ख़ुशबू पकड़ चले जाइए, मिल जाएगी इत्र रानी

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पुरानी दिल्ली की एक भीड़ भरी गली और यहां की एक दुकान. ये दूकान दो सौ साल से ख़ुशबुओं का ठिकाना है.
दिल्ली में इत्र की सबसे पुरानी दुकान दरीबा कलां में है. यहां जब अनसुया बसु पहुंचीं तो न सिर्फ़ इत्र की रानी के दीदार हुए बल्कि ख़ुशबुओं के इतिहास के कई क़िस्सों से उनकी मुलाक़ात हुई.
पढ़िए अनसुया बसु की यह यात्रा उन्हीं की ज़ुबानी.
हवा में चुभन और सुबह के सूरज की रोशनी में पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में मैं राजधानी की सबसे पुरानी इत्र की दुकान, गुलाब सिंह जौहरी मल की ओर जा रही थी.
यह अनोखी और क़रीब 200 साल पुरानी दुकान, एशिया के सबसे बड़े ज़ेवरों के बाज़ार समोए दरीबा कलां में, भीड़ के बीच कहीं दबी हुई सी लगती है.

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यहां की हर दुकान का दावा है कि वह 19वीं सदी से यहां है, 1857 की क्रांति से भी पहले से. फूलों और चंदन से बने इत्रों की यह दुकान 1816 में स्थापित की गई थी.
रास्ते से निकलने के लिए जूझते वाहनों, लोगों, साइकिल रिक्शों के बीच कुछ गज दूर जाकर मुझे गुलाब की ताज़ा ख़ुशबू आई.
जब मैंने सुनार से पता पूछा तो उन्होंने बताया कि इत्र की रानी, रूह-ए-गुलाब (गुलाब का इत्र), की ख़ुशबू मुझे मशहूर इत्र की दुकान तक पहुंचा देगी.
साल 1852 में बनी एक दीवारघड़ी इस दुकान की शोभा बढ़ा रही है जिसे अब इत्रदानों के परिवार की सातवीं पुश्त के प्रफुल्ल गंधी और उनके भाई चला रहे हैं.
प्रफुल्ल के पास ऐसे बहुत से क़िस्से हैं कि कैसे उनके पूर्वजों ने दो शताब्दी पहले इत्र बेचने शुरू किए थे.

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वह बताते हैं कि दुकान के असली मालिक गुलाब सिंह अपने सर्वश्रेष्ठ इत्र मुग़ल बादशाह अकबर शाह द्वितीय के दरबार में प्रदर्शित करते थे और उनके नियमित ग्राहकों में शाही परिवार के कई लोग थे.
बेल्जियम ग्लास की कई शीशियां ज़नानखाने में भेजी जाती थीं क्योंकि मुग़ल रानियों और राजकुमारियों को बाज़ार में आने की इजाज़त नहीं थी.
ऐसी कुछ शीशियां अब भी टीक की बनी छोटी अल्मारियों में देखी जा सकती हैं.
गंधियों के पास ख़ास तौर पर विकसित गुलाब से निकाले गए इत्र और दो चमेली के इत्र की एक दर्जन से ज़्यादा क़िस्में हैं .
इस प्राचीन ब्रांड को बनाए रखने के लिए बहुत सख़्त क्वॉलिटी कंट्रोल है.
गंधियों की दो डिस्टिलेरी हैं. इनमें से एक उत्तर प्रदेश के गुलाब पैदा करने वाले इलाक़े में है, जहां विशुद्ध गुलाब का तेल, रूह-ए-गुलाब इत्र, बहुत सावधानी के साथ निकाला जाता है.

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यह सबसे महंगा इत्र भी है. रूह-ए-गुलाब की 10 ग्राम की शीशी की क़ीमत 18,000 रुपये है. सबसे सस्ता इत्र-गुलाब के इत्र की ही एक क़िस्म 1,000 रुपये की आती है.
प्रफुल्ल गंधी कहते हैं, "अच्छी क्वालिटी का इत्र बनाना हुनर का काम है. फूलों को पौ फटने से पहले ही चुनना होता है और सूरज के उगने से पहले ही संसाधित कर लेना होता है क्योंकि सूरज चढ़ने के साथ ही ख़ुशबू कम होती जाती है. हमारी डिस्टिलेरी फूलों के बाग़ के बीच है."
ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे मशहूर और दिल्ली के उच्च वर्ग के नियमित ग्राहकों की बदौलत इस दुकान की शोहरत दूर-दूर तक फैली है.
जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ 2009 में भारत आए थे तो उन्होंने 'गर्मियों की पहली बारिश के बाद गीली धरती की ख़ुशबू' वाले इत्र की कुछ बोतलें अपनी मां के लिए ख़रीदीं, जो 1947 में बंटवारे से पहले पुरानी दिल्ली में ही रहती थीं.

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शिक्षाविद्, लेखक और फ़िल्मकार सोहेल हाशमी कहते हैं, "ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि गर्मी और सर्दी की अलग-अलग ख़ुशबू होती है जो उनमें मिलने वाले फूलों की उपलब्धता पर निर्भर करती है."
"यह बताने के लिए मैं अपने मेहमानों को गुलाब सिंह की दुकान पर ले जाता हूं क्योंकि पर्यटकों के लिए यह बहुत कमाल की खोज होती है."
"यहां बनने वाले इत्र शुद्ध होते हैं और अल्कोहल से बनने वाले परफ़्यूम के मुकाबले बहुत देर तक कायम रहते हैं."
चंदन के तेल के दाम बढ़ने की वजह से इत्र की दुकानें इसके कृत्रिम संस्करण को अपना रही हैं.
प्रफुल्ल गंधी कहते हैं, "चंदन के तेल से बनने वाले हमारे इत्र महंगे हैं लेकिन हम उपभोक्ताओं की मांग के अनुरूप बहुत से मिश्रण कृत्रिम तेल का इस्तेमाल कर भी बना रहे हैं."

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"हालांकि हम इत्र बनाने के अपने पारंपरिक तरीके पर ही कायम रहना चाहते हैं क्योंकि यही हमें देश भर में मौजूद बाकी इत्र वालों से अलग करता है."
इत्र की इस दुकान और डिस्टिलेरियों में 50 लोग काम करते हैं. इनके हुनर से ही दो सदी पुरानी सुगंध को बरकरार रखा जा रहा है.
प्रफुल्ल गंधी कहते हैं, "जब गुलाब सिंह ने इत्र की यह दुकान शुरू की तो उन्हें शायद ही अंदाज़ होगा कि यह 200 साल तक चलेगी और पूरे देश में इसे जाना जाएगा. हमने इत्र की क्वालिटी के साथ समझौता नहीं किया है और इस उम्मीद के साथ अगली पीढ़ी को सिखा रहे हैं कि यह विरासत और कुछ सालों तक क़ायम रहे."
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