कश्मीर पर अमरीका से उम्मीद नहीं: पाक मीडिया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ के हालिया अमरीकी दौरे के बहाने एक बार फिर पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों ने कश्मीर मुद्दे और इसके समाधान पर सुर्खियां लगाई हैं.
रोज़नामा 'दुनिया' ने सेना प्रमुख की इस बात के लिए तारीफ़ की है कि उन्होंने अपने अमरीकी दौरे में कश्मीर मुद्दे को उठाया, लेकिन अख़बार को उम्मीद नहीं कि अमरीका इसके हल के लिए कुछ ठोस करेगा.
अख़बार कहता है कि अगर अमरीका इस समस्या में दिलचस्पी रखता तो अतीत में कई ऐसे मौक़े आए थे जब वो इसके समाधान में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता था लेकिन किसी अमरीकी सरकार ने ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी.

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प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को ताना देते हुए अख़बार कहता है कि देश को उम्मीद थी कि शरीफ़ अमरीकी दौरे में राष्ट्रपति ओबामा को इस बात के लिए क़ायल करेंगे कि कश्मीर समस्या का समाधान कितना ज़रूरी है, लेकिन वो तो वहां से लश्कर-ए-तैयबा और अन्य चरमपंथियों पर कार्रवाई करने का वादा करके वापस चले आए.
‘जसारत’ लिखता है कि ये बात अब सबके सामने आ चुकी है कि कश्मीर की अनदेखी करके दोनों देशों के रिश्ते बेहतर नहीं हो सकते हैं, लेकिन अमरीका ने तो इस मुद्दे पर हाथ खड़े कर दिए हैं कि 'ख़ुद ही निपटो'.

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रोजनामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि जनरल राहील शरीफ़ ने अपने हालिया अमरीका दौरे में दुरुस्त कहा कि क्षेत्र में शांति के लिए कश्मीर का समाधान बहुत ज़रूरी है लेकिन सवाल ये है कि मसला हल कैसे हो?
अख़बार के मुताबिक भारत न तो बातचीत को तैयार है और न ही किसी दूसरे देश या संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता को मानने को राज़ी है, तो मसला हल कैसे होगा?
अख़बार की टिप्पणी है कि ऐसे में अमरीका को ज़्यादा गहराई से ग़ौर करने की ज़रूरत है जो भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी के लिए कोशिश कर रहा है.

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‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि अमरीका दोहरे मानदंड अपनाना छोड़ दे तो कश्मीर समस्या हल हो सकती है.
अख़बार लिखता है कि अमरीका ने न सिर्फ़ भारत से असैन्य परमाणु समझौता किया बल्कि दूसरे देशों के लिए भी रास्ता खोला जबकि पाकिस्तान के साथ किसी ने ऐसा समझौता नहीं किया.
अख़बार के मुताबिक़ अमरीका ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के जायज़ रुख़ का भी समर्थन कभी नहीं किया और ऐसा इसीलिए क्योंकि अमरीका क्षेत्र में भारत को चीन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना चाहता है और शायद इसीलिए उसे नाराज़ नहीं करना चाहता.
‘एक्सप्रेस’ ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के हवाले से लिखा है पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कोई अस्तित्व नहीं है.
अख़बार लिखता है कि विदेश मंत्रालय का ये बयान बिल्कुल ठीक वक़्त पर आया है क्योंकि मसला दहशतगर्दी का हो, परमाणु मुद्दा हो या भारत के साथ संबंधों की बात हो, पश्चिमी देशों के मीडिया और सरकारों का रुख़ एकतरफ़ा ही रहता है.

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अख़बार ने अमरीका और पश्चिम देशों को सलाह दी है कि वो पाकिस्तान में आईएस की मौजूदगी को लेकर परेशान न हों.
वहीं ‘इंसाफ’ ने इस्लामिक स्टेट को मुसलमानों के लिए ज़्यादा ख़तरनाक बताते हुए लिखा है कि ये हरिगज़ मुसलमानों का संगठन नहीं हो सकता.
रूख़ भारत का करें तो ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने बिहार में नई सरकार के गठन और महागठबंधन की कामयाबी पर लिखा है कि पहले दिल्ली ने रास्ता दिखाया और अब बिहार ने भी उसी पर चल कर दिखा दिया है कि सेक्युलरिज्म की जड़ें अब भी हिंदुस्तानी समाज में गहरी हैं.

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अख़बार की टिप्पणी है कि करिश्माई वापसी करने वाले लालू यादव की छाप नई सरकार पर निश्चित रूप से दिखेगी, लेकिन अगर उनकी पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व में विकास में दिलचस्पी लेगी तो इससे आरजेडी की लोकप्रियता का ग्राफ़ बढ़ेगा ही.
रोजनामा 'खबरें' लिखता है कि बिहार चुनाव ने सिर्फ़ लालू यादव को राजनीतिक जीवनदान नहीं दिया है, बल्कि कांग्रेस के 'युवराज' राहुल गांधी के अंदाज को भी बदल दिया है.
अख़बार लिखता है कि राहुल के विरोधी जितनी उनकी आलोचना कर रहे है, उतना ही फ़ायदा कांग्रेस उपाध्यक्ष को हो रहा है और उनकी राष्ट्रीयता को लेकर खड़े किए गए बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी के हालिया विवाद से भी यही साबित हुआ.
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