रूस के बच्चे को भारत में मिला दिल

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दो साल नौ महीने का ग्लेब कुद्रिआत्सेव भारत में सफलतापूर्वक शिशु हृदय प्रतिरोपण कराने वाला पहला बच्चा है.
यह ऑपेरेशन चेन्नई में हुआ है. ग्लेब को बेंगलुरू के मणिपाल हॉस्पिटल में 18 दिसंबर को ब्रेन डेड घोषित किए गए दो साल के एक बच्चे का दिल लगाया गया है.
ग्लेब कई मायनों में क़िस्मत वाला साबित हुआ. दो साल के बच्चे के दिल को एयर एंबुलेंस से रिकॉर्ड 47 मिनट में बेंगलुरू से चेन्नई के फ़ोर्टिस मालार हॉस्पिटल में लाया गया.
डॉक्टरों ने चार घंटे के अंदर प्रतिरोपण की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली.
इस कहानी का सबसे बेहतरीन पहलू यह रहा कि प्रतिरोपण के सारे मापदंड मसलन दिल का वजन, ब्लड ग्रुप सभी मैच कर गए.
सबसे ख़ास बात तो यह थी कि चेन्नई या पूरे तमिलनाडु या फिर देश के किसी भी हिस्से में कोई ऐसा मामला नहीं था जिसमें प्रतिरोपण के लिए दिल लिया जा सकता था.
क़िस्मत

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फ़ोर्टिस मालार हॉस्पिटल के हृदय प्रतिरोपण विभाग के निदेशक डॉक्टर केआर बालाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी से कहा,"यह एक बहुत ही पारदर्शी मामला है. यह बहुत हद तक क़िस्मत की बात है. अगर कोई भारतीय बच्चा देश में कहीं भी रहता तो उसका हृदय प्रतिरोपण होता, लेकिन ऐसा कोई भी बच्चा नहीं था."
ग्लेब एक साल तक बिल्कुल स्वस्थ बच्चा था, लेकिन उसके बाद उसकी मां ने नोटिस किया कि ग्लेब को सांस लेने में दिक्कत हो रही है.
पता चला कि ग्लेब 'रिस्ट्रिक्टिव कार्डियोमॉयोपैथी' से ग्रस्त था. जर्मनी के म्युनिख़ में ग्लेब की मां नेली कुद्रिआत्सेव ने जब ग्लेब को दिखाया तो वहाँ के डॉक्टरों ने फेफड़ों पर उच्च दबाव के कारण इलाज करने से मना कर दिया था.
निराश नेली रूस लौट आईं. अमरीका में इलाज महंगा होने की वजह से उन्होंने भारत आने का फ़ैसला किया.
डॉक्टर बालाकृष्णन ने बताया,"आधिकारिक रूप से यह मामला हमारे पास रूस से आया. शिशु हृदय प्रतिरोपण ज़्यादातर अमरीका,पश्चिमी यूरोप और दक्षिण अमरीका के कई हिस्सों में होते हैं."
ग्लेब और उसकी मां ने यतार्थ के माता-पिता के फ़ैसले का एक महीने तक इंतज़ार किया. इस दौरान ग्लेब की हालत 'गंभीर' बनी हुई थी.
जब डॉक्टर बालाकृष्णन, डॉक्टर सुरेश राव और उनकी टीम ने ऑपरेशन थिएटर में नए दिल का प्रतिरोपण शुरू किया तो उस वक़्त ग्लेब के फेफड़े की धमनी में खून का दबाव बढ़ गया था जिससे आशंका थी कि प्रतिरोपण के बाद दायां निलय (वेंट्रिकुलर) ठप पड़ जाएगा.
डॉक्टर सुधाकर राव ने हॉस्पिटल की ओर से जारी बयान में बताया कि प्रत्यरोपण के बाद नए दिल को सुचारू रूप से काम करने में दस दिन लग गए. इसके बाद ग्लेब की स्थिति में तेज़ी से सुधार हुआ है. ग्लेब का वजन सात किलो से बढ़कर साढ़े दस किलो हो गया है.
चुनौती

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डॉक्टर बालाकृष्णन कहते हैं, "यह दिल बच्चे की उम्र के साथ बढ़ेगा और 15-20 साल तक, यहां तक कि 35 साल तक भी आराम से काम करता रहेगा. अगर जरूरत पड़ी तो तब एक और प्रतिरोपण हो सकता है, लेकिन ज़बर्दस्त तकनीकी विकास को देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि तब किस तकनीकी से इलाज होगा."
इलाज के दौरान डॉक्टरों को एक दूसरी तरह की समस्या का भी सामना करना पड़ा. नेली को सिर्फ रूसी भाषा आती थी, तब रूस में पढ़े एक डॉक्टर ने दुभाषिए की भूमिका अदा की.
इस सफल ऑपरेशन ने नेली के भारत के प्रति नज़रिए को भी बदल दिया. नेली कहती हैं, "मुझे भारत की एक भयावह तस्वीर दिखाई गई थी, लेकिन अब ये बिल्कुल अलग है."
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