फलस्तीनियों और इसराइलियों से कैसे सधेंगे रिश्ते?

प्रणब मुखर्जी और महमूद अब्बास

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    • Author, क़मर आग़ा
    • पदनाम, मध्य पूर्व मामलों के जानकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के तीन दिवसीय इसराइल दौरे पर रक्षा और तकनीकी सहयोग और मजबूत होने की संभावना है.

भारत के किसी भी राष्ट्रपति का इसराइल का ये पहला दौरा है. पिछले कुछ वर्षों से रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध मजबूत हुए हैं, आतंकवाद के मोर्चे पर भी द्विपक्षीय सहयोग बढ़ा है.

कृषि और विज्ञान तकनीकी के मामले में दोनों देश सहयोग बढ़ाने को राज़ी हैं.

प्रणब मुखर्जी सोमवार को फलस्तीनी नेताओं से मिले. फलस्तीन को समर्थन देने से पहले ही भारत ने अरब देशों, इसराइल और फ़लस्तीनियों को स्पष्ट किया कि भारत-फलस्तीन रिश्तों को भारत-इसराइल संबंधों के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहिए.

फलस्तीन पर रुख़

भारत के फलस्तीन के साथ महात्मा गांधी के समय से ही रिश्ते रहे हैं. भारत ये भी मानता है कि सभी मसलों का हल बातचीत से ही होना चाहिए और आतंकवाद किसी मुद्दे का समाधान नहीं है. इसराइल को इससे आपत्ति भी नहीं होगी.

प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी

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यहाँ ये भी देखना ज़रूरी है कि फ़लस्तीन को लेकर भारत के रुख़ में भी कुछ बदलाव आया है. पहले भारत फ़लस्तीन के मुद्दे को वैश्विक मंचों पर उठाता था, लेकिन भारत पिछली तीन बार से इसराइल के मुद्दे पर वोटिंग से ग़ैरहाज़िर रहा है.

भारत ही नहीं कई यूरोपीय देशों के भी फ़लस्तीनियों और इसराइल के साथ भारत जैसे ही संबंध हैं.

राष्ट्रपति मुखर्जी के इस दौरे से इसराइल में भारत के लिए अच्छा माहौल तैयार होगा. कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अगले कुछ महीनों में इसराइल जा सकते हैं, उससे रिश्तों में और प्रगाढ़ता आएगी.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय के साथ बातचीत पर आधारित)

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