गुजरात में बीजेपी की बंपर जीत के मायने क्या हैं?

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुजरात में बीजेपी ने सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं और नए रिकॉर्ड ऐसे बनाए हैं, जिन्हें तोड़ना भविष्य में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए मुश्किल होगा. गुजरात विधानसभा में विपक्ष के पास नेता प्रतिपक्ष तक का स्कोप नहीं बचा है.

बेशक गुजरात को बीजेपी के 'हिंदुत्व की लेबोरेटरी' कहा जाता है लेकिन अब वो गुजरात प्रयोगशाला से कहीं आगे बढ़ चुका है.

27 सालों से गुजरात में शासन करने के बाद भी बीजेपी को करीब 53 प्रतिशत वोट मिले हैं. हालांकि दूसरी तरफ बीजेपी को हिमाचल और दिल्ली के एमसीडी चुनाव में हार का सामना भी करना पड़ा है.

करीब डेढ़ साल बाद देश में आम चुनाव होने हैं. गुजरात में बीजेपी की बंपर जीत के बाद ऐसे कई महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनकी चर्चा अभी से शुरू हो गई है.

इन चुनाव नतीजों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर होगा? क्या 2024 में बीजेपी के रथ को विपक्ष रोक पाएगा?

क्या पीएम नरेंद्र मोदी, बीजेपी और संघ से बड़े हो गए हैं? क्या उनका कोई दूसरा विकल्प पार्टी के पास नहीं है? अगर है तो वो कौन नेता हैं? इसके साथ ही क्या अब देश में मंडल, समाजवाद की राजनीति की दिन लद गए हैं?

इन्हीं सब सवालों पर बात करेंगे लेकिन सबसे पहले नजर गुजरात और हिमाचल के नतीजों पर.

गुजरात में बीजेपी को 182 विधानसभा सीटों में से 156, कांग्रेस को 17 और आम आदमी पार्टी को 5 सीटें मिली हैं. वहीं हिमाचल में बीजेपी को 68 में से 25, कांग्रेस को 40 सीटें आई हैं.

बीजेपी समर्थक

इमेज स्रोत, ANI

हिंदुत्व की राजनीति पर मुहर?

गुजरात चुनाव प्रचार में राम मंदिर से लेकर 2002 में हुए दंगों तक का जिक्र हुआ. चुनाव में स्थानीय मुद्दों कहीं दिखाई नहीं दिए.

बीबीसी से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "गुजरात में एंटी इनकंबेंसी थी, अगर बीजेपी वहां स्थानीय मुद्दों पर जाती तो उसे नुकसान होता. बीजेपी ने सरकार के कामकाज पर वोट नहीं मांगे."

ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री करते हैं, वे कहते हैं, "गुजरात, बीजेपी और आरएसएस के लिए एक हिंदुत्व का अभिनय मॉडल है जहां स्थानीय मुद्दों पर बात नहीं होती. गांव, महिला, गरीब, बेरोजगार कहीं दिखाई नहीं दिए."

द वायर के राजनीतिक संपादक अजॉय आशीर्वाद के मुताबिक गुजरात हिंदुत्व की लेबोरेटरी रहा है. यहां बीजेपी को हिंदुत्व के नाम पर वोट मिलते रहे हैं. यहां एंटी मुस्लिम सेंटिमेंट अंदर तक घुस चुका है, जिसका जिक्र अमित शाह और नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में करते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "गुजरात की जीत से संघ परिवार के बजरंग दल, वीएचपी जैसे संगठनों को दूसरे राज्यों में प्रोत्साहन मिलेगा. इससे बहुसंख्यकवाद की राजनीति को भी बढ़ावा मिलेगा. जिस तरह से पिछले आठ सालों में अलग-अलग राज्यों में हिंदुत्व के फुट सॉलजर मुसलमानों पर अटैक कर रहे हैं..."

"उनके बड़े नेता मुसलमानों को बॉयकॉट करने के लिए कह रहे हैं, साधु संतों के भेष में लोग धर्म सभाएं कर रहे हैं, उसे बढ़ावा मिलेगा. बीजेपी 2024 का चुनाव भी इसी ध्रुवीकरण के अंदर रहकर लड़ना चाहती है."

अजॉय कहते हैं कि इससे न सिर्फ हिंदुत्व को बल मिला है बल्कि देश में मंडल की राजनीति को चोट पहुंची है. जिस समाजवाद की राजनीति ने हिंदुत्व के जगरनॉट को बहुत सालों तक रोकने का काम किया था, ये उसके लिए एक और हार है.

गुजरात बीजेपी

इमेज स्रोत, @BJP4Gujarat

कैसे मिली गुजरात में बंपर जीत ?

गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. यहां पर बीजेपी की जीत न सिर्फ बीजेपी बल्कि पीएम मोदी के लिए भी साख का सवाल थी.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि गुजरात चुनाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाता है. इसका मैसेज इंटरनेशनल है, अगर नरेंद्र मोदी गृह राज्य में हार जाते तो इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता जिससे बाहर निकलना बीजेपी के लिए बहुत मुश्किल हो जाता.

गुजरात मॉडल को इस बार चुनावी मुद्दा नहीं बनाया गया. वरिष्ठ संपादक संतोष भारती कहते हैं, "गुजरात के लोगों ने इस बार पीएम के नाते नरेंद्र मोदी के सम्मान में वोट डाला है. अपनी परेशानियों को भूलकर लोगों ने एक बार फिर बीजेपी को चुना है, क्योंकि गुजरात मॉडल जैसा शब्द 2014 के बाद से लगभग गायब है."

इस जीत के पीछे राजनीतिक संपादक अजॉय एक और वजह मानते हैं. वो है गुजरातियों के अंदर का ये भाव कि देश को दो गुजराती चला रहे हैं.

अजॉय कहते हैं, "पहले राजनीतिक तौर पर यूपी, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के मुकाबले में गुजरात को कम आंका जाता था. यहां सीटें भी कम हैं लेकिन गुजरातियों को ये भाव है कि देश को दो गुजराती चला रहे हैं. यह आकर्षित करने वाला है. नरेंद्र मोदी गुजरात के एथिक्स को बेहतर तरीके से रिप्रेंजेंट भी करते हैं, चाहे फिर वह हिंदुत्व का हो या बिजनेस का."

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, @narendramodi

2024 का आम चुनाव और विपक्ष

पीएम नरेंद्र मोदी अपने चुनावी भाषणों में कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं. गुजरात चुनाव के नतीजों ने विपक्ष की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं कि 1947 के बाद भारत के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री ने किसी भी राज्य में इतना चुनाव प्रचार, रोड शो नहीं किए जितना पीएम मोदी ने गुजरात में किया है, वहीं कांग्रेस कहीं प्रचार करती हुई दिखाई नहीं दी.

वे कहते हैं, "थाली में सजाकर कांग्रेस ने बीजेपी को गुजरात दिया है. शादी गुजरात में हो रही थी और राहुल गांधी महाराष्ट्र, केरल में डांस कर रहे थे. अगर कांग्रेस को मुख्यधारा में रहना है तो सियासत को सियासत की तरह करना होगा. छिप कर वार करने की आदत छोड़नी होगी."

चौथी दुनिया न्यूज़ वेबसाइट के वरिष्ठ संपादक संतोष भारती कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और महंगाई को एड्रेस नहीं किया तो गुजरात चुनाव के नतीजों का पॉजिटिव असर शायद 2024 में न पड़े.

बीजेपी के खिलाफ विपक्ष ने कई बार एकजुट होने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली. राजनीतिक संपादक अजॉय आशीर्वाद कहते हैं कि अभी तक कोई एक पार्टी या चेहरा सामने नहीं आया है जो पीएम मोदी को टक्कर दे सके.

वे कहते हैं, "बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ आने से बीजेपी को हार जरूर मिली है. विपक्ष को चुनाव जीतने के लिए बीजेपी के कोर वोटर को तोड़ना होगा. उन्हें हिंदुत्व से बेहतर और इमोशनल एजेंडा देना होगा. फिलहाल आम आदमी पार्टी बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को टेक ऑन करने की कोशिश कर रही है."

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, @narendramodi

'ब्रांड' बन चुके हैं नरेंद्र मोदी ?

दिल्ली में एमसीडी से लेकर गुजरात तक बीजेपी अगर किसी एक नेता के चेहरे पर दांव लगाती है तो वे हैं नरेंद्र मोदी. इसके लिए वे खुद जमीन पर उतरकर आक्रामक प्रचार भी करते हैं. जनसभाओं से लेकर कई किलोमीटर लंबे रोड शो उनके स्टाइल का हिस्सा है.

संतोष भारती कहते हैं कि पीएम मोदी ब्रांड को लगातार टीवी चैनल प्रसारित कर रहे हैं. उनके अलावा बीजेपी के पास फिलहाल विकल्प नहीं है. जब तक वो जीवित हैं वे असर डालेंगे.

वे कहते हैं, "उनका कद पार्टी और आरएसएस से बड़ा हो गया है. कोई उनके बारे में सवाल नहीं कर सकता. वे 24 घंटे के राजनीतिज्ञ हैं. वे इतनी बातें खड़ी करते हैं, जिनका खंडन विरोधियों को करना नहीं आता. आज की तारीख में वे सबसे ज्यादा रिलेवेंट नजर आते हैं."

वहीं अजॉय कहते हैं कि बीजेपी के नजरिए से पीएम मोदी उनका सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड है. वह पीएम मोदी को एक सुपर हीरो की इमेज देने की लगातार कोशिश करती रही है, जिसका फायदा उन्हें चुनावों में हो रहा है.

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, ANI

पीएम मोदी के चेहरे से क्या हैं नुकसान?

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि लोग नरेंद्र मोदी के नाम पर जीत रहे हैं, जिसके पास भी ब्रांड है वह उसका इस्तेमाल करता है. इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है और न इस पर कोई रोक है. ब्रांड उनकी ताकत है, वहीं कांग्रेस की लीडरशिप में वह ब्रांड नजर नहीं आता, गांधी परिवार का आकर्षण भी कमोवेश खत्म होता जा रहा है.

विजय त्रिवेदी ब्रांड मोदी का जिक्र करते हुए एक जरूरी सवाल भी उठाते हैं. वे कहते हैं, "कब तक नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी चलती रहेगी. इससे दूसरे लोगों की कमजोरियां ढक रही हैं. आप घर में नया कारपेट ले आएं, हर जगह उसे लगा दें और सफाई न करें, तो आखिर में आपको नुकसान होता है. वो नुकसान बीजेपी को होगा. बीजेपी को अंदर से चिंतन करने की जरूरत है कि क्योंकि वह ब्रांड मोदी के बावजूद हिमाचल और दिल्ली एमसीडी जैसा चुनाव हारी है."

चुनावों में स्थानीय मुद्दों को भूलकर पीएम मोदी के चेहरे पर वोट मांगना हर जगह सफल नहीं हो रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "हिमाचल में बीजेपी के आठ मंत्री चुनाव हारे हैं. करीब डेढ़ साल पहले सभी उपचुनावों में भी बीजेपी को हिमाचल में हार मिली थी. एमसीडी में बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई, विपक्ष ने स्थानीय मुद्दे उठाए वहीं बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगे, दो राज्यों में बीजेपी को इसका नुकसान झेलना पड़ा."

पीएम मोदी के साथ अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, ANI

आप पार्टी से बीजेपी को फायदा ?

2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की सभी सीटों पर जमानत जब्त हुई थी, लेकिन इस बार पांच सीटों के साथ पार्टी का वोट प्रतिशत 13 फीसदी पर पहुंच गया है.

वहीं कांग्रेस का वोट शेयर 41.4 से गिरकर 27 फीसदी रह गया है और बीजेपी ने अपने पुराने वोट शेयर में चार प्रतिशत की बढ़त के साथ खुद को 53 प्रतिशत पर ला खड़ा किया है.

दिल्ली के एमसीडी चुनावों में भी बीजेपी को भले सत्ता न मिली हो, सीटों का भारी नुकसान हुआ हो, बावजूद उसके वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई है.

जानकारों का मानना है कि आम आदमी पार्टी, जहां भी बढ़त हासिल कर रही है वहां कांग्रेस के वोट शेयर में सेंधमारी कर रही है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "एआईएमआईएम के बाद बीजेपी को आम आदमी पार्टी किसी टूल की तरह मिल गई है जिसका इस्तेमाल बीजेपी चुनावों में कर रही है. एसटी और ग्रामीण वोटर, बीजेपी की दुखती रग थी. उन दोनों जगह गुजरात में जाकर आप ने कांग्रेस के वोट शेयर को काटने का काम किया है, जिससे बीजेपी का उभर पाना मुश्किल है. वहीं बीजेपी का वोटर अपनी जगह पर खड़ा है"

हेमंत अत्री समझाते हैं कि कैसे गुजरात में बीजेपी ने पहले ही साफ कर दिया था कि इस बार लड़ाई कांग्रेस से नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी से है. आखिर में पीएम मोदी ने चुनावी सभाओं में कांग्रेस का भी जिक्र किया, क्योंकि बीजेपी चाहती है कि उसे न मिलने वाला वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में बंट जाए.

नरेंद्र मोदी के साथ योगी आदित्यनाथ

इमेज स्रोत, ANI

पीएम मोदी के बाद कौन?

बीजेपी में नंबर दो को लेकर इन दिनों चर्चा गर्म है. दो नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में बात हो रही है. इसमें पहला नाम है केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का और दूसरा नाम है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का.

बीजेपी के पीछे आरएसएस जैसा संगठन मजबूती से खड़ा है. जानकारों का मानना है कि संघ, मोदी के बाद सेकंड लाइन लीडरशिप को तैयार करने में लगा हुआ है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं कि बीजेपी के अंदर सेकंड जेनरेशन की लड़ाई शुरू हो गई है और ऐसे में योगी आदित्यनाथ को समझ आ गय है कि वे इस लड़ाई में मजबूती से दिखाई दे रहे हैं.

हेमंत अत्री समझाते हैं, "साल 2004 में वाजपेयी के बाद आडवाणी एक नेचुरल उत्तराधिकारी थे, लेकिन वो वोट कैचर नहीं थे. संघ को इस गलती की वजह से नुकसान हुआ और बीजेपी को दस सालों तक सत्ता से बाहर रहना पड़ा, अब पीएम मोदी के बाद कौन होगा इसे लेकर संघ योगी आदित्यनाथ का कार्ड खेल रहा है और आप देखिए कि वे हर जगह जमकर चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं. संघ अब लीडरशिप के मामले में वैक्यूम पैदा नहीं करना चाहता है."

हालांकि 2024 के आम चुनावों में अभी करीब डेढ़ साल का समय है उससे पहले भी कई राज्यों में चुनाव है. गुजरात की जीत का असर कहां तक दिखाई देगा ये समय ही बताएगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)