महागठबंधन की राह चलेंगे दूसरे राज्य भी?

नीतीश कुमार और लालू प्रसाद

इमेज स्रोत, Reuters

    • Author, परंजॉय गुहा ठाकुरता
    • पदनाम, आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषक

बिहार में महागठबंधन की निर्णायक जीत के बाद अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ख़िलाफ़ इसी तर्ज़ पर विपक्षी राजनीतिक ताक़तें एकजुट होंगी.

भाजपा विरोधी पार्टियों का एक साथ आना नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए बुरी ख़बर होगी. हालाँकि भाजपा का समर्थन करने वालों का तर्क है कि ऐसा होना मुश्किल है.

मुलायम सिंह और मायावती

इमेज स्रोत, AFP

क्योंकि विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का एक मंच पर आना मुश्किल है. मसलन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की नहीं बनती, तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट के कार्यकर्ता एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते.

जयललिता

इमेज स्रोत, AP

यही हाल तमिलनाडु में भी है जहाँ अन्नाद्रमुक और द्रमुक की राजनीति एक-दूसरे के उलट है. लिहाजा भाजपा को निकट भविष्य में घबराने का कोई कारण नहीं है.

इन लोगों का तर्क है कि इस साल फ़रवरी में दिल्ली में और हाल ही में बिहार की तरह, देश के दूसरे राज्यों में भाजपा के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा वोटिंग नहीं होगी.

बिहार के चुनावी नतीजे आने के साथ ही ये भी साफ़ हो गया है कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को अपने बचे हुए कार्यकाल में राज्यसभा में बहुमत नहीं मिलेगा.

जेटली और मोदी

इमेज स्रोत, EPA

यानी साफ़ है कि अगर सरकार को कोई नया विधेयक पास करना है या आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है तो उसके पास विपक्ष को विश्वास में लेने के अलावा कोई चारा नहीं है. अब प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली वैसी हेकड़ी नहीं दिखा पाएंगे जैसा कि वे अब तक दिखाते रहे हैं.

भारतीय राजनीति के पन्ने पलटें तो पहली बार ग़ैर कांग्रेसी ताक़तें देश में पहली बार 1967 में एक साथ आईं थीं. उस वक्त दक्षिण और वामपंथी ताकतों ने हिंदी राज्यों में गठबंधन बनाया था और ऐसा गठबंधन कि कोई व्यक्ति कोलकाता से अमृतसर कांग्रेस शासित राज्यों में बिना घुसे पहुँच सकता था.

बाद में 1975 के आपातकाल के बाद कांग्रेसविरोधी ताक़तें जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकजुट हुईं. फिर 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में और फिर 1996 में . लेकिन इस एकजुटता की उम्र बहुत लंबी नहीं रही. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ही पहली गैर कांग्रेसी सरकार अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा कर सकी.

जेपी नारायण और इंदिरा गांधी (फ़ाइल फोटो)

इमेज स्रोत,

यानी जिस तरह के कांग्रेस विरोध के नाम पर एकजुट हुई विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों का जमावड़ा लंबे समय तक नहीं टिक सका, वहीं, ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर भी भाजपाविरोध की राजनीति बहुत टिकाऊ नहीं हो सकती. लेकिन भाजपा को सरकार का कमज़ोर प्रदर्शन मुश्किल में डाल रहा है और सरकार विरोधी माहौल तैयार कर रहा है.

सिर्फ़ दिल्ली या बिहार ही नहीं, लोकसभा चुनावों के मुक़ाबले भाजपा का वोट प्रतिशत महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में गिरा है. उत्तर प्रदेश में, हाल ही में हुए पंचायत चुनावों में असली टक्कर सपा और बसपा के बीच रही और भाजपा तीसरे नंबर पर रही.

अखिलेश यादव

इमेज स्रोत, PTI

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भले ये दावा कर लें कि बिहार जैसा महागठबंधन यूपी में भी संभव है, लेकिन बसपा नेता मायावती उस वक्त को भूलने को तैयार नहीं हैं जब दो दशक पहले लखनऊ के सरकारी गेस्ट हाउस में सपा के कथित गुंडों ने उन पर हमला किया था.

हालाँकि ये भी सही है कि राजनीति में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता. कभी एक ही पार्टी में रहे और फिर लंबे समय तक एक-दूसरे को कोसने वाले लालू और नीतीश आज फिर एक साथ हैं.

इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी नवंबर 1993 और जून 1995 में सपा और बसपा मिलकर सरकार चला चुके हैं. 2004 में वामपंथी दलों ने केंद्र में उस यूपीए सरकार का समर्थन किया था जिसमें ममता बनर्जी केंद्रीय मंत्री थी.

राजनीति संभावनाओं का खेल है. राजनीति में एक हफ्ता बहुत लंबा समय होता है. हालाँकि इस तरह की रणनीति और मौकों को देखते हुए अभी तक नया गठबंधन नहीं बना है. कोई भी जल्दी में नहीं दिखता, यहाँ तक लालू भी नहीं.

अटल बिहारी वाजपेयी (फ़ाइल फोटो)

इमेज स्रोत, AP

प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में आ रही कमी कई लोगों को चौंका सकती है. भाजपा के बुजुर्ग नेता भले ही पार्टी को सही रास्ते पर चलने की नसीहत दें, लेकिन इससे बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है. अमित शाह तत्काल पार्टी अध्यक्ष पद नहीं छोड़ने वाले. लेकिन क्या वह ख़ुद और उनके सलाहकार मगरूरता छोड़ेंगे?

अपनी पार्टी को दो बार बांटने के बजाय इंदिरा गांधी बाबू जगजीवन राम और हेमवती नंदन बहुगुणा को पार्टी छोड़ने से रोक सकती थी. आपातकाल के दौरान देवकांत बरुआ की ये टिप्पणी बहुत मशहूर हुई थी, “भारत इंदिरा है, इंदिरा भारत है.”

सोनिया और राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Reuters

यूँ तो तानाशाहों में शायद बहुत कुछ एकजैसा नहीं होता. लेकिन कई मोदीभक्तों का ये पक्के तौर पर मानना है कि मोदी लगभग कांग्रेसमुक्त भारत में देश के सबसे बड़े नेता हैं.

समय कैसे बीत जाता है और हम इतिहास से कितना कम सीख पाते हैं. देखना ये होगा कि क्या भारत 2019 से पहले गठबंधन राजनीति के युग में फिर से प्रवेश करेगा?

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi%20%20" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और<link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>