अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट: सोनिया, राहुल से कहां चूक हुई?

अशोक गहलोत, राहुल गांधी, सचिन पायलट (2019 की तस्वीर)

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कांग्रेस को ध्यान अभी नए अध्यक्ष के चुनाव पर देना था, मगर उससे पहले पार्टी दूसरी ही उलझन में फँस गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस आलाकमान ने तैयारी नहीं की? क्या राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की योजना बनाए बिना अशोक गहलोत को अध्यक्ष पद की चुनावी रेस में उतारने का फ़ैसला लिया गया?

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राजस्थान के सियासी तूफान में कांग्रेस बुरी तरह फंसी दिख रही है. कांग्रेस आलाकमान की चुनाव से पहले राजस्थान में सीएम बदलने की कोशिश अधर में लटक गई है.

ऐसी अटकलें हैं कि कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहता है. लेकिन गहलोत गुट के 90 से ज्यादा विधायकों ने सचिन पायलट को सीएम बनाने की कोशिश के खिलाफ विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी को सामूहिक त्यागपत्र सौंप दिया.

वहीं इस्तीफा देने वाले विधायक सचिन पायलट को मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं देखना चाहते. उनका कहना है कि सचिन पायलट या उनके गुट के किसी नेता को वो मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं देखना चाहते.

कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान का सीएम तय करने के लिए सोनिया गांधी को अधिकृत करवाने की पेशकश के साथ दिल्ली से अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे को जयपुर भेजा, मगर वो वहाँ विधायक दल की बैठक भी नहीं करवा सके.

विधायकों को मनाने में नाकाम रहे माकन और खड़गे दिल्ली लौट आए और सोनिया गांधी के साथ चर्चा की, जिन्होंने उनसे लिखित रिपोर्ट देने के लिए कहा है. लेकिन कहा जा रहा है कि गहलोत प्रकरण से कांग्रेस आलाकमान की काफी किरकिरी हो रही है.

पायलट और गहलोत

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पुरानी अदावत

माना जा रहा था कि कांग्रेस के उदयपुर अधिवेशन में पार्टी में 'एक व्यक्ति एक पद' के प्रस्ताव को लागू करवाते हुए अशोक गहलोत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाएगा और मुख्यमंत्री की कुर्सी सचिन पायलट को दे दी जाएगी. लेकिन गहलोत समर्थक विधायकों के तेवरों से फिलहाल ये बदलाव आसान नहीं लगता.

दरअसल राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर रस्साकशी पहले भी होती रही है. अशोक गहलोत पायलट को किसी भी कीमत पर अपनी कुर्सी पर काबिज़ होते नहीं देखना चाहते.

साल 2020 में सचिन पायलट ने सीएम बनाने की मांग पर जोर देने के लिए अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा में डेरा डाल दिया था. तब राहुल और प्रियंका गांधी ने उनकी कई शर्तें मान कर उनकी पार्टी में वापसी कराई थी.

अब गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की ख़बरों के बीच एक बार फिर राजस्थान की सत्ता पायलट के हाथों में जाने की चर्चा छिड़ गई है, और कांग्रेस एक बार फिर असमंजस की स्थिति में आ गई है.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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बड़ा सवाल ये है क्या कांग्रेस आलाकमान इस हालात को भांप नहीं पाया? क्या उसके पास अनुभव की कमी थी या फिर उसने होमवर्क ठीक से नहीं किया था?

वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहते हैं,'' कांग्रेस आलाकमान कई मामलों में नौसिखिया साबित होता रहा है. पार्टी में इस वक्त अहमद पटेल जैसा कोई शख्स नहीं है. पॉलिटिकल क्राइसिस मैनेजर नहीं है. पार्टी को ऐसा शख्स चाहिए, जिसकी समझ भी हो और धमक भी हो.''

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी भी कांग्रेस नेतृत्व की अनुभवहीनता की ओर इशारा करती हैं. वो कहती हैं, ''कांग्रेस में जो हालात 20 साल पहले थे वो अब नहीं हैं. कांग्रेस को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो अनुभवी हो, ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी रखता हो, कार्यकर्ताओं में जीतने का विश्वास जगा सके और सबसे बड़ी बात जब कोई उनकी नरेंद्र मोदी से तुलना करे तो उसे ख़ारिज न कर दे.''

चूक कहां हुई?

संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, '' शीर्ष नेतृत्व को गहलोत और पायलट के बीच के टकराव का पता होगा ही. ऐसे में उसने अपना होमवर्क क्यों नहीं किया? आखिर उसने ये स्थिति क्यों आने दी? उन्हें पहले दोनों को दिल्ली बुलाना चाहिए था. दोनों ओर के विधायकों से बात करनी चाहिए थी. लेकिन यहां आप खड़गे और माकन को जयपुर भेज रहे हैं. जैसे एक ज़माने में इंदिरा गांधी माखनलाल फोतेदार को भेजती थीं. कांग्रेस को समझना चाहिए वो दिन चले गए जब उसके पास ज़बरदस्त बहुमत हुआ करता था. आज तो इस पार्टी के पास 53 सांसद बच गए हैं. ''

वो साथ ही गहलोत समर्थक विधायकों के विरोधी तेवर पर कहते हैं,''अशोक गहलोत और उनके समर्थक विधायकों ने जो कुछ किया वो ग़लत तो था लेकिन कांग्रेस नेतृत्व में भी बचकानापन दिखा. आलाकमान समझ रहा था कि गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बना देंगे और पायलट को सीएम और सब चुप हो जाएंगे. लेकिन ये सोच गलत थी. राजनीति में दो और दो चार नहीं होते. ''

गहलोत बनाम पायलट का मामला अनसुलझा क्यों?

अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच राजस्थान में पुरानी प्रतिद्वंद्विता रही है. आखिर पार्टी ने इसे सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं की. अगर मामला सुलझ जाता तो आज ऐसी स्थिति नहीं आती.

इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर कहते हैं, ''2018 का चुनाव सचिन पायलट की अगुआई में लड़ा गया. वो प्रदेश पार्टी अध्यक्ष थे. पायलट ने पूरे राज्य का चुनावी दौरा किया. वह राज्य के कोने-कोने में गए. लेकिन मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत. तो दोनों के बीच विवाद कभी सुलझा ही नहीं, या सुलझाने की कोशिश नहीं हुई. ''

अय्यर फिलहाल कांग्रेस के कमज़ोर आलाकमान की ओर इशारा करते हैं.

वो कहते हैं, '' कांग्रेस आलाकमान जिस शख्स के बारे में यह समझता है कि वह पार्टी का अध्यक्ष बनने लायक है वही शीर्ष नेतृत्व की बात नहीं सुन रहा है. कांग्रेस के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी? इससे पार्टी में सोनिया गांधी के वर्चस्व पर भी सवाल पैदा होता है. ''

अय्यर आगे कहते हैं, ''गहलोत ने तो अजय माकन और खड़गे को कांग्रेस विधायकों से एक-एक कर मिलने भी नहीं दिया. उन्हें कहा गया कि विधायक समूह में मिलेंगे. माकन ने भले ही इसे अनुशासनहीनता करार दिया हो. लेकिन इससे ये साबित हो गया कि फिलहाल आलाकमान की क्या स्थिति है.''

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