'शांति चाहिए हमें, ले जाओ बाबरी मस्जिद'

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- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली
अयोध्या की विवादित ज़मीन का मुक़दमा 1949 से चल रहा है. हाशिम अंसारी कहते हैं कि इसका फ़ैसला न्यायालय को जल्द करना चाहिए और जो विवादित भूमि है, वह पूरी की पूरी किसी एक पक्ष को दे देनी चाहिए.
अयोध्या के हाशिम अंसारी विवादित भूमि के मालिक़ाना हक़ का मुकदमा लड़ते-लड़ते 92 साल के हो चुके हैं.
वीएचपी की ज़मीन हासिल करने की कोशिश के बारे में पूछे जाने पर अंसारी कहते हैं, "हमें शांति चाहिए देश में. ले जाओ बाबरी मस्जिद. हमें बाबरी मस्जिद नहीं, हमें शांति चाहिए."
शकील अख़्तर की रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा

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विश्व हिंदू परिषद ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह अविलंब एक अध्यादेश जारी कर अयोध्या की विवादित भूमि को राम जन्म भूमि मंदिर के हवाले कर दे.
मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान जाने माने इस्लामी विद्वान और धार्मिक नेता हैं. उनका शुरू से यह मत रहा है कि मुसलमानों को बाबरी मस्जिद कहीं और बनाकर इस विवाद को हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहिए.
वे कहते हैं, "यह मस्जिद और मदरसे वाले लोग आज के दौर को समझते नहीं हैं, वरना यह मसला कब का हल हो गया होता. अरब देशों में इस तरह के विवादों को रिलोकेशन के ज़रिए तो कब का हल कर लिया गया होता."
क्यों नहीं निकला हल?

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शिया धार्मिक नेता मौलाना कल्बे जव्वाद कहते हैं कि दोनों बिरादरियों की संकीर्णता की वजह से यह विवाद अभी तक हल नहीं हुआ है.
"मुसलमानों को चाहिए कि वह अपने बड़े धार्मिक गुरुओं से मशविरा करें और इस मसले को ख़त्म करें."
सबसे बड़ा सवाल यह है कि न विश्व हिंदू परिषद भारत के सारे हिंदुओं की प्रतिनिधि है और न ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सभी मुसलमानों की नुमाइंदा है. ऐसे में शुरुआत कौन करे?

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सूफ़ी रहनुमा मौलाना सैय्यद अशरफ़ किछौछवी कहते हैं कि अगर बाबरी मस्जिद वहां से हटा ली जाए तो इस बात की क्या गारंटी है कि यह मामला यहीं ख़त्म हो जाएगा? उनकी राय में इसे न्यायालय पर छोड़ना ही एकमात्र उचित रास्ता है.
मंदिर और मस्जिद का यह विवाद अंतिम फ़ैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट में है. हाईकोर्ट ने जो फ़ैसला सुनाया है उसे इस केस के तीनों पक्षों ने चुनौती दी है.
मंदिर और सत्ता

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इस विवाद ने भारत की राजनीति और समाज को एक लंबे अरसे तक प्रभावित किया है.
भारत की न्यायपालिका और सरकारें अयोध्या के इस पेचीदा विवाद को हल करने में अभी तक नाकाम रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक इस मुद्दे पर खामोशी बनाए रखी है.
आने वाले दिनों में इस विवाद को हल करने का लिए उन पर दबाव बढ़ता जाएगा क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत हासिल है और उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठन इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं.
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