अंगदानः पादरी ने दे दिया अजनबी को अपना गुर्दा

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करने वालों की सूची काफी लम्बी है.
आंकड़े बताते हैं कि जहाँ डेढ़ लाख लोग गुर्दे के प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे हैं, वहीं दिल और लीवर के प्रत्यारोपण का इंतज़ार करने वालों की संख्या 50 हज़ार से भी ज़्यादा है.
यह प्रतीक्षा सूची इस लिए लम्बी है क्योंकि ज़रूरत के हिसाब से प्रत्यारोपण के लिए अंग उपलब्ध नहीं हैं.
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अंगदान से जुड़े कई किस्से हैं जो लोगों को प्रेरणा देते हैं. पेश है ऐसे ही चुनिंदा लोगों की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी-
कमलेश वर्मा (56) के पति यशपाल सिंह वर्मा

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मेरी पत्नी कमलेश वर्मा ने पोस्ट ग्रेजुएशन के अलावा बीएड भी किया था मगर वो बतौर गृहणी ही अपनी ज़िम्मेदारी निभाती रहीं.
चूँकि मैं बैंक में काम करता था और मेरे तबादले होते रहते थे इसलिए वो घर और बच्चों को संभालने का काम करती थीं.
एक दिन उन्हें चक्कर आया और वो गिर गईं. हम उन्हें अस्पताल ले गए तो पता चला उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ है.
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कई दिनों तक इलाज चलता रहा और वो धीरे धीरे ठीक होने लगीं. पिछले साल जून में एक दिन सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था. वो मुझे गाड़ी तक छोड़ने आईं. जब घर वापस लौटा तो दरवाज़ा अंदर से बंद था.
फिर पड़ोसियों की मदद से हमने दरवाज़ा तोड़ा तो देखा वो बेहोश पड़ी हैं ज़मीन पर. जांच के बाद पता चला कि अब काफी देर हो चुकी थी और वो ब्रेन डेड हो चुकी थीं.

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डॉक्टर ने हमें बताया कि अब जैसे ही वेंटीलेटर हटाया जाएगा उनके दूसरे अंग भी काम करना बंद कर देंगे. इसी दौरान डॉक्टर ने हमसे पूछा कि क्या हम अंगदान करना चाहेंगे.
इसी बीच मोहन फाउंडेशन के काउंसलर भी वहां आए और उन्होंने मुझे और मेरे बेटों को समझाया कि उनके अंग दान करने से कई लोगों को नई ज़िंदगी मिल सकती है.
मुश्किल फैसला था. लोग कह रहे थे कि शव विकृत हो जाएगा तो कुछ कह रहे थे कि अस्पताल वाले अंगों को बेच देंगे. मगर आपस में बेटों से सलाह करने के बाद हमने अंगदान का फैसला लिया.
हलाकि हमें पता नहीं उनके अंग किसको दिए गए मगर हमें कभी कभी अहसास होता है कि वो जिंदा हैं. वो उन लोगों में जिंदा हैं जिन्हें उनके अंग मिले.
अलोक सेठी

मेरे लीवर में इंफ़ेक्शन हो गया था और मेरी हालत दिनों दिन ख़राब होती जा रही थी.
हफ्ते में पांच दिन अस्पताल में रहना पड़ता था. डाक्टरों ने जवाब दे दिया था और लीवर के प्रत्यारोपण को आख़िरी रास्ता बताया था.
<link type="page"><caption> पढ़ें तीसरी कड़ीः 'जिनसे खून का रिश्ता, वही कर सकता है अंगदान' </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150828_organ_donation_part_3_sra.shtml" platform="highweb"/></link>
दो सालों तक हम इस इंतज़ार में थे कि कोई दानकर्ता मिल जाए. कोई तो हो जिसका लीवर मिल सके.
मगर आख़री 6 महीनों में मेरी हालत बेहद ख़राब हो गई.

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एक दिन जब लीवर नहीं मिल पाया तो आर्मी रेफ़रल एंड रिसर्च अस्पताल के डाक्टरों ने मुझे डिस्चार्ज करने को कह दिया.
अगले दिन सुबह मुझे वापस घर जाना था. काफी निराश था मैं. लगा कि अब ज़िंदगी बस इतनी ही थी.
तभी रात को एक बजे एक चमत्कार हुआ.
रात में अस्पताल के डाक्टरों ने मेरे परिवारवालों से संपर्क किया और कहा कि लीवर का इंतज़ाम हो गया है.
हमें पता चला कि चंडीगढ़ में एक सड़क दुर्घटना के मरीज़ के परिजनों ने उसके ब्रेन डेड हो जाने पर अंगदान करने का फैसला लिया है.

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चूँकि मेरा बेटा फ़ौज में है, तो वायुसेना के विशेष विमान से लीवर को दिल्ली लाया गया और सुबह ही मेरा आपरेशन शुरू हुआ.
बाद में जब मुझे होश आया तो पता चला कि 16 घंटों के आपरेशन के बाद दूसरा लीवर लगाया गया.
हमने भगवान् के शुक्र के साथ उसका शुक्रिया अदा किया जिसका लीवर मेरे अंदर काम कर रहा है. अब मेरी तबियत काफी बेहतर है. अब मुझे भूख भी लगती है और ताक़त लौट रही है.
फादर किदनगाठाज़े सेबास्टियन

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मैं एक प्रार्थना सभा में हिस्सा लेने बस से एर्णाकुलम जा रहा था. मेरी नज़र बग़ल की सीट पर बैठे एक मुसलमान नौजवान पर पड़ी जिसने अपना नाम रसद मुहम्म्द बताया.
उसके हाथ में कुछ काग़ज़ात थे. यह अस्पताल के कुछ रिपोर्टें थीं. वो काफी परेशान दिख रहा था.
मैंने परेशानी का कारण पूछा तो उसने बताया कि उसे गुर्दे की बीमारी है और बस अब प्रत्यारोपण ही इसका इलाज है. वो नौजवान सऊदी अरब में काम करता था.
मगर बीमारी की वजह से उसे वापस अपने गाँव लौटना पड़ गया.
रसद से बात कर पता लगा कि वो गुर्दों की खरीद बिक्री करने वालों के चक्कर में फँस गया था जो उससे बड़ी रक़म ऐंठना चाहते थे. उसने दलालों के चक्कर में सात लाख रुपये खर्च भी कर दिए थे.
मैं सोच में पड़ गया कि कैसे इस नौजवान की ज़िंदगी बचाई जा सकती है. मैंने फ़ादर डेविस चीरामेल के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक गुर्दा दान में दिया था.

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तभी मेरे दिमाग में भी आया कि क्या मैं भी इस अनजान अपरिचित नौजवान के ऐसा कुछ कर सकता हूँ?
प्रत्यारोपण के बारे में मुझे सिर्फ इतना ही पता था कि इसके लिए ब्लड ग्रुप एक होना चाहिए. अगले दिन मैंने रसद को फोन किया और कहा कि मैं अपना एक गुर्दा दान कर सकता हूँ अगर ब्लड ग्रुप समान हो.
मैंने इस बारे में किसी और को कुछ भी नहीं बताया. आखिरकार दो महीनों तक चले टेस्ट के बाद मैंने अपना एक गुर्दा रसद को दे दिया. उसे एक नई ज़िंदगी मिल गई और मेरी आत्मा को सुकून.
(अतिरिक्त रिपोर्ट केरल से प्रगित परमेस्वरन)
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