जस्टिस गीता गोपी: जज जिन्होंने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया

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- Author, सुचित्रा मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
'मोदी सरनेम' वाली टिप्पणी को लेकर मानहानि के मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में सूरत कोर्ट के फ़ैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
इस मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर शनिवार को गुजरात हाईकोर्ट में जस्टिस हेमंत प्रच्छक की अदालत में सुनवाई हुई.
बीते बुधवार जब मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट की जस्टिस गीता गोपी ने इस मामले की सुनवाई से खुद को 'अलग' कर लिया था.
उल्लेखनीय है कि 'मोदी सरनेम' वाली टिप्पणी के मामले में सूरत की अदालत द्वारा राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी संसद की सदस्यता रद्द हो गई थी.
इस मामले में सेशन कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद राहुल गांधी ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
लेकिन जस्टिस गीता गोपी के मामले से खुद को 'अलग' करने का फ़ैसला करने के साथ ही यह मामला कौतूहल का विषय बन गया है.
शनिवार को गुजरात उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और मामले की अगली सुनवाई दो मई को निर्धारित की है.
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कौन हैं गीता गोपी
24 मार्च, 1966 को गुजरात के नवसारी में जन्मीं जस्टिस गीता गोपी ने सूरत के केपी कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से स्नातक किया.
उसके बाद उन्होंने दिनशॉ डब्बू लॉ कॉलेज, नवसारी से क़ानून में स्नातक की उपाधि हासिल की.
गीता गोपी ने जनवरी 1993 में नवसारी के ज़िला न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता केपी देसाई के चैंबर से एक वकील के रूप में अपना करियर शुरू किया.
इसके अलावा वह 13 साल तक दिनशॉ डब्बू लॉ कॉलेज में पार्ट टाइम लेक्चरर के तौर पर भी काम कर चुकी हैं.
उन्होंने 24 नवंबर, 2008 को ज़िला न्यायाधीश के पद पर कार्यभार ग्रहण किया. उन्होंने कई दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई की.
इसके अलावा उन्होंने सीबीआई और पोटा कोर्ट में स्पेशल जज के तौर पर भी काम किया है. जहां उन्होंने कई अहम केसों की सुनवाई की.
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3 मार्च, 2020 को उन्हें गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था.
वे गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने से पहले, 2014 में प्रतिनियुक्ति पर गुजरात उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रार थीं. वह 23 मार्च 2028 को सेवानिवृत्त होंगी.
गुजरात हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट यतिन ओझा ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "जस्टिस गीता गोपी एक अच्छी जज हैं. वे बहुत कुशल हैं. ये अपनी क्षमता और कौशल के हिसाब से अच्छे फ़ैसले लेती हैं. राहुल गांधी मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का फ़ैसला उनका निजी फ़ैसला रहा होगा."
जस्टिस गोपी के इस क़दम के पीछे के कारणों पर उन्होंने कहा, "हो सकता है कि वह इस तरह के हाई-प्रोफाइल मामले में शामिल नहीं होना चाहती हों या विचारधारा के कारण यह क़दम उठाया हो."
"अक्सर न्यायाधीश किसी मामले से खुद को अलग कर लेते हैं जब मामले का उनकी पिछली भूमिका से कुछ लेना-देना होता है. न्यायाधीश ऐसा तब करते हैं जब किसी मामले में स्वयं एक वकील होते हैं या पहले से ही उस व्यक्ति का केस लड़ चुके होते हैं."
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नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में विशेष ट्रायल कोर्ट की पूर्व जज ज्योत्स्ना याग्निक के मुताबिक जस्टिस गोपी बहुत तेज़तर्रार जज हैं.
उन्होंने बताया, "इसमें कोई शक नहीं है. वह एक कुशल और ईमानदार न्यायाधीश हैं. राहुल गांधी की अपील की सुनवाई से खुद को अलग करने की निजी वजहें होंगी."
जस्टिस गीता गोपी ने भी बेहद अहम मामलों में अहम फ़ैसले दिए हैं.
न्यायमूर्ति गोपी ने एक मामले में अपनी राय देते हुए कहा कि जब मुआवजे की बात आती है तो वाहन दुर्घटना के शिकार बच्चों के साथ 'नहीं कमाने वाले वयस्कों' से अलग व्यवहार किया जाना चाहिए.
उन्होंने एक मामले में कहा कि गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के तहत पंजीकृत अपराध में पार्टियों के बीच समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता.
जस्टिस गोपी ने अपने एक फ़ैसले में यह भी कहा कि ज़मानत अर्जी पर फ़ैसला करते हुए कोर्ट को ट्रायल पूरा होने में देरी के पहलू पर भी विचार करना चाहिए.
न्यायमूर्ति गोपी ने एक अन्य मामले में कहा कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) को एक दावेदार को अपने 'अत्यावश्यक जीवन व्यय' को पूरा करने के लिए समय सीमा से पहले सावधि जमा के साथ मुआवजा मिलना चाहिए.
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अब कौन कर रहे हैं मामले की सुनवाई
जस्टिस गीता गोपी द्वारा मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने के बाद अब इस मामले की सुनवाई जस्टिस हेमंत प्रच्छक की अदालत में हो रही है.
गुजरात उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पोस्ट किए गए न्यायमूर्ति हेमंत प्रच्छक के प्रोफ़ाइल के अनुसार, 1965 में पोरबंदर में पैदा हुए न्यायमूर्ति हेमंत प्रच्छक ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सोमनाथ में और माध्यमिक शिक्षा वेरावल-प्रभास पाटन में प्राप्त की.
पोरबंदर के कालिदास हरिदास माधवानी कॉलेज से 1988 में वाणिज्य में स्नातक करने के बाद, उन्होंने 1992 में खोटियावाला म्युनिसिपल लॉ कॉलेज से क़ानून में स्नातक किया.
इसी साल से उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की. इस दौरान उन्होंने सिविल, क्रिमिनल और मोटर एक्सीडेंट क्लेम से जुड़े मामलों को हैंडल किया.
इसके अलावा 2002 से 2007 तक उन्होंने सहायक लोक अभियोजक और अपर लोक अभियोजक के रूप में कार्य किया.
2015 से 2019 तक उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के लिए एक स्थायी वकील के रूप में भी काम किया है.
2021 में उन्हें गुजरात उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था.
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