अशोक गहलोत के समर्थन में उतरे विधायक, अब सचिन पायलट का क्या होगा

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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, जयपुर से
राजस्थान में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति उस एक म्यान की तरह हो गई है, जहां दो तलवारों का साथ रहना मुश्किल नज़र आ रहा है.
साल 2020 के बाद अब फिर एक बार कांग्रेस की गुटबाज़ी ने जयपुर से दिल्ली तक की राजनीति को गरमा दिया है.
राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के लिए नए चेहरे का चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा सियासी संकट बन गया है.
अशोक गहलोत समर्थक विधायक खुलकर सचिन पायलट के विरोध में उतर आए हैं.
ऐसे में सीएम पद की राह अब सचिन पायलट के लिए आसान नज़र नहीं आ रही.
राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थन में विधायकों ने सामूहिक इस्तीफे की पेशकश कर कांग्रेस आलाकमान पर भी दबाव बनाने का प्रयास किया है.
नए सीएम का नाम तय करने को लेकर रखी गई फीडबैक बैठक का भी गहलोत समर्थक विधायकों ने बहिष्कार कर स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है.
इस राजनीतिक घमासान के बीच सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायक फिलहाल ख़ामोश नज़र आ रहे हैं.
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क्यों है विवाद ?
कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अशोक गहलोत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की दौड़ में पहले पायदान पर हैं. हालांकि, सीएम गहलोत ने अभी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल नहीं किया है.
हाल में उनकी राहुल गांधी और सोनिया गांधी से हुई मुलाकातों की वजह से भी अशोक गहलोत का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में आगे है.

गहलोत समर्थकों की चेतावनी
"आलाकमान को यह ध्यान रखना चाहिए कि दो साल पहले बीजेपी के साथ मिलकर सरकार गिराने की साज़िश किन लोगों ने रची थी."
- डॉक्टर सुभाष गर्ग, गहलोत समर्थक राज्य मंत्री
"निर्णय विधायकों के अनुरूप होगा तो सरकार चलेगी. अगर विधायकों के अनुरूप भावना नहीं होगी तो सरकार चल सकती है क्या?"
संयम लोढ़ा, निर्दलीय विधायक

इन मुलाकातों के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने बातों बातों में कई बार कहा कि कांग्रेस में 'एक व्यक्ति और कई पद' के उदाहरण पहले भी रहे हैं.
उनके बयानों से साफ़ पता चलता है, कि वो राजस्थान का सीएम पद छोड़ने के मूड में नहीं है.
इस बीच सियासी गलियारों में अगले मुख्यमंत्री के तौर पर सचिन पायलट के नाम की चर्चा तेज़ हो गई है. पायलट को राहुल गांधी के पसंद के तौर पर भी देखा जाता है.
मगर पायलट के सीएम बन सकने की चर्चा के साथ ही उनका भारी विरोध भी हो रहा है.
गहलोत समर्थक विधायक दो साल पहले सरकार गिराने के प्रयास में बग़ावत के आरोप लगाते हुए सचिन पायलट का खुलकर विरोध कर रहे हैं.
इन विधायकों ने रविवार रात विधानसभा अध्यक्ष डॉ सीपी जोशी के आवास पहुंच इस्तीफ़े भी सौंपे.
गहलोत समर्थक राज्य मंत्री डॉ सुभाष गर्ग ने कहा, "आलाकमान को यह ध्यान रखना चाहिए कि दो साल पहले बीजेपी के साथ मिलकर सरकार गिराने की साज़िश किन लोगों ने रची थी."

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आलाकमान को संदेश
नए मुख्यमंत्री के नाम पर कांग्रेस विधायकों से चर्चा करने और विधायकों की नब्ज़ टटोलने के लिए दिल्ली से वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राज्य प्रभारी अजय माकन को जयपुर भेजा गया.
25 सितंबर शाम सात बजे होने वाली बैठक के समय में दो बार बदलाव किया गया, इसके बावजूद गहलोत समर्थक विधायकों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया.
बैठक से पहले सभी गहलोत समर्थक विधायक अशोक गहलोत के विश्वसनीय कैबिनेट मंत्री शांति धारीवाल के घर जुटने शुरू हुए.
यहां हुई बैठक के बाद सभी विधायक विधानसभा अध्यक्ष डॉ सीपी जोशी के सरकारी आवास पहुंचे और विधायक पद से सामूहिक इस्तीफ़े दिए.
इस दौरान मुख्यमंत्री आवास पर सीएम अशोक गहलोत, सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायक, अजय माकन, मल्लिकार्जुन खड़गे बैठक के लिए विधायकों का इंतज़ार कर रहे थे.
इस बैठक का बहिष्कार कर और इस्तीफ़े देकर विधायकों ने ये संदेश देने की कोशिश की है कि यदि पायलट को मुख्यमंत्री बनाया गया तो सरकार गिर सकती है.
गहलोत समर्थक निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने मीडिया से बातचीत में कहा, "निर्णय विधायकों के अनुरूप होगा तो सरकार चलेगी. अगर विधायकों के अनुरूप भावना नहीं होगी तो सरकार चल सकती है क्या?"

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संख्या बल में सचिन पायलट कहाँ हैं?
राज्य की राजनीति में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की गुटबाज़ी किसी से छिपी नहीं है.
अभी राज्य की कांग्रेस के अधिकतर विधायक गहलोत के समर्थन में दिख रहे हैं. जबकि, साल 2020 में सचिन पायलट के समर्थक रहे कई विधायक अब उनसे दूरी बना चुके हैं.
पिछले कुछ दिन में इस घमासान में सचिन पायलट के समर्थन में लगभग एक दर्जन विधायक ही उनके साथ दिखे. जबकि पायलट के विरोध में लगभग 80 विधायकों ने इस्तीफे सौंपे हैं.
रविवार देर रात अशोक गहलोत के समर्थन में मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने 92 विधायक साथ होने का दावा किया था. इस दावे और विधानसभा अध्यक्ष को दिए गए इस्तीफों के हिसाब से संख्या बल गहलोत के पक्ष में दिखता है.
ऐसी स्थिति में पायलट के मुख्यमंत्री बनने को लेकर संशय बना हुआ है.
साल 2020 में अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा पहुँच जाने की बग़ावत भी सचिन पायलट के लिए अब मुख्यमंत्री की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन गई है. उनके इस पुराने कदम को लेकर अब सबसे ज़्यादा विरोध हो रहा है.
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी पूरे घटनाक्रम पर कहते हैं, "राजस्थान की राजनीति में अब सचिन पायलट का सर्वाइव करना मुश्किल लग रहा है. कांग्रेस में रह कर तो अब उनके लिए सीएम बनना बिल्कुल संभव नहीं लग रहा. अब कांग्रेस से बाहर ही उनका राजनीतिक जीवन बन पाएगा."
वो आगे कहते हैं, "कांग्रेस ने सचिन पायलट को बच्चे की तरह एडॉप्ट किया था. हालांकि, पायलट कुछ ख़ास समीकरण बैठा नहीं सके. जिस तरह बीते दिन अशोक गहलोत के समर्थन में विधायकों ने आलाकमान के भेजे ऑब्ज़र्वर के सामने तीन मांगें रखी हैं, उससे कॉम्प्रोमाइज़ करने पर राज्य में कांग्रेस डगमगा जाएगी."
गहलोत समर्थक विधायकों की पहली मांग है कि विधायक दल की बैठक अब 19 अक्तूबर के बाद होगी. दूसरी मांग है कि जब तक अध्यक्ष का फैसला नहीं हो जाता, तब तक कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं होगा, और तीसरी मांग है कि सरकार बचाने में समर्थन देने वाले 102 विधायकों में से ही अगला सीएम होना चाहिए.
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दिल्ली से होगा फैसला?
राज्य में सचिन पायलट को राहुल गांधी की पसंद के तौर पर देखा जाता है.
मगर गांधी परिवार से अशोक गहलोत की नज़दीकी भी किसी से छिपी नहीं है.
इधर ये भी तय है कि बिना गांधी परिवार की रज़ामंदी के कांग्रेस का अध्यक्ष पद उन्हें नहीं मिल सकता.
राज्य में सियासी उठा-पटक के बीचे दिल्ली से भेजे गए अजय माकन और खड़गे के वापस दिल्ली आने की चर्चा है. विधायकों ने जिस तरह से दिल्ली से आए पार्टी प्रतिनिधियों से मिलने से मना कर दिया, उससे बहुत मुमकिन है कि दिल्ली में आलाकमान भी नाराज़ हो.
ऐसे में कांग्रेस के अध्यक्ष पद की रेस में अशोक गहलोत बने रहेंगे या राजस्थान के सीएम चेहरे की तलाश नए सिरे से शुरू होगी - ये देखना दिलचस्प होगा.
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