गुजरात में एकमात्र मुस्लिम विधायक इमरान खेड़ावाला को जानिए

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- Author, भार्गव परीख
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
गुजरात में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत में एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब रहे.
गुजरात के इकलौते मुस्लिम विधायक हैं- इमरान खेड़ावाला जो अहमदाबाद की जमालपुर खड़िया सीट से लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं.
कभी इस सीट को 'भाजपा का गढ़' माना जाता था लेकिन बीते दो चुनावों से इमरान खेड़ावाला यहाँ से विधायक चुने जाते रहे हैं.
साल 2012 में परिसीमन के बाद भी 'भाजपा का गढ़' मानी जाने वाली इस विधानसभा सीट पर बीजेपी को ही जीत मिली थी, लेकिन 2017 से इस सीट पर कांग्रेस जीत रही है.
परिसीमन के बाद जमालपुर-खड़िया में मुस्लिम वोटर बढ़े लेकिन यहाँ से समीकरण बदल गए. मुस्लिम उम्मीदवार निर्दलीय खड़े हुए और बीजेपी के भूषण भट्ट जीत गए.
इस बार चतुष्कोणीय लड़ाई में भाजपा के भूषण भट्ट, कांग्रेस के इमरान खेड़ावाला और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साबिर काबलीवाला और आप के हारुन वोरा थे.
यहाँ मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए असदुद्दीन ओवैसी ने आख़िरी मिनट तक प्रचार किया.
ओवैसी ने बिलकिस बानो और गुजरात दंगे से जुड़े मुद्दे भी ज़ोर-शोर से उठाए थे.

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कोरोना के दौरान मदद का मिला फायदा
अगर आँकड़ों की बात करें तो इमरान खेड़ावाला को कुल 58,487 वोट मिले जबकि बीजेपी प्रत्याशी भूषण भट्ट 44,649 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे. इस मुक़ाबले में ओवैसी की पार्टी के साबिर काबलीवाला को 15,655 वोट मिले थे.
असदुद्दीन ओवैसी के अभियान का यहाँ कोई असर नहीं हुआ, इस ओर इशारा करते हुए कांग्रेस नेता जगत शुक्ला ने कहते हैं, "ओवैसी के आंसुओं का जमालपुर-खड़िया में असर नहीं हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में 85 प्रतिशत से ज़्यादा शिक्षित मतदाता हैं."
वैसे इस इलाक़े में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण भी बहुत ज़्यादा नहीं है. 2017 में इमरान खेड़ावाला के ख़िलाफ़ कोई निर्दलीय उम्मीदवार नहीं था, इसलिए उन्हें फ़ायदा मिला था. लेकिन इस बार चतुष्कोणीय मुक़ाबले और चार निर्दलीय उम्मीदवारों के बाद भी उन्होंने जीत हासिल की.
कहा ज रहा है कि इमरान खेड़ावाला की जीत की सबसे बड़ी वजह कोरोना संकट के दौरान लोगों की मदद करने को लेकर उनकी सक्रियता रही है. वे कोरोना संक्रमण के दौरान लोगों की मदद करते हुए ख़ुद भी संक्रमित हो गए थे और इस बात को स्थानीय लोगों ने याद रखा था.
जमालपुर के रजाक मंसूरी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में खेड़ावाला द्वारा कोरोना के दौरान किए गए कामों को याद किया.
उन्होंने कहा, "एक साल पहले हुए नगर निगम चुनाव में हमने ओवैसी की पार्टी को वोट दिया था और कांग्रेस को हराया था, हालांकि हमारे मुश्किल समय में इमरान खेड़ावाला खड़े थे. कोरोना महामारी में ही नहीं संकट की घड़ी में भी जब हमें भूख लगी तो उसने हमें रोटी के लिए आटा और आलू-प्याज दिया. इसलिए हमने इस बार उन्हें वोट देने का फ़ैसला किया."
इलाक़े के स्थानीय पत्रकार ऐफुज तिर्मिज़ी इमरान खेड़ावाला की जीत का विश्लेषण करते हुए कहते हैं, "शुरुआत में इमरान खेड़ावाला की जीत मुश्किल लग रही थी. साबिर काबलीवाला उनके पारंपरिक राजनीतिक दुश्मन थे, इमरान खेड़ावाला की तरह वे भी मुसलमान हैं."
"साथ ही आप में से एक मुस्लिम उम्मीदवार भी था, ऐसे में मुस्लिम वोट के बँटने की पूरी संभावना थी और अगर बीजेपी के हिंदू वोट एकतरफ़ा होते तो 2012 की तरह बीजेपी की जीत की भी पूरी संभावना थी."

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'टाइपिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत'
1993 में जमालपुर के सामाजिक कार्यकर्ता और बाद में विधायक बने उस्मांगनी देवड़ीवाला के लिए टाइपिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले इमरान खेड़ावाला ने उनसे राजनीति के सबक सीखे.
वे देवाड़ीवाला से इतने प्रभावित थे कि समाज सेवा के लिए इमरान ने शादी नहीं करने का फ़ैसला लिया.
इमरान खेड़ावाला के करियर को क़रीब से देखने वाले अहमदाबाद से प्रकाशित दैनिक गुजरात टुडे के संयुक्त संपादक अमलदार बुखारी ने कहा, "इमरान खेड़ावाला वहां उस्मांगनी देवड़ीवाला के लिए काम करते थे, उस्मांगनी देवड़ीवाला जमालपुर से निर्दलीय विधायक थे."
"शंकर सिंह वाघेला के बाद दिलीप पारिख के सत्ता में आने पर भी वे मंत्री बने थे. 1998 में फिर से चुनाव हुए तो देवड़ीवाला फिर से चुने गए, तब तक इमरान खेड़ावाला भी अपनी समाज सेवा के कारण लोकप्रिय हो गए थे. उन्होंने साल 2000 में देवड़ीवाला के सहयोग से निर्दलीय के रूप में नगर निगम का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की."
इमरान खेड़ावाला राजस्थान के मूल निवासी हैं और हिंदुओं में भी ख़ासे लोकप्रिय हैं.
जाने-माने पत्रकार प्रकाश रावल इमरान खेड़ावाला के राजनीतिक सफ़र के बारे में कहते हैं, "निर्दलीय चुने जाने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए, उनकी लोकप्रियता को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें म्युनिसिपल हेल्थ कमिटी और लीगल कमेटी का चेयरमैन भी बना दिया."

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अहमद पटेल ने पकड़ा हाथ
प्रकाश रावल कहते हैं, "इमरान के राजनीतिक गुरु उस्मांगनी देवड़ीवाला का अगस्त, 2003 में निधन हो गया. उन्होंने उपचुनाव में कांग्रेस से टिकट मांगा लेकिन कांग्रेस ने साबिर काबलीवाला को टिकट दिया और वे उस उपचुनाव में चुने गए, लेकिन यहीं से साबिर काबलीवाला के बीच राजनीतिक दुश्मनी शुरू हो गई."
"साल 2005 में अहमदाबाद में साबिर काबलीवाला ने ज़ोर देकर कहा कि इमरान खेड़ावाला को नगर निगम चुनाव में टिकट नहीं मिलना चाहिए पर कांग्रेस ने टिकट दिया और वे जीते."
रावल बताते हैं, "इमरान खेड़ावाला ने 2007 में फिर से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट मांगा लेकिन कांग्रेस ने साबिर काबलीवाला को चुना, टिकट मिलने के बाद साबिर भी जीत गए."
वो कहते हैं, "साबिर काबलीवाला ने बाद के नगर निगम चुनावों में एक लोकप्रिय नगरसेवक होने के बावजूद इमरान खेड़ावाला को टिकट देने से इनकार कर दिया और फिर इमरान खेड़ावाला निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत गए."
रावल के अनुसार, "2012 में अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने नए परिसीमन के बाद समीर खान पठान को टिकट दिया, उस समय साबिर काबलीवाला ने बग़ावत की और निर्दलीय चुनाव लड़ा. मुस्लिम वोट बंट गए और बीजेपी जीत गई."
"साल 2017 के चुनाव में अहमद पटेल ने इमरान खेड़ावाला की ताक़त देखी और उन्हें कड़िया जमालपुर से टिकट दिया और वह जीत गए."
हालांकि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी साबिर काबलीवाला ने उनकी मुश्किलें कम नहीं होने दीं.

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अब तक शादी नहीं की
उन्होंने ओवैसी से हाथ मिला लिया लेकिन खेड़ावाला अंत में जीतने में क़ामयाब रहे. बीबीसी गुजराती ने साबिर काबलीवाला के बारे में इन तमाम बातों पर उनकी राय जानने की कोशिश की लेकिन संपर्क नहीं हो सका.
बीबीसी गुजराती ने इमरान से मुलाक़ात की, हालांकि वे अपनी जीत के लिए समर्थकों की ओर से की गई मन्नतें पूरी करने के लिए मंदिर-दरगाह-मस्जिद जाने में व्यस्त थे.
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने अब तक शादी क्यों नहीं की, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "अब मैं बूढ़ा हो गया हूं, मैंने जनसेवा से शादी की है, अब मैं शादी नहीं करना चाहता."
गुजरात के एकमात्र मुस्लिम विधायक के रूप में अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए, वे कहते हैं, "एकमात्र मुस्लिम विधायक होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारियां बढ़ जाती हैं लेकिन मैं मुसलमानों की समस्याओं के साथ-साथ दलितों और वंचितों की समस्याओं को भी समान प्राथमिकता देता रहूंगा."
इस चुनाव में आई मुश्किलों के बारे में उन्होंने कहा, "इस चुनाव में कठिनाई तो थी, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि मुस्लिम और हिंदू मतदाताओं ने मुझे सेवा करने का एक और मौका दिया है."
वहीं चुनाव में हारे बीजेपी प्रत्याशी भूषण भट्ट अपनी हार के बारे में कहते हैं, "बीजेपी की लहर थी, इस बार बीजेपी इस सीट पर भी जीत जाती, लेकिन क्षेत्र में हमारे मतदाताओं ने कम मतदान किया, लोग वोट डालने नहीं आ सके. अन्यथा इस सीट पर भाजपा की जीत निश्चित थी."
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