मोदी पर मोदी के 'मौन' की राजनीति

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
जो व्यक्ति हर महीने के एक रविवार को देशवासियों से 'मन की बात' सार्वजनिक तौर पर कहता हो वो बाक़ी के 29 दिन में खामोश क्यों रहता है?
जिस व्यक्ति को भाषण देने में महारत हो उसे बोलने को कहा जाए तो वो गहरी ख़ामोशी क्यों अख़्तियार कर लेता है?
ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मन की बात' के बजाय 'काम की बात' शुरू करने की ज़रूरत है. इस रविवार की 'मन की बात' में भी काफी कुछ सुनने को मिला, ख़ास तौर से योग पर, लेकिन विवाद वाले मुद्दों पर इस कार्यक्रम में भी उनकी चुप्पी बनी रही.
इस साल के शुरू में जब कुछ गिरजाघरों पर हमले होने लगे और मुसलमानों की कथित घर वापसी की कोशिश पर एक बड़ा विवाद छिड़ गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हफ़्तों तक खामोश रहे.
काफी दबाव में आने के बाद 17 फ़रवरी को उन्होंने आख़िर अपनी ख़ामोशी तोड़ी और वही बात कही जो करोड़ों भारतीय उनकी ज़बान से सुनना चाहते थे, यानी कि हर भारतीय को उसके मज़हब पर चलने की आज़ादी है और उनकी सरकार किसी को एक दूसरे के धर्म के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने की इजाज़त नहीं देगी.
आईपीएल विवाद

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इन दिनों आईपीएल के भूतपूर्व कमिश्नर ललित मोदी से जुड़े विवादों में उनकी पार्टी बुरी तरह से घिरी है.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कई तरह के इल्ज़ामों में घिरी हैं और उनके इस्तीफ़े की मांग की जा रही है.
विपक्ष चिल्लाकर कर पूछ रहा है कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर खमोश क्यों हैं?
जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ख़ामोश रहते थे तो उस समय भी उनसे सवाल किये जाते थे लेकिन वो तबियत से भी ख़ामोश थे और उनकी आवाज़ भी आम तौर से धीमी थी. लेकिन नरेंद्र मोदी न तो ख़ामोश तबियत के हैं और न ही उनकी आवाज़ कमज़ोर है. फिर ये ख़ामोशी कैसी?
दूसरी तरफ वो सोशल मीडिया पर हमेशा सक्रिय रहते हैं. दुनिया भर के नेताओं को बधाई के संदेश भेजते रहते हैं. कम से कम देश के अंदर उठे मुद्दों पर कुछ ट्वीट तो कर सकते थे.
ख़ामोश हैं, नादान नहीं

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मोदी ख़ामोश ज़रूर हैं लेकिन नादान नहीं हैं. उन्हें मालूम है कि अगर शुतुरमुर्ग़ रेत में अपना सर गाड़ भी ले तो आंधी से वो बच नहीं सकता.
उनकी चुप्पी साधने के पीछे जो भी रणनीति हो देश को इंतज़ार है कि वो अपनी ख़ामोशी कब तोड़ेंगे.
नरेंद्र मोदी की ख़ामोशी पर उन्हें गूंगा गुड्डा कहना एक भूल होगी. याद रहे कि नेताओं की चुप्पी को समय से पहले कोई नाम देना अब तक ग़लत साबित हुआ है.
राम मनोहर लोहिया ने इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहा था लेकिन वो 'दुर्गा माता' साबित हुईं और उन्हों 'आयरन लेडी' भी कहा गया.
अच्छी है ख़ामोशी

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डॉक्टर मनमोहन सिंह को गूंगा सरदार कहा गया लेकिन उनकी ख़ामोशी एक रणनीति का हिस्सा निकली.
अपनी ख़ामोशी के राज़ पर एक बार वो खुद बोले कि 'हज़ारों सवालों से अच्छी है हमारी ख़ामोशी.'
नरेंद्र मोदी भी मौन की कला में महारत रखते हैं. मुख्यमंत्री की हैसियत से 2002 के गुजरात के दंगों पर एक लम्बी ख़ामोशी उनके हित में सही साबित हुई.
ताज़ा विवादास्पद मुद्दों पर छायी ख़ामोशी के बाद हो सकता है उनकी चुप्पी रंग लाए लेकिन फिलहाल इससे उनकी छवि पर बुरा असर पड़ रहा है.
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