'ये है ईसाइयों, भगवा ब्रिगेड की प्रयोगशाला'

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
छत्तीसगढ़ का जशपुर ज़िले में प्रतिशत के हिसाब से राज्य की सबसे ज़्यादा ईसाई आबादी रहती है.
स्वास्थ्य, शिक्षा और कानूनी सहायता के ज़रिए ईसाई मिशनरी आदिवासियों को चर्च में ले गए तो यहीं से भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव ने उनकी हिंदू धर्म में वापसी का सघन अभियान चलाया.
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आज जशपुर का साक्षरता प्रतिशत राज्य में सबसे अधिक है तो यहां से बस्तर तक ईसाई और हिंदू संगठनों के बीच तकरार बढ़ रही है.
धर्मांतरण पर बीबीसी की सिरीज़ की पहली कड़ी

जशपुर बस स्टैंड में खड़े कुनकुरी इलाके के जोग साय अपनी नाक से बीड़ी का धुंआ निकालते हुए दार्शनिक अंदाज़ में कहते हैं, "जशपुर सबके लिए प्रयोगशाला है. ईसाई मिशनरी के लिए भी और भगवा संगठनों के लिए भी."
50 साल के होने को आए जोग साय से आप जशपुर को लेकर कोई बात छेड़ें तो वो एक के बाद एक किस्से बताने लग जाते हैं.
वो बताते हैं कि किस तरह आदिवासी बहुल इस इलाके में 1860 के आसपास ईसाई मिशनरियों का प्रवेश हुआ और किस तरह 1952 में संघ ने देश में अपना पहला कल्याण आश्रम जशपुर में खोला.
उसके बाद जशपुर के ही दिलीप सिंह जूदेव ने कैसे जशपुर समेत पूरे मध्य भारत में ईसाई संगठनों में गए आदिवासियों के पैर धोकर कथित तौर पर हिंदू धर्म में ‘घर वापसी’ का अभियान चलाया. कैसे फिर एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च कुनकुरी इलाक़े में बनाया गया.
क़ानूनी मदद

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ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय से स्नातक कुनकुरी के रहने वाले अभय खाखा बताते हैं, "इस इलाके में शिक्षा या स्वास्थ्य के बजाए ईसाई मिशनरी ने शुरुआती दौर में क़ानूनी सहायता देकर आदिवासियों का दिल जीता. अंग्रेज़ी सरकार की कचहरियों से मिलने वाला नोटिस किसी आदिवासी के लिए बंदूक की गोली से कहीं अधिक खतरनाक होती थी."
खाखा मानते हैं कि ईसाई धर्म प्रचारकों ने आदिवासियों के लिए अबूझ भाषा में मिलने वाले सरकारी नोटिसों के मामले में उनकी क़ानूनी मदद की.
उनकी सहानुभूति पाकर आदिवासियों ने ईसाई धर्म को स्वीकार करना शुरू किया.

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आज की तारीख़ में छत्तीसगढ़ के जशपुर ज़िले की पहचान राज्य के सर्वाधिक ईसाई बहुल इलाके के तौर पर है, जहां 8,51,669 की कुल आबादी में से लगभग 43 फीसदी आबादी ईसाइयों की है. 65.37 फीसदी आदिवासियों वाले इस इलाके में राज्य के श्रेष्ठतम स्कूल-कॉलेज हैं.
यही कारण है कि बस्तर जैसे दूसरे आदिवासी बहुल इलाकों में जहां साक्षरता दर 54.40 प्रतिशत है, वहीं जशपुर में यह आंकड़ा 67.92 प्रतिशत है.
'बढ़ी तकरार'

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वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े हुए दिलमनरति मिंज का कहना है कि सभी लोगों ने आदिवासी समाज पर दबाव और प्रलोभन दे कर उन्हें उनकी संस्कृति से काटने का काम किया है.
वह कहते हैं, "आदिवासी भी हिंदू समाज का ही हिस्सा हैं लेकिन जब उनको, उनकी जड़ों से काटा गया तो हिंदू समाज उनके पक्ष में खड़ा होने नहीं आया. हमारा संगठन आदिवासी समाज को उनकी सभ्यता, संस्कृति में बनाए और बचाए रखने की कोशिश में जुटा है."
मिंज का दावा है कि जशपुर समेत मध्य भारत में ऑपरेशन घर वापसी चलाने वाले दिलीप सिंह जूदेव के कारण ही आदिवासी समाज बच पाया. वह आरोप लगाते हैं कि ईसाई संगठन अभी भी आदिवासियों के धर्मांतरण में जुटा हुआ है.

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लेकिन छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के महासचिव अरुण पन्नालाल का दावा इससे उलट है. उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में राज्य में ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या घटी है. अलग-अलग इलाकों में उनकी जनसंख्या वृद्धि दर में भी कमी आई है.
अरुण पन्नालाल तर्कों के साथ कहते हैं, "हम पर धर्मांतरण का आरोप धार्मिक कारणों से नहीं लगाया जाता, बल्कि इसके पीछे का कारण राजनीतिक है."
ज़ाहिर है, दोनों तरह के दावों के बीच ईसाई और हिंदू संगठनों के बीच तकरार की घटनाएं जशपुर से लेकर बस्तर तक बढ़ी हैं.
पिछले कुछ सालों में ईसाई संगठनों पर हमले और मुकदमे की 270 से अधिक घटनाएं राज्य के अलग-अलग हिस्सों में सामने आई हैं.
'सरकार फेल हुई'

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ईसाई धर्म के प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया के मध्यक्षेत्र के महासचिव रेवरेंड अखिलेश एडगर का मानना है कि राज्य में भाजपा की सरकार आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समेत अन्य हिंदूवादी संगठनों के हमले ईसाई समाज पर बढ़े हैं.
अखिलेश ज़ोर देकर कहते हैं, "संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मानता है, जबकि संघ की अवधारणा एक हिंदू राष्ट्र की है. यही विवाद की जड़ है."
हालांकि कुनकुरी के हेमंत कुमार नायक अपने को हिंदू मानते हैं. वह दावा करते हैं कि ईसाई मिशनरी ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो काम किया है, उसी के कारण आदिवासी ईसाई समाज की ओर झुके.
हेमंत कहते हैं, "जो काम सरकार को करना चाहिए था, ईसाई मिशनरी ने किया. सरकार की अनुपस्थिति के कारण आदिवासी समाज ईसाई बना. आप इसे दबाव कहें, प्रलोभन कहें. सरकार को अब इस दिशा में काम करना चाहिए."
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