सचिन पायलट की बग़ावत से नुक़सान किसका, कांग्रेस का या ख़ुद पायलट का?

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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
"मैं 11 अप्रैल को शहीद स्मारक पर एक दिन के अनशन पर बैठूंगा. वसुंधरा राजे की सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की मांग को लेकर अनशन पर बैठूंगा."
राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ सवाल खड़े करते हुए एक दिन के अनशन का एलान किया.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सचिन पायलट ने कहा, "दिसंबर 2013 में हम चुनाव हार गए थे. तब मुझे सोनिया गांधी ने पार्टी की ज़िम्मेदारी दी. वसुंधरा राजे की सरकार की ग़लत नीतियों का हमने विरोध किया. ख़ास तौर पर हमने भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाया, जिसका परिणाम हुआ कि उनकी सरकार चली गई."
पायलट ने कहा, "हम विपक्ष में थे, उस समय हमने कहा था कि हम बीजेपी सरकार के भ्रष्टाचार की जांच करेंगे. मैंने 28 मार्च, 2022 को सीएम अशोक गहलोत को पहली चिठ्ठी लिखी थी. लेकिन, उसका कोई जवाब नहीं आया. दो नवंबर, 2022 को दूसरा पत्र लिखा. लेकिन, उसका जवाब भी हमें नहीं मिला."
उन्होंने कहा, "अगर वसुंधरा सरकार के भ्रष्टाचार की जांच नहीं हुई, तो हमारे कई विरोधी यह भ्रम फैलाएंगे कि हमारी इनसे मिलीभगत है."
"इसलिए, हम चाहते हैं कि वसुंधरा सरकार के भ्रष्टाचार की जांच होनी चाहिए. चुनाव में अब सात महीने से भी कम का समय बचा है. ऐसे में जनता को नहीं लगना चाहिए कि हमारी कथनी और करनी में अंतर है. हमने जनता से वादा किया था कि जब हमारी सरकार आएगी तो हम इनके भ्रष्ट्राचार की जांच करवाएंगे."
पायलट ने कहा, "मैं 11 अप्रैल को शहीद स्मारक पर एक दिन के अनशन पर बैठूंगा. वसुंधरा राजे की सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की मांग को लेकर अनशन पर बैठूंगा."

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प्रभारी महासचिव ने कहा- पार्टी विरोधी गतिविधि
सचिन पायलट की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है.
लेकिन कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी महासचिव सुखजिंदर सिंह रंधावा ने सचिन पायलट के अनशन को 'पार्टी हितों के ख़िलाफ़' बताते हुए इसे 'पार्टी विरोधी गतिविधि' करार दिया है.
उन्होंने एक बयान जारी कर कहा, ''श्री सचिन पायलट का दिन भर का अनशन पार्टी के हितों के ख़िलाफ़ है और पार्टी विरोधी गतिविधि है. अगर अपनी ही सरकार के साथ उनकी कोई समस्या है, तो मीडिया और जनता के बजाय पार्टी के प्लेटफॉर्म पर चर्चा की जा सकती है.''
उन्होंने दावा किया, ''मैं पिछले पाँच महीनों से एआईसीसी (कांग्रेस) प्रभारी हूं, लेकिन पायलट जी ने इस मुद्दे पर कभी भी मुझसे चर्चा नहीं की. मैं उनके साथ संपर्क में हूं और अब भी उनसे शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत की अपील करता हूं. वह निर्विवाद रूप से कांग्रेस पार्टी के एक मज़बूत स्तंभ हैं.''
रंधावा ने पायलट की प्रेस कॉन्फ्रेंस को अनुचित बताया था.
उन्होंने कहा था, "हमारी उनसे कई मुद्दों पर बात हुई है, लेकिन उन्होंने कभी ये मुद्दा नहीं उठाया. अब सीधे प्रेस के सामने जाकर कह रहे हैं कि हम भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ क़दम नहीं उठा रहे हैं. हमने गजेंद्र सिंह शेखावत के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. उन्होंने मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मानहानि का मामला भी दर्ज किया है."
सुखजिंदर सिंह रंधावा 11 अप्रैल को जयपुर आ सकते हैं. अपने इस दौरे में वह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट से बातचीत करेंगे.

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किसके समर्थन में कितने विधायक
2019 में बसपा के सभी 6 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे. वहीं रालोद ने भी कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था. वहीं 2021 में हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसके बाद वर्तमान में कांग्रेस 108 विधायक हैं.
लेकिन, कांग्रेस की अंदरूनी कलह जब भी उजागर होती है तब सवाल यही उठता है कि किसके साथ कितने विधायक हैं.
सचिन पायलट की बग़ावत के दौरान उनके साथ 22 विधायक मानेसर पहुंचे थे. हालांकि, तीन वापस विधायक लौट आए थे. यानी उस दौरान 19 विधायक पायलट के समर्थन में थे. इस दौरान सरकार बचाने के लिए अशोक गहलोत की बाड़ाबंदी में 80 विधायक थे. जो 34 दिन तक होटल में रहे.
25 सितंबर को आलाकमान के भेजे गए पर्यवेक्षक ने विधायक दल की बैठक बुलाई थी. माना जा रहा है कि उस बैठक में सचिन पायलट के नाम पर मुहर लगनी तय थी.
हालांकि, अशोक गहलोत समर्थक विधायकों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया. उस दौरान 92 विधायकों ने अशोक गहलोत के समर्थन में अपने इस्तीफ़े सौंपे थे.
उस दौरान अशोक गहलोत समर्थक कई विधायकों ने आलाकमान के फ़ैसले के साथ खड़े होने की बात कही थी. दिव्या मदेरणा, राजेंद्र गुढ़ा समेत कई विधायकों ने सचिन पायलट के समर्थन में बयान दिए थे.
सचिन पायलट सीएलपी की बैठक बुलाना चाहते हैं. माना जा रहा है कि इस समय सचिन पायलट के साथ कांग्रेस के क़रीब आधे विधायक हैं.
चुनाव से ठीक पहले अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े करने और गुटबाजी ने कांग्रेस कार्यकर्ता से लेकर दिल्ली तक चिंताएं बढ़ा दी हैं.
धौलपुर ज़िला कांग्रेस कमिटी के सचिव राजवीर मीणा बीबीसी से कहते हैं, "इस गुटबाजी से कांग्रेस को नुक़सान होगा. कांग्रेस न तो गहलोत की है और न ही पायलट की है."
वह कहते हैं, "जनता भी जानती है कि गहलोत सरकार ने अच्छे काम किए हैं. लेकिन, हर आदमी चाहता है सत्ता में मैं रहूं. यदि इसका समाधान नहीं किया गया तो आगामी 2023 विधानसभा चुनाव में हमें नुक़सान होगा."
"कांग्रेस की कमज़ोरी की जड़ संगठन है. साल 2018 में सरकार बनाने के बाद सत्ता के लोग संगठन पर हावी हो गए हैं. संगठन के कमज़ोर होने से ही कांग्रेस कमज़ोर हो रही है."

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कांग्रेस इस विवाद को सुलझा क्यों नहीं पा रही?
राजस्थान कांग्रेस में दिसंबर 2018 से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का विवाद लगातार चर्चाओं में रहा है. राज्य विधानसभा चुनाव से ठीक 7 महीने पहले एक बार फिर पायलट ने राज्य की सियासत गरमा दी है.
कांग्रेस आलाकमान ने भी कई बार मामले को सुलझाने की कोशिश की है लेकिन अभी तक उनके प्रयास भी सफल नहीं हुए हैं.
राज्य विधानसभा चुनाव में सात महीने का समय बचा है. एसे में अपनी ही सरकार पर पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करने के गंभीर आरोप लगाए हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, "इसमें कोई भी पक्ष सुनने के लिए तैयार नहीं है. यह दिल्ली का दोष है कि इसका निपटारा नहीं कर पाए हैं."
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया मानते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व इस विवाद को सुलझाना तो चाहते हैं, लेकिन उनके पास विकल्प नहीं हैं. मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है और बैठने वाले दो हैं.
वह कहते हैं, "सितंबर में विधायक दल की बैठक के बहिष्कार मामले ने यह दिखा भी दिया था. यह हटते हैं तो बात सरकार गिरने तक आ सकती है. अब मानने से तो नहीं रहे दोनों, तो आलाकमान के पास कोई फ़ॉर्मूला नहीं है.
आकोदिया के अनुसार, "चुनावों तक यही सब चलेगा. इसी तरह विवाद रहेगा."

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इस विवाद से बीजेपी को क्या फ़ायदा होगा?
बीजेपी को उम्मीद है कि गहलोत-पायलट विवाद के चलते आगामी चुनावों में उन्हें लाभ मिलेगा. अवधेश आकोदिया भी मानते हैं कि इस विवाद से सीधे तौर पर बीजेपी को ही लाभ मिलेगा.
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ की राय थोड़ी अलग है.
वह कहते हैं, "बीजेपी को थोड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ मिल सकता है. एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इस लड़ाई से सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर नहीं बन पाई है."
"आम लोगों को लगा है कि सरकार जो काम कर रही है, कुछ लोग इसमें बाधा उत्पन्न कर रहे हैं. सत्ता विरोधी स्वर इस बार प्रबल नहीं हो पाया है."
वह कहते हैं, "साल 1998 से कांग्रेस सत्ता में रहते आई है. इतना अनूकूल वातावरण कभी नहीं रहा जैसा अभी है. चुनाव से पहले सत्ता विरोधी लहर होती थी, उसकी कई वजहें होती थीं. कई बार राज्य और कई बार केंद्रीय कारण बनते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है."

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वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत
बीजेपी की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत पर एक दूसरे की सरकार के दौरान आपसी सांठ-गांठ के आरोप लगते रहे हैं. बीते दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जयपुर में भी दोनों नेताओं की मिलिभगत के आरोप लगाए थे.
सचिन पायलट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी ही सरकार पर पिछली वसुंधरा राजे सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच नहीं करने के आरोप लगाए हैं.
वसुंधरा राजे सरकार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों पर बीजेपी विधायक और प्रवक्ता रामलाल शर्मा कहते हैं, "कांग्रेस सरकार पहले अपने विधायकों और मंत्रियों की जांच करवाए. सरकार के ही विधायक अपने ही मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं."
नारायण बारेठ कहते हैं, "राजस्थान बिहार, यूपी या दक्षिण भारत के राज्यों से भिन्न है. यहां पक्ष-विपक्ष के रिश्ते इतने तल्ख़ी के नहीं रहे हैं कि एक दूसरे को जेल में डालने की बातें की जाए."
"राजस्थान में मोहन लाल सुखाड़िया लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे, उनके साथ भैरोंसिंह शेखावत थे, उनके बीच ऐसे रिश्ते नहीं थे. उनके बाद हरिदेव जोशी और भैरोसिंह शेखावत थे, उनके बीच इतनी कटुता नहीं थी."
"इनके बाद भैरोंसिंह शेखावत बनाम दूसरे नेता थे, जिनमें अशोक गहलोत भी शामिल हैं. लेकिन इतनी तल्ख़ी नहीं थी.
नारायण बारेठ मानते हैं कि हाल के एक दशक में आपसी कटुता ज़बरदस्त आई है. अब विरोधी को शत्रु माने जाने लगा है. यह उसी का परिणाम है."
अवधेश आकादिया भी यह मानते हैं कि यह सांठगांठ से ज़्यादा राजस्थान के पॉलिटिकल कल्चर का मामला है.

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पायलट ने कई बार उठाए हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है कि सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. राज्य में कांग्रेस की सत्ता आने के बाद से कई मौक़े पर उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लिया है.
साल 2019 में कोटा के सरकारी जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत हुई, तब सचिन पायलट वहां पहुंचे थे. उन्होंने सरकार को घेरने का प्रयास किया था.
इसी तरह जालौर में हुई कथित रूप से एक दलित बच्चे की मृत्यु के मामले में वह जालौर पहुंचे थे जबकि कई नेताओं ने कहा था कि वह घटना ग़लत तरह से पेश की गई थी.
हाल ही में बीजेपी से राज्यसभा सांसद डॉ किरोड़ी लाल मीणा के नेतृत्व में शहीदों की विधवाओं के धरने मामले में भी सचिन पायलट अपनी ही अशोक गहलोत सरकार के ख़िलाफ़ मुखर थे.
राज्य में हुए पेपर लीक मामले में भी सचिन पायलट ने अपनी सभाओं में सरकार को घेरा था.
इसके बाद बीते दिनों राइट टू हेल्थ बिल को लेकर डॉक्टर्स के विरोध और हड़ताल के दौरान सचिन पायलट डॉक्टर्स से मिले थे. इस मामले पर भी वह मुखर थे.
नारायण बारेठ कहते हैं, "समय के साथ-साथ यह आपसी कटुता की गांठ और गहरी होती चली गई है. यह उसी का परिणाम है कि दोनों इतना आगे जा चुके हैं. कह नहीं सकते कि कब वापस उसी मोड़ पर पहुंचेंगे, जहां से शुरू हुए थे."

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ख़ुद के राजनीतिक वजूद की लड़ाई
बीते चुनावों में राज्य में कांग्रेस के सत्ता में आते ही सचिन पायलट ख़ुद को मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहे थे. हालांकि, उनको मौक़ा नहीं मिला और अशोक गहलोत आगे निकल गए.
बेहद खींचतान के बाद सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया गया.
पायलट को लगा था कि उनको बाद में मौक़ा मिलेगा. लेकिन, जब मौक़ा नहीं मिलता दिखा तो वह बग़ावत कर अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर चले गए. लेकिन उनके पास विधायकों की इतनी संख्या नहीं थी कि वो अशोक गहलोत की सरकार गिरा पाते.
इस बग़ावत के बाद से उनके पास उपमुख्यमंत्री का पद था वो भी चला गया.
विवाद बढ़ा तो पायलट ने दिल्ली में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाक़ात की. पायलट की मांगों पर विचार के लिए एक कमिटी बनाई गई थी. इस दौरान राज्य प्रभारी अजय माकन को हटाकर उनकी जगह सुखजिंदर सिंह रंधावा को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया.
लेकिन ना ही उस कमिटी ने कुछ किया और ना ही नए प्रभारी गहलोत-पायलट विवाद को सुलझाने में सफल हो सके हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, "सचिन पायलट ऐसी स्थिति पैदा करेंगे कि जिसमें वो अपने आप को दोषी न पाएं. वो इस तरह से ख़ुद को पेश करेंगे कि मैंने तो सार्वजनिक मुद्दे उठाए थे, जो जनता से जुड़े थे. लेकिन कांग्रेस में मेरी सुनी नहीं गई."
नारायण बारेठ कहते हैं, ऐसा लगता है कि इस बार सचिन पायलट शायद रास्ता चुन कर निकले हैं. उनको लगता है कि अब नफ़ा हो या नुक़सान. लेकिन शायद अब वो पीछे मुड़कर न देखें."
पत्रकार अवधेश आकोदिया कहते हैं, "बीते विधायक दल की बैठक में माना जा रहा था कि अशोक गहलोत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे और राज्य की कमान सचिन पायलट के हाथ आएगी. हालांकि, ऐसा हुआ नहीं."
"अब सचिन पायलट को लग रहा है कि चुनावों के बीच उनको मौक़ा मिल सकता है. जैसे अशोक गहलोत समर्थक विधायकों ने विधायक दल की बैठक में बग़ावत करके मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा ली थी. ठीक उसी तरह अब पायलट भी आलाकमान पर दबाव बना सकते हैं कि उनके बारे में फ़ैसला लें. लेकिन, फ़ैसला ले पाना मुश्किल है."
अनशन से क्या संदेश देना चाहते हैं पायलट?
सचिन पायलट 11 अप्रेल को जयपुर के शहीद स्मारक पर एक दिन का अनशन करेंगे.
अवधेश आकोदिया मानते हैं कि इसके ज़रिए पायलट अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखना चाहते हैं. चुनाव नज़दीक हैं और वह चाहते हैं कि उन्हें पीसीसी अध्यक्ष का पद वापस मिल जाए.
आकोदिया कहते हैं, "अनशन से वह अपने समर्थक विधायकों को दूर रखेंगे क्य़ोंकि, विधायकों के पहुंचने से फिर संख्या पर बात होगी. लेकिन, पायलट अब ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहते हैं."
आकोदिया के अनुसार, "वो चर्चाओं में बने रहना चाहते हैं और कांग्रेस आलाकमान के सामने इस तरह से अपनी स्थिति रखना चाहते हैं कि उनको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सके."
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