अयोध्या में शुरू हुई सुगबुगाहट के मायने

- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भजन-कीर्तन-आरती के अलावा अक्सर उनींदे रहने वाले अयोध्या को मई महीने के पहले हफ़्ते से अचानक लगने लगा है कि जैसे कुछ होने वाला है.
सरयू की तलहटी में थोड़ी-सी हलचल है लेकिन फ़िलहाल इतनी नहीं कि सतह पर दिखाई पड़े.
साल भर पहले, केंद्र में सरकार बदलने के बाद भी अयोध्या को इस बात पर बहुत भरोसा नहीं था कि ध्वस्त बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम जन्मभूमि मंदिर बन जाएगा.
इस मुद्दे की सियासत उसके सामने साफ़ थी इसलिए सवाल न उसने पूछे, न बाहरवालों ने. बात जहां थी, बनी रही.
बीच में कुछ फुटकर ख़बरें थीं कि मामला शायद अदालत से बाहर सुलझाने का प्रयास हो पर दोनों ओर के अक्खड़पंथी अड़ गए.
अपना नज़रिया बदलने को तैयार नहीं थे और बात घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई. एक कहानी पढ़ी गई, जिसका शीर्षक था ‘पुनर्मूषकोभव.’
सुगबुगाहट

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह दस मई को अयोध्या गए तो इशारों में लोगों को तीन बातें समझ आईं.
एक, कि मामला अदालत में है, प्रतीक्षा करिए और दूसरी, कि सरकार के पास बहुमत लोकसभा में है, राज्यसभा में नहीं. मतलब साफ़ था कि दोनों संभावनाएं बीरबल की खिचड़ी हैं. उनपर बहुत आस न रखी जाए.
यह संभावना भी खारिज मान ली जाए कि सरकार मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बनाएगी या कि उसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाएगा.
तीसरी बात इससे अलग थी और वही ताज़ा सुगबुगाहट की वजह बनी. लगा कि जैसे अंदर-अंदर कुछ पक रहा है और इस राह चलना मंज़िल को क़रीब ले आएगा.
हो सकता है इससे दशकों से चल रहे विवाद की चौखट लांघी जा सके.
दस तारीख़ को, अपने कुछ घंटे के अयोध्या प्रवास के दौरान, राजनाथ सिंह ‘रामलला’ के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ज्ञानदास से अकेले मिले. दोनों के बीच क़रीब पौन घंटा बातचीत हुई.
एक समय विश्व हिंदू परिषद के ‘धुर विरोधी’ कहे जाने वाले महंत ज्ञानदास की राय परिषद और उसके नेताओं के बारे में बदली नहीं है. आलोचना उतनी ही मुखर है.
संकेत

इमेज स्रोत, AFP
गृहमंत्री की ज्ञानदास से भेंट को ‘संकेत’ की तरह देखा जा रहा है और ख़ुद ज्ञानदास का कहना है, ‘हो सकता है यह विवाद कुछ महीने में हल हो जाए. शायद इस साल के अंत तक.’
ज्ञानदास ने कहा, "प्रयास यह है कि राम मंदिर के निर्माण के लिए गारा दूध से बने, ख़ून से नहीं. यह संभव है, हो सकता है."
यह पूछने पर कि मस्जिद का क्या होगा, उन्होंने कहा "अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां नमाज़ पढ़ी जाती है. एक तो अधिग्रहीत भूमि के बिलकुल बगल में है. बीच में सिर्फ़ एक सड़क है. कहीं भी आलीशान मस्जिद बन सकती है."
इस विवाद के दूसरे पक्षकार हाशिम अंसारी इस दौरान महंत ज्ञानदास से मिलते रहे हैं. बानवे वर्ष के हाशिम अंसारी को गोद में उठाकर हनुमान गढ़ी ले जाया जाता है. दस मई को भी उन्हें जाना था लेकिन उस दिन मुलाक़ात हो नहीं पाई.
हाशिम अंसारी ने कहा, "यह विवाद हल हो सकता है लेकिन पहले वे अपने मुक़दमे वापस ले लें. मुक़दमे उन्होंने दायर किए हैं, हमने नहीं."
नीयत

इस सवाल पर कि क्या यह मामला आपके जीते जी सुलझ सकता है, अंसारी ने कहा, "क्यों नहीं. बिल्कुल सुलझ सकता है."
हाशिम अंसारी इस बात से नाराज़ थे कि राजनाथ सिंह उनसे मिलने नहीं आए. कहा, "नीयत का सवाल है. किसने रोका था उन्हें? उनको आना चाहिए था."
अंसारी का एक-मंज़िला छोटा सा घर अयोध्या-फ़ैज़ाबाद मुख्य मार्ग से बमुश्किल पचास मीटर दूर है. सड़क से साफ़ दिखता है. उनका दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है. सामने एक तंबू के नीचे बंदूकधारी पुलिसवाले बैठे रहते हैं.
राजनाथ सिंह उसी सड़क से दो बार गए लेकिन वहां रुके नहीं. रुकते तो शायद सुगबुगाहट और बड़ी हो गई होती.
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