'बातचीत की बहाली, पाकिस्तान की कामयाबी'

अफ़ग़ानिस्तान पर बैठक में हिस्सा लेने भारतीय विदेश मंत्री इस्लाबाद गईं

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत और पाकिस्तान के बीच समग्र वार्ता बहाल करने पर बनी सहमति पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में गुज़रे हफ़्ते सबसे बड़ी ख़बर रही.

‘रोज़नामा दुनिया’ ने लिखा कि बातचीत की बहाली वाक़ई स्वागत योग्य प्रगति है.

अख़बार की राय है कि भारत का इस बातचीत के लिए रज़ामंद होना निश्चित तौर पर पाकिस्तान के रुख़ और उनकी नीतियों की कामयाबी है, जिसने हमेशा कहा है कि सभी मुद्दे बातचीत से हल करने होंगे पर भारत बातचीत से गुरेज़ करता रहा.

अख़बार लिखता है कि ये उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि एक-दो दौर की वार्ता में कश्मीर समेत सभी मुद्दों के हल तलाश लिए जाएंगे, लेकिन अगर बातचीत लगातार चले तो देर-सबेर तनाव का समाधान तलाशा जा सकता है.

तनाव का असर भारत और पकािस्तान सीमा पर गोलीबारी के रूप में कई बार सामने आया है

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रोज़नामा ‘इंसाफ़’ लिखता है कि इस्लामाबाद में अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर ‘हार्ट ऑफ़ एशिया’ सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्री का शामिल होना और उनका रवैया आमतौर पर एक शांतिप्रिय नेता वाला ही दिखा.

“लेकिन देखना यह है कि अपने देश वापस जाने पर वे कट्टरपंथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कब तक इस पैग़ाम को जारी रख सकती हैं.”

अख़बार के संपादकीय की आख़िरी लाइन है – पाक-अफ़ग़ान रिश्तों की ख़राबी में भारत की भूमिका हमेशा नकारात्मक रही है.

‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि सुषमा स्वराज ने अगले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान दौरे की पुष्टि भी की है.

पेरिस में मोदी और शरीफ़ की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच ताज़ा बातचीत की पहल हुई है

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अख़बार के मुताबिक़ राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं कि आख़िर क्या बात हो गई जो नरेंद्र मोदी के रवैये में अचानक तब्दीली आ गई और उन्होंने पेरिस में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात की.

अख़बार कहता है कि शायद मोदी को अहसास हो गया है कि पाकिस्तान से रिश्ते बिगाड़कर व्यापारिक हित आगे नहीं बढ़ाए जा सकते. ख़ैर वजह जो हो, बातचीत की बहाली स्वागत योग्य है.

‘नवा-ए-वक़्त’ ने पाकिस्तान सरकार को नसीहत दी है कि वह भारत के साथ बातचीत के मुद्दे पर प्रगति को लेकर किसी ख़ुशफ़हमी में न रहे और अतीत के अनुभव देखकर ही फ़ैसला करे.

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अपने चिरपरिचित अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए अख़बार कहता है- दूध पिलाने के बावजूद डंसने वाले सांप से किसी भलाई की उम्मीद नहीं की जा सकती.

‘जंग’ कहता है कि परमाणु हथियारों से लैस दो देशों के बीच तनाव का जल्द से जल्द ख़ात्मा न सिर्फ़ भारत-पाक बल्कि विश्व शांति की भी ज़रूरत है.

अख़बार की राय है कि क्या ही अच्छा हो कि अगर पिछली बातचीतों में जिन मामलों पर कोई प्रगति या फॉर्मूले पर सहमति हुई थी, तो बात वहीं से आगे बढ़े.

रुख़ भारत का करें तो ‘जदीद ख़बर’ ने हिट एंड रन केस में बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान को बरी किए जाने पर संपादकीय लिखा है.

निचली अदालत ने सलमान को पांच साल की सज़ा सुनाई थी लेकिन हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया

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अख़बार कहता है कि सलमान को बरी करने से फिर यह बहस तेज़ हो गई है कि क्या इस देश में आम लोगों के लिए एक क़ानून है और ख़ास लोगों के लिए दूसरा क़ानून?

इस मामले में मारे गए नूरुल्लाह की पत्नी की नाराज़गी का ज़िक्र करते हुए अख़बार कहता है कि हाईकोर्ट ने निश्चित रूप से इंसाफ़ के सभी तकाज़ों को ध्यान में रखकर फ़ैसला दिया होगा, लेकिन सवाल यह है कि 13 साल से चल रहे इस मुक़दमे को समाज के अलग-अलग वर्ग किस तरह देखते हैं.

रोज़नामा ‘ख़बरें’ ने अमरीका में रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप की हालिया टिप्पणी पर संपादकीय लिखा है जिसमें उन्होंने अमरीका में मुसलमानों के आने पर रोक लगाने की बात कही थी.

अख़बार की टिप्पणी है कि मुसलमानों को चारों तरफ़ से घेरा जा रहा है.

ट्रंप अपने बयानों से लगातार सुर्ख़ियों में हैं

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अख़बार कहता है कि ट्रंप के बयान की अमरीकी सरकार ने कड़ी निंदा की है लेकिन ख़ुद राष्ट्रपति ने क्यों निंदा नहीं की, जिन्होंने पेरिस हमले के बाद चरमपंथी घटनाओं की मुसलमानों की तरफ़ से की जाने वाली निंदा की तीव्रता पर सवाल उठाया था.

अमरीकी नीतियों पर सवाल उठते हुए अख़बार लिखता है कि दशहतगर्दी और अशांति का सबसे ज़्यादा शिकार अगर कोई है तो वो मुसलमान हैं, बावजूद इसके मुसलमानों को ही सामाजिक अफ़रातफ़री का ज़िम्मेदार माना जाता है.

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