उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे...

- Author, आभा शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बुधवार को शुरू हुए जयपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन शाम के सत्र में दो उर्दू शायरों, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और कैफ़ी आज़मी को याद किया गया. इस मौक़े पर फ़ैज़ की बेटी सलीमा और कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना आज़मी ने अपनी यादों को श्रोताओं से साझा किया.
सलीमा ने बताया कि अक्सर वे लोगों से यह सुन कर मायूस हो जाती थीं कि “फैज़ की बेटी हो और शेर नहीं कहतीं?” तो उनके पिता फ़ैज़ उनका दिल रखने के लिए कहते थे, ''कह दिया करो, एक ख़ानदान में एक शायर ही बहुत है.''
सलीमा कई बार गणित के इम्तिहान में फ़ेल हो जाती थीं. ऐसे अवसर पर उनके पिता उनकी हौसला अफ़ज़ाई में कहते, ''मैं भी कभी गणित में पास नहीं हुआ.''
सलीमा पाकिस्तान की नामचीन चित्रकार और महिला अधिकारों की सशक्त आवाज़ हैं और शबाना भारत की बेहतरीन अदाकारा और सामाजिक कार्यकर्ता.
कभी पढ़ाया नहीं

इमेज स्रोत, PTI
शबाना ने बताया कि कैफ़ी साहब ने उन्हें पढ़ाया नहीं, बस उदाहरण से ही जीवन का फ़लसफ़ा, समानता आदि का मर्म समझा दिया.
शबाना ने कहा, "हर लड़की की तरह मेरी भी ख़्वाहिश थी कि एक नीली आँखों और सुनहरे बालों वाली गुड़िया की. पर मेरे पिता ने मुझे सात साल की उम्र में 'काली' गुड़िया लाकर दी और कहा कि काली भी सुंदर होती है."
सलीमा ने बताया कि पिता की मौत के बाद उन्हें कुछ काग़ज़ मिले जिन्हें दीमकों ने चाट डाला था. वे उनके पिता द्वारा किए गए उर्दू–अंग्रेजी अनुवाद थे जिसमें से वो 23 पन्नों बचाने में कामयाब रहीं.
शबाना ने कैफ़ी की 70 साल पुरानी नज़्म 'औरत' के अंश सुनाए जिसे सुनकर उनकी माँ ने उनके पिता से शादी का फ़ैसला ले लिया था. कैफ़ी तब कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और आमदनी थी महज़ 40 रुपए.
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
समाजवादी शायर

शबाना ने बताया कि वो ऐसे माहौल में बड़ी हुईं जहाँ कला को सामाजिक बदलाव का बड़ा माध्यम माना जाता था.
उन्होंने बताया कि उनके पिता ने उन पर कुछ थोपा नहीं क्योंकि उनका विश्वास था कि मिट्टी यदि गीली है तो अंकुर ज़रूर फूटेगा.
फ़ैज़ और कैफ़ी दोनों को क्रांतिकारी समाजवादी शायरों के रूप में जाना जाता है, हालांकि उनके बेहतरीन रोमांटिक गीत और नज़्में भी बहुत मशहूर हैं.
दोनों शायरों की बेटियाँ भी कला और समाज दोनों में दख़ल रखती हैं. सलीमा इसका इज़हार कूंची से करती हैं तो शबाना अदाकारी से. पर मानव अधिकारों के लिए और जो सही है उसकी वकालत का जज़्बा दोनों ने अपने-अपने पिता से ही पाया.
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