले भारत के बयान पर एतराज़ जताता है, वहीं भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ पर बलूचिस्तान में गड़बड़ फैलाने का आरोप लगाता है.
अख़बार की तल्ख टिप्पणी है कि राष्ट्र को भारत के साथ दोस्ती देश की सलामती की क़ीमत पर मंज़ूर नहीं होगी.

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उधर ‘वक़्त’ लिखता है कि अफ़सोस की बात यह है कि पाकिस्तान की तमाम अच्छी कोशिशों के बावजूद भारत की हठधर्मी और आक्रामक रवैया में कमी नहीं दिखती.
अख़बार कहता है कि पाकिस्तान-चीन आर्थिक कॉरीडोर योजना की घोषणा और इस पर काम शुरू होने को लेकर भारत का रवैया कभी ठीक नहीं रहा है.
लेकिन अख़बार नवाज़ शरीफ़ के इस बयान का हवाला देते हुए आपसी भरोसे को बढ़ाने की पैरवी करता है कि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते.
अख़बार के मुताबिक़ एक-दूसरे पर भरोसा होगा तो बातचीत पटरी से उतरने का ख़तरा भी कम होगा.

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उधर ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि लंबे तनाव के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी के आसार साफ़ दिखने लगे हैं, खासकर भारतीय प्रधानमंत्री के संक्षिप्त पाकिस्तान दौरे के बाद.
अख़बार ने यूरोप से लातिन अमरीका और मध्य एशिया से लेकर खाड़ी देशों के बीच आर्थिक साझेदारियों का हवाला देते हुए दक्षिण एशिया में भी ऐसी ही पहल पर ज़ोर दिया है.
अख़बार के मुताबिक़ दक्षिण एशिया में सार्क जैसा संगठन है, लेकिन क्षेत्र के देशों के संबंधों के चलते यह बहुत कमज़ोर है.
अख़बार कहता है कि एक तरफ़ भारत-पाकिस्तान के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं, दूसरी तरफ़ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते भी अच्छे नहीं हैं और इसीलिए ये क्षेत्र दुनिया के सबसे ग़रीब क्षेत्रों में से एक है.

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वहीं ‘जंग’ ने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच डीजीएमओ स्तर की हॉटलाइन कायम होने पर संपादकीय लिखा है.
अख़बार की राय है कि इससे दोनों देशों के बीच दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ अभियानों में सहयोग तेज़ होगा.
रोज़नामा ‘दुनिया’ ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के इस बयान पर सवाल उठया है कि पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कोई ख़तरा नहीं है.
अख़बार कई मीडिया ख़बरों का हवाला देते हुए पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट में हो रही भर्तियों और उसकी गतिविधियों की बात कही है.
अख़बार ने विदेश मंत्रालय की तसल्ली को हक़ीकत से मुँह मोड़ना बताया और कहा है कि ऐसे क़दम उठाए जाएं कि आईएस देश में क़दम न जमा सके.
अख़बार की राय है कि हुकमरानों की इसी गफ़लत की वजह से तालिबान जैसे गुट खड़ा हुआ था, जिससे देश की सुरक्षा और संप्रभुता का ख़तरा नज़र आने लगे.
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