धर्मांतरण: पूछो तो चुप, ना पूछो तो सज़ा

ओडिशा में धर्म परिवर्तन

इमेज स्रोत, Simanchal Pattanaik

    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, भुवनेश्वर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

ओडिशा में 1967 में पारित 'ओडिशा धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून' पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है.

दरअसल 'घर वापसी' विवाद में भाजपा ने धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए संसद में एक क़ानून लाने का प्रस्ताव किया है.

आख़िर 'ओडिशा धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून' क्या है और इसके बारे में राय अलग-अलग क्यों है?

ओडिशा में जब धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून पारित हुआ तो उस समय स्वतंत्र पार्टी और जन कांग्रेस की गठबंधन सरकार थी. यह क़ानून धर्मांतरण पर पूरी तरह रोक तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक अंकुश ज़रूर लगाता है.

इस क़ानून के तहत धर्म बदलने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को ज़िला प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है.

लालच देकर, बरगला कर या धमकी देकर किया गया धर्मांतरण दंडनीय अपराध है और इसके लिए दो साल की जेल या/और 10,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है.

ओडिशा में धर्म परिवर्तन

इमेज स्रोत, Simanchal Pattanaik

इस क़ानून को लेकर हिन्दू और गैर-हिन्दू संगठन बिलकुल अलग राय रखते हैं.

अशांति और मतभेद

ईसाई संगठन और धार्मिक नेताओं का कहना है कि 'ओडिशा धार्मिक स्वतंत्रता कानून' संविधान की धारा 25 में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है और इसलिए इसे ख़ारिज किया जाना चाहिए.

दूसरी तरफ हिन्दू संगठनों का मानना है कि यह क़ानून धर्मांतरण रोकने में विफल रहा है और इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है.

ओडिशा में धर्म परिवर्तन

इमेज स्रोत, Sanjib Mukhrejee

भुवनेश्वर के आर्कबिशप जॉन बरवा ने बीबीसी से कहा, "एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में इस तरह के क़ानून की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. अगर संविधान ने लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता दी है, तो फिर इस तरह की रुकावट क्यों?"

आर्कबिशप का समर्थन करते हुए वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता विश्वप्रिय क़ानूनगो कहते हैं कि इस क़ानून को 'धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून' कहना सरासर गलत है क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय इस पर अंकुश लगाता है.

संसद में इस तरह के क़ानून लाने की कोशिश का कड़ा विरोध करते हुए वह कहते हैं, "इससे अशांति और मतभेद बढ़ेगा तथा क़ानून व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी."

चर्चित कंधमाल

दूसरी ओर विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ नेता प्रमोद दास ने ओडिशा के धर्मांतरण क़ानून को बिलकुल बेअसर बताया है.

हिन्दू कट्टरपंथी

इमेज स्रोत, AP

प्रमोद दास धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए एक केंद्रीय क़ानून पारित किए जाने की पैरवी करते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मिशनरियों द्वारा बरगलाकर धर्मांतरण करने पर रोक लगाने में यह क़ानून पूरी तरह से विफल रहा है. अगर इस तरह के धर्मांतरण को रोकना है तो एक केंद्रीय क़ानून पारित करने की ज़रूरत है. संविधान की धारा 25 अगर इसमें बाधक होती है, तो उसे संशोधित किया जाना चाहिए."

ओडिशा में धर्म परिवर्तन

इमेज स्रोत, Shivaji Moulik

सरकार के मुताबिक़ कंधमाल में पिछले पांच सालों में केवल दो लोगों ने 1967 के इस क़ानून के तहत धर्म परिवर्तन किया जबकि दो अन्य ने प्रशासन से धर्म परिवर्तन की अनुमति मांगी.

कंधमाल सांप्रदायिक तनाव और दंगों के लिए पूरी दुनिया में चर्चित रहा है.

अनुमति नहीं मिली

कंधमाल दंगों के पीड़ित

इमेज स्रोत, Shivaji Moulik

धर्म परिवर्तन की अनुमति मांगने वाले प्रदीप कुमार दास ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने साल 2010 में बैप्टाइज होने के बाद ज़िला प्रशासन से ईसाई धर्म ग्रहण करने की अनुमति मांगी थी लेकिन उनके आवेदन पर अभी तक कोई फ़ैसला नहीं हुआ है.

'ओडिशा धार्मिक सवतंत्रता क़ानून' के बारे में पूछे जाने पर उदयगिरि में स्वतंत्र संगठन चलाने वाले दास ने कहा, "सच पूछिए तो मुझे इस क़ानून के बारे में कुछ ख़ास जानकारी नहीं है. मैं तो बस एक शुरुआत करना चाहता था, जिससे आगे चल कर जो धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उनके लिए एक रास्ता तय हो जाए."

प्रदीप कुमार दास ने बताया कि जनवरी में वह ज़िलाधीश से मिलेंगे और मामले को निपटाने की कोशिश करेंगे. उन्होंने कहा कि वह हर मायने में ईसाई ही हैं.

बजरंग दल के राज्य संयोजक रमाकांत रथ का दावा है कि पिछले पांच बरसों में कंधमाल में सैकड़ों धर्मांतरण हुए हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश की ख़बर प्रशासन के पास पहुंचती ही नहीं है.

क्रिसमस पर बवाल

कंधमाल दंगों के पीड़ित

इमेज स्रोत, Shivaji Moulik

देश के दूसरे हिस्सों में जहाँ 'घर वापसी' को लेकर बवाल मचा हुआ है, वहीं ओडिशा में भी क्रिसमस पर सुंदरगढ़ ज़िले के बालीसूडा गांव में 12 आदिवासी हिन्दू परिवारों द्वारा कथित रूप से ईसाई धर्म ग्रहण के बाद हंगामा हो गया.

एक ओर तो स्थानीय चर्च के पास्टर ने इस आरोप से इंकार किया.

हिंदू कार्यकर्ता

इमेज स्रोत, AFP

लेकिन गांव के मुखिया की ओर से लिखित रूप में मामला दर्ज किेए जाने और संघ परिवार के स्थानीय कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद पुलिस और प्रशासन इस आरोप की जांच कर रही है.

अब देखना यह है कि कंधमाल दंगों के बाद भाजपा से पल्ला झाड़कर धर्मनिरपेक्षता का दामन थामने वाले नवीन पटनायक की बीजू जनता दल सरकार इस मामले में क्या क़दम उठाती है?

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>