मुकुल रॉय: कभी ममता के नंबर दो थे, अब पाला बदलने का खेल क्यों खेल रहे हैं?

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
शरद पवार के भतीजे अजित पवार के बीजेपी में जाने की अफ़वाहों पर सारे सवालों के जवाब मिलने से पहले ही, ख़बर गर्म है कि ममता बनर्जी के क़रीबी मुकुल रॉय ने अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने का समय मांगा है.
बीजेपी के एक स्थानीय नेता ने अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाक़ात का वक़्त मांगे जाने की ख़बर को सही बताया है.
मुकुल रॉय दो दिन पहले कोलकोता से 'ग़ायब' हो गए थे जिसको लेकर उनके पुत्र शुभ्रांशु ने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई है. लेकिन मुकुल रॉय दूसरे दिन ही दिल्ली में नमूदार हुए और कहा कि वो अभी भी बीजेपी में हैं.
कभी ममता बनर्जी के बेहद क़रीबी समझे जाने वाले मकुल रॉय ने पश्चिम बंगाल का पिछला चुनाव बीजेपी की टिकट पर ही लड़ा और जीता था. हालांकि 2021 विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के नौ दिन बाद ही वो पुराने दल त्रिणमूल कांग्रेस में लौट गए थे.
उन्होंने साल 2017 में बीजेपी ज्वाइन कर ली थी.
बीजेपी पर आरोप
मुकुल रॉय की ताज़ा कलाबाज़ी को उनके बेटे शुभ्रांशु बीते महीने हुई सर्जरी और लोगों को पहचानने में असमर्थता का नतीजा बता रहे हैं. मगर दूसरी तरफ़ मुकुल रॉय कह रहे हैं कि वो पूरी तरह स्वस्थ्य हैं और पार्टी का काम करने को तैयार हैं.
बल्कि उन्होंने तो बेटे शुभ्रांशु और परिवार के अन्य लोगों को भी बीजेपी में शामिल होने की सलाह दी है.
इस बीच पश्चिम बंगाल पुलिस की एक टीम दिल्ली रवाना हुई है.
शुभ्रांशु ने बीजेपी पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि उनके पिता ऑपरेशन के बाद परिवार के लोगों को भी ठीक तरीक़े से पहचानने में सक्षम नहीं हैं.

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बीजेपी के नेता की मुकुल रॉय की वापसी में दिलचस्पी नहीं
कभी बंगाल की राजनीति का चाणक्य कहे जानेवाले मुकुल रॉय की राजनीति ने हाल के सालों में बड़ी तेज़ी से कई मोड़ लिए हैं. ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी का गठन करने वाले मुकुल रॉय एक समय बीजेपी में चले गए थे, फिर वापस टीएमसी आए, और अब ख़बर है कि वो बीजेपी में जाने की कोशिश कर रहे हैं
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार कहते हैं, "मुकुल रॉय के पार्टी में लौटने का फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा. लेकिन अब तक उन्होंने जो कुछ कहा है उससे साफ़ है कि तृणमूल में उनकी स्थिति ठीक नहीं है. वे भाजपा में लौट कर अपनी ग़लती सुधारना चाहते हैं."
हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं कि सही अर्थों में सूबे में पार्टी का कोई भी नेता मुकुल रॉय की वापसी नहीं चाहता है.
पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी तो साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि "मुकुल के मामले में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है."
शुभेंदु अधिकारी मुकुल के ख़िलाफ़ सबसे ज्यादा सक्रिय रहे हैं.
दूसरी तरफ़ मुकुल की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर पार्टी ने अदालत में एक याचिका दायर की है.
मुकुल के पुत्र शुभ्रांशु कहते हैं, "मेरे पिता मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं. एक बीमार व्यक्ति को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए. लेकिन अभिषेक बनर्जी को बदनाम करने के लिए ऐसा किया जा रहा है. मुख्यमंत्री ने भी मुझसे फोन पर घटना की जानकारी ली है."
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है, "मुकुल राय कभी भाजपा में रहते हैं तो कभी तृणमूल कांग्रेस में. फ़िलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा. लेकिन इस मामले में अभिषेक बनर्जी का नाम घसीटना सही नहीं है."
राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "फ़िलहाल यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि आख़िर मुकुल रॉय की मंशा क्या है. उनकी बातों पर भरोसा करें या उनके पुत्र की जो कहते हैं कि पिता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है."
मुकुल रॉय के केस को लोग फ़र्श से अर्श और फिर अर्श से फर्श तक पहुंचने की सबसे ताज़ा मिसाल के तौर पर भी पेश कर रहे हैं.

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जेल जाने से बचने के लिए थामा था बीजेपी का हाथ?
कभी 'बंगाल का चाणक्य' कहे जाने वाले मुकुल रॉय को कभी मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का सबसे क़रीबी नेता माना जाता था.
लेकिन शारदा चिटफ़ंड घोटाले में सीबीआई की पूछताछ के दौरान दिए गए बयानों और भाजपा के बड़े नेताओं से बढ़ती नज़दीकी ने उनको पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से दूर कर दिया और आख़िर वर्ष 2017 में उन्होंने अचानक एक दिन 'भगवा झंडा' थाम लिया.
उसके अगले दिन ही उनको वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा भी मिल गई.
उस समय राजनीतिक हलकों में चर्चा थी कि शारदा घोटाले में मदन मित्र और तापस पाल जैसे नेताओं की तरह गिरफ़्तारी से बचने के लिए ही उन्होंने भाजपा का दामन थामा है.
दूसरी तरफ़ राजनीतिक पर्यवेक्षक उनकी स्थिति को 'माया मिली न राम' की कहावत को चरितार्थ करनेवाला भी बताते हैं.
तृणमूल से बीजेपी में जाने पर उन्हें जहां पुराने दल की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी तो बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व ने 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद मुकुल की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए उनसे जूनियर रहे शुभेंदु अधिकारी को सदन में विपक्ष का नेता बना दिया.
उन्होंने तृणमूल कांग्रेस में वापसी की, मगर उनको कोई तवज्जो नहीं मिली. इसकी वजह यह थी कि क़रीब चार वर्षों की ग़ैर-हाज़िरी में उनकी खाली जगह ममता के भतीजे और पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी ने भर दी थी.

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कैसा रहा अब तक का सियासी सफ़र?
साल 1954 में कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले के कांचरापाड़ा में पैदा होने वाले मुकुल ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री लेने के बाद मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से एम.ए की पढ़ाई पूरी की थी.
उन्होंने अपना राजनीतिक करियर युवा कांग्रेस से शुरू किया था. तब ममता बनर्जी भी युवा कांग्रेस में थीं. उसी समय से दोनों नेताओं में नज़दीकी बढ़ने लगी थी.
जनवरी, 1998 में जब ममता ने कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था तो रॉय भी उनके साथ थे. उसके तुरंत बाद ममता ने मुकुल को दिल्ली में पार्टी का चेहरा बना दिया. उससे पहले मुकुल ने साल 2001 में जगदल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था और दूसरे स्थान पर रहे थे.
अप्रैल 2006 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और उसी साल उनको पार्टी का महासचिव भी बना दिया गया. साल 2009 से वे तीन साल के लिए राज्यसभा में पार्टी के नेता रहे. यूपीए दो की सरकार में मुकुल रॉय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग ( तब जहाज़रानी) और रेल राज्य मंत्री भी रहे.
लेकिन बंगाल के बहुचर्चित सारदा चिटफ़ंड घोटाले में नाम सामने आने के बाद तृणमूल कांग्रेस में उनकी स्थिति कमज़ोर होने लगी. उसके बाद पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के बीच उनको पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में छह साल के लिए निलंबित कर दिया गया. उसके बाद नवंबर, 2017 में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया.
बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मुकुल रॉय को पश्चिम बंगाल का संयोजक बना दिया. इसके अगले साल उनको पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया.
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में पार्टी को मिली भारी कामयाबी के पीछे भी मुकुल रॉय का ही हाथ माना जाता है. लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान या उसके बाद उनको पार्टी में खास तवज्जो नहीं मिली.
भाजपा के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "पार्टी के प्रदेश नेतृत्व से मुकुल रॉय की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं है. उनको पार्टी में कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हक़दार थे. विपक्ष के नेता के तौर पर भी उनका नाम सामने आया था. लेकिन उनकी जगह शुभेंदु अधिकारी को इस पद पर बिठा दिया गया."
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