क्या उर्दू ज़बान सचमुच मर रही है?

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- Author, रख़्शन्दा जलील
- पदनाम, लेखिका, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दिल्ली में इस वक्त जब एक उर्दू महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है तो हमारे पास ये देखने का एक मौका है कि उर्दू हमारी ज़िंदगी में कहां खड़ी है.
क्या उर्दू ज़बान को 'ग़ज़ल' गायकी में ही क़ैद कर दिया गया है. वे ग़ज़लें जिन्हें धीमी रोशनी और धुएं वाले कमरे में चमकीले कपड़े पहने गायक गाते हैं.
यह कहना कितना फ़ैशनेबल हो गया है कि मुझे <link type="page"><caption> उर्दू से मोहब्बत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/03/110320_faiz_sahitya_mb" platform="highweb"/></link> है, ख़ासकर 'गालिब जी' से, जबकि लोग दिल्ली के इस मशहूर शायर की जगह शेक्सपियर या वर्ड्सवर्थ को ज़्यादा याद करते हैं.
लगता है कि जैसे मशहूर होने का रास्ता बॉलीवुड फ़िल्मों से होकर ही जाता है? और इससे भी अहम सवाल ये है कि इस ज़बान को आख़िर हुआ क्या है जबकि अपनी ही लिपि से ये अलग हो गई थी.
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हालांकि इन सवालों के जवाब कोई बहुत आसान नहीं है पर <link type="page"><caption> उर्दू का मर्सिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/03/110201_spl_faiz_tripathi_vv" platform="highweb"/></link> पढ़ना भी उतना ही मुश्किल है.
एक लंबे अर्से से दिन में ख़्वाब देखने वाले लोग उर्दू और इससे जुड़ी ज़िंदगी की रवायत के ख़त्म हो जाने की बात कहते रहे हैं.
उर्दू में किताबें

यहां तक कि हिंदी-उर्दू की बहस भी उर्दू वाला बनाम हिंदी वाला की बहस में बंट कर रह गई है जैसे किसी अखाड़े में कोई नूरा-कुश्ती चल रही हो.
भारत का प्रकाशन उद्योग भी एक नज़र तो पाठकों की पसंद और उनकी चाहतों पर रखता है लेकिन दूसरी तरफ उसे मुनाफे के बारे में भी सोचना पड़ता है.
वह उर्दू को लेकर <link type="page"><caption> लोकप्रिय भावनाओं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/02/110218_faiz_centenary_mb" platform="highweb"/></link> को भुनाने से भी कभी पीछे नहीं रहा.
प्रकाशन उद्योग में 'पेंग्विन' और 'हार्पर कोलिंस' जैसी नामचीन कंपनियों ने भी उर्दू में किताबें छापना शुरू कर दिया है.
लोकप्रियता

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'ब्लाफ़्ट' जैसे छोटे खिलाड़ियों ने भी 'जासूसी दुनिया' का अनुवाद पेश किया है. उर्दू में इसके जासूसी क़िस्से ख़ासे लोकप्रिय हुए हैं.
हालांकि उर्दू के लेखक मंटो की देवनागरी या फिर अंग्रेज़ी में अनुवादित रचनाएं पढ़ी जा सकती हैं.
लेकिन वो उर्दू शायरी ही है जो लोकप्रियता के ऊपर के पायदान पर मौजूद है.
ये देखना अच्छा लगता है कि पूरे उपमहाद्वीप में लोग उर्दू साहित्य के विशाल खज़ाने की खूब छानबीन कर रहे हैं.
उर्दू का सहारा

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चाहे वो मीर या मोमिन जैसे नाम हों या फिर इक़बाल या फ़ैज़ जैसे क्रांतिकारी शायर हों या साहिर लुधियानवी या कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकार हों.
उर्दू के चाहने वाले अपनी पसंद और भावनाओं के मुताबिक कुछ न कुछ चुन ही लेते हैं.
ब्लॉग और वेबसाइट्स इसमें अपना योगदान कर रहे हैं. जब कोई बात न सूझे तो सांसदों को उर्दू का सहारा लेते देखा जाता था.
हाल के वक्त तक वित्त मंत्री का अपने बजट भाषण में उर्दू शायरी के अशआर पढ़ना रवायत का हिस्सा समझा जाता था.
'इंक़लाब ज़िंदाबाद'

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यहां तक कि भारत के मशहूर अंतरिक्ष यात्री से तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जब पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है तो उन्होंने कहा था, 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा.'
भारत के सुदूर इलाक़ों में आज भी आंदोलनकारी अपनी आवाज़ 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे के साथ ही उठाते हैं.
उर्दू का यह नारा अल्लामा इक़बाल ने पहली बार दिया था और देखते ही देखते यह पूरे देश में फैल गया था.
अलग अलग तरह के लोगों में उर्दू का इतनी ख़ूबसूरती से इस्तेमाल करने का इससे बेहतरीन उदाहरण और नहीं मिलता.
फ़ैज़ की नज़्म

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भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' नारे को लोकप्रिय बनाया.
पहली बार इसे एक गद्य के तौर पर रिकॉर्ड किया गया था लेकिन वर्ष 1928 में उर्दू के ओजस्वी शायर हसरत मोहानी ने इसे तत्कालीन कलकत्ता में मज़दूरों की एक रैली में नारे के तौर पर गाया था.
ठीक इसी तरह फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म 'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे/ बोल ज़ुबा अब तक तेरी है', एशिया के एक बड़े हिस्से में विरोध का गीत बन गया.
भारत में उर्दू

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'नौजवान ख़ातून से' में मजाज़ का अपनी उम्र की औरतों को झिड़की देना भारत में महिलाओं के आंदोलन का नारा बन गया था, 'तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था.'
हाल के वक्त में उर्दू ने नए जन्म के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है.
हालांकि पुनर्जन्म का मतलब किसी का गुज़र जाना भी होता है लेकिन हक़ीकत ये है कि भारत में उर्दू कभी मरी ही नहीं.
कुछ गिने चुने लोगों को भले ही ये लगता रहा हो. हां, ये सच है कि इसके प्रचार-प्रसार को कभी रोज़गार के मौकों से नहीं जोड़ा गया.
दिल और रूह

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ये भी सच है कि सरकार ने अपने हितों को बचाने के लिए महज़ खानापूर्ति के नाम पर पैसे ख़र्च किए हैं.
हां, उनमें से कई लोग ऐसे भी हैं जो शेर-ओ-शायरी की वाहवाही के नाम पर सिर हिलाते हैं क्योंकि इनके मायने समझने की बजाय शायद उन्हें यही आसान लगता है.
लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि उर्दू मर गई या फिर मर रही है. तमाम ख़राब बातों के बावजूद उर्दू न केवल ज़िंदा है बल्कि प्रासंगिक बनी हुई है.
उर्दू आज भी भारत के दिल और उसकी रूह की ज़ुबान है.
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