फिर इकबाल क्यों याद आए?

कोलकाता, जश्न-ए-इकबाल

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    • Author, पीएम तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए, कोलकाता से

कोलकाता में इन दिनों अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव 'जश्न-ए-इकबाल' का आयोजन चल रहा है.

पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी के 'जश्न-ए-इकबाल' महोत्सव को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं.

कोई इस आयोजन को राजनीतिक मान रहा है तो कोई इसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की गहराती दोस्ती के संकेत के तौर पर देख रहा है.

आख़िर इस आयोजन पर इतने सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं? विस्तार से पढ़ें.

पीएम तिवारी का आलेख

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘सारे जहां से अच्छा’ की थीम पर आयोजित 'जश्न-ए-इकबाल' के पहले दिन मशहूर शायर इकबाल को मरणोपरांत ‘तराना-ए-हिंद’ से नवाजा.

इकबाल के लिए ये सम्मान उनके पौत्र वलीद इकबाल ने स्वीकार किया.

कार्यक्रम का संचालन अभिनेता रजा मुराद ने किया.

पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी के कार्यक्रम 'जश्न-ए-इकबाल' पर एक ओर कई सवाल पैदा किए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर इससे ‘सारे जहां से अच्छा’ के रचयिता उर्दू कवि अल्लामा मोहम्मद इकबाल से जुड़े कुछ मिथक भी सामने आए हैं.

राजनीति की चाशनी में साहित्य?

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इकबाल की याद में अचानक ममता की ओर से ऐसे भव्य कार्यक्रम के आयोजन और इसमें शिरकत करने के लिए इकबाल के पौत्र को रातों-रात वीज़ा मिलने से कई सवाल पैदा हुए हैं.

इस मौके पर ममता ने भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों को मज़बूत करने की वकालत तो की ही, आलिया विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग खोलने और मोहम्मद इकबाल के सम्मान में एक चेयर की स्थापना करने का भी भरोसा दिया.

राजनीतिक जानकारों को ममता की इस पहल में राजनीतिक रंग नज़र आ रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक सुनंद घोष कहते हैं, "पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी के बैनर तले अचानक इकबाल को याद करना अगले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अल्पसंख्यकों को अपने पाले में खींचने की कोशिश हो सकती है. ममता की पहल और मोदी के हस्तक्षेप की वजह से ही वलीद को आनन-फानन में यहां आने के लिए वीजा मिल गया."

साहित्य और संस्कृति की सीमा

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लेकिन अकादमी से जुड़े तृणमूल कांग्रेस सांसद नदीमुल हक इस बात को खारिज करते हैं.

उनका कहना है, "इस कार्यक्रम का मकसद एक महान कवि को याद करना है. साथ ही इससे राज्य में उर्दू के प्रचार-प्रसार में भी सहायता मिलेगी. इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं."

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी कहना है कि साहित्य और संस्कृति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता.

इस मौके पर वलीद इकबाल ने कहा, ‘ऐसे साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों से दोनों देशों के लोगों को एक-दूसरे को करीब से जानने-समझने का मौका मिलेगा. इससे आपसी संबंध प्रगाढ़ होंगे.’

वलीद इकबाल एक बैरिस्टर होने के साथ ही साथ पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के नेता भी हैं.

इकबाल पर सवाल

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इकबाल पर लंबी चुप्पी ने उनको लेकर कई मिथक भी पैदा कर दिए हैं. मसलन वे सांप्रदायिक और हिंदी-विरोधी थे.

इकबाल का ज़िक्र होते ही यह सवाल भी उभरता है कि क्या अल्पसंख्यकों के लिए अलग पाकिस्तान की स्थापना का विचार उनकी ही देन थी?

उनके पौत्र वलीद इकबाल ने इनमें से कम से कम एक सवाल का जवाब तो दे ही दिया.

वलीद ने कहा, "मेरे दादाजान मोहम्मद इकबाल ने पाकिस्तान का सपना ज़रूर देखा था. लेकिन वे यह भी चाहते थे कि दोनों देशों का आपसी संबंध सारे जहां से अच्छा हो."

उर्दू अकादमी में इकबाल की दुर्लभ तस्वीरों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई है. इस दौरान आयोजित सेमिनार में इकबाल के जीवन और कार्यों पर शोध पत्र पढ़े जाएंगे.

कार्यक्रम का अंत इस कवि पर आयोजित एक मुशायरे से होगा.

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