लड़ाई किरण-केजरीवाल की, टेस्ट 'मोदी मैजिक' का

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- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
देश की राजधानी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भले न मिला हो लेकिन इसके विधानसभा चुनाव की सियासी-रंगत बेहद दिलचस्प हो गई है.
राष्ट्रीय-राजनीति के लिए भी इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
महज़ आठ महीने पहले, जिस कांग्रेस पार्टी के हाथ में पूरे देश की सत्ता थी और जिसने राष्ट्रीय-राजधानी की प्रांतीय सरकार का भी लगातार 15 सालों तक नेतृत्व किया, इस चुनाव में वह पूरी तरह हाशिये पर दिखाई दे रही है.
दिल्ली में सीधा मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और महज़ दो साल पहले बनी आम आदमी पार्टी (आप) के बीच हो गया है.
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देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और अन्ना हज़ारे अभियान में अरविंद केजरीवाल के साथ रहीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने चुनावी लड़ाई को जितना रोचक बनाया, उतना ही विवाद खड़ा किया है.
यह पहला मौक़ा है, जब देश के एक प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल ने किसी 'नवागंतुक' के नेतृत्व में प्रांतीय स्तर का चुनाव लड़ने का ऐलान किया.
किरण बेदी 16 जनवरी को भाजपा में शामिल हुईं और 19 जनवरी को उन्हें मुख्यमंत्री पद का पार्टी-प्रत्याशी बनाने का ऐलान हो गया. पुलिस सेवा से समय-पूर्व अवकाश ग्रहण के बाद किरण एनजीओ चलाती रही हैं.
पुराने साथी

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सन 2011 में अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में छिड़े भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के ज़रिये वह पहली बार किसी जन-राजनीतिक अभियान से जुड़ीं.
लेकिन नवम्बर, 2012 में जब इस आंदोलन से जुड़े नेताओं-कार्यकर्ताओं के एक बड़े समूह ने अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन किया तो किरण ने उसमें शामिल होने से यह कहते हुए इंकार किया कि चुनावी लड़ाई और सत्ता-राजनीति उनके एजेंडे में नहीं हैं.
लेकिन किरण आज चुनावी-राजनीति में बड़ी दिग्गज बनकर उभरी हैं और उनकी मुख्य चुनौती हैं, पुराने साथी केजरीवाल.
विधानसभा चुनाव

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किरण और केजरीवाल, दोनों की कोशिश है कि वे अपनी-अपनी पार्टी को विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिलाकर सरकार बनाएं ताकि विधानसभा के पिछले चुनाव जैसी त्रिशंकु-स्थिति न पैदा हो.
सन 2013 के चुनाव में 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा में भाजपा को सबसे अधिक 31 सीटें, पहली बार राजनीति में आई आम आदमी पार्टी को 28 सीटें और तब सरकार चलाने वाली कांग्रेस को सिर्फ़ आठ सीटें मिली थीं.
जब भाजपा सरकार नहीं बना सकी तब दूसरे नंबर की पार्टी 'आप' ने कांग्रेस समर्थन से सरकार का गठन किया. लेकिन वह महज़ 49 दिनों तक चली.
किरण बनाम केजरीवाल

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तब से दिल्ली में उपराज्यपाल के ज़रिये राष्ट्रपति शासन चल रहा था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने हाल के जिन प्रांतीय चुनावों में अच्छी-ख़ासी कामयाबी हासिल की, उनमें कहीं भी मुख्यमंत्री पद का पार्टी-प्रत्याशी नहीं घोषित किया गया.
महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों के हाल के चुनावों में हर जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही चुनाव-अभियान के सिरमौर थे.
प्रांतीय नेतृत्व के सवाल पर पूछे हर सवाल के जवाब में भाजपा नेतृत्व का टका सा जवाब होता था कि चुनाव के बाद पार्टी का संसदीय बोर्ड नए नेता का चुनाव करेगा.
नेता का नाम

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मोदी-शाह की अगुवाई वाली भाजपा ने पहली दफ़ा चुनाव से पहले ही किसी राज्य में अपने नेता के नाम का एलान किया है.
दूसरी तरफ़, 'आप' के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार केजरीवाल हैं. इस तरह यह चुनाव प्रांतीय स्तर पर किरण बनाम केजरीवाल हो गया है.
बताते हैं कि भाजपा नेताओं का एक समूह तो यह भी चाहता था कि किरण बेदी केजरीवाल के विधानसभा क्षेत्र-नई दिल्ली से ही सदन की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ें लेकिन किरण के सुझाव पर उन्हें कृष्णानगर क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया गया.
'राजनीतिक-अभ्युदय'

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इस सीट को भाजपा अपने लिए बेहद आसान और सुरक्षित सीट मानती है. केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन इसी सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं.
सिर्फ विरोधियों में ही नहीं, भाजपा के अंदर भी किरण बेदी के नेतृत्व को लेकर खलबली है.
सांसद मनोज तिवारी और वरिष्ठ नेता जगदीश मुखी सहित कुछ नेताओं ने बेदी के 'राजनीतिक-अभ्युदय' पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाया.
प्रबल दावेदार

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लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की डांट-फटकार के बाद वे शांत हो गए. अंदर-अंदर अब भी भाजपा में बेदी के अचानक थोपे जाने से खलबली और नाराज़गी है.
इसे कर्मठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और अनदेखी माना जा रहा है. केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन भी नाख़ुश बताए जाते हैं, जिन्हें हाल तक मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जाता रहा है.
कहा तो यह भी जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस फ़ैसले से नाख़ुश है. पर शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने किरण की अगुवाई में चुनाव लड़ने की पहल को 'दिल्ली जीतने की ज़रूरी रणनीति' बताकर संघ को फ़िलहाल मना लिया है.
'मोदी-मैजिक'

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अब तक हुए ज़्यादातर चुनावी सर्वेक्षणों में 'भाजपा-आप टक्कर' को कांटे की लड़ाई बताया गया है. माना जा रहा है कि हार-जीत का फ़ैसला बहुत कम वोटों या सीटों के अंतर से होगा.
जहां शहरी मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ मज़बूती से खड़ा दिखाई दे रहा है, वहीं ग़रीब तबक़े, अल्पसंख्यकों और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों का बड़ा हिस्सा 'आप' का साथ देता बताया जा रहा है.
सरकार की साख

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यह चुनाव केंद्र की मोदी सरकार की साख पर कोई जनमत-संग्रह भले न हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि दिल्ली के मतदाता इस बार किरण-केजरीवाल के प्रति अपनी पसंद-नापसंद के अलावा साढ़े सात माह पुरानी केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर अपने रुख़ का भी इज़हार करेंगे.
हाल के दिनों में केंद्र द्वारा लाए गए कई अध्यादेश, श्रम क़ानूनों में संशोधन की पहल, महंगाई, धर्मांतरण-घर वापसी और सांप्रदायिक तनाव जैसे मसले लोगों के बीच चर्चा और विवाद का विषय बने रहे हैं.
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