सना इरशाद मट्टू: 'मैं एक पत्रकार हूं और आप इसके लिए मुझे सज़ा नहीं दे सकते'

सना इरशाद मट्टू

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"मैं एक पेशेवर पत्रकार हूं, मैं सच रिपोर्ट करती आ रही हूं और आप मुझे इसके लिए सज़ा नहीं दे सकते."

ये बयान है पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता और कश्मीरी फ़ोटो जर्नलिस्ट सना इरशाद मट्टू का जिनका कहना है कि उन्हें एक बार फिर से विदेश जाने से रोका गया है.

सिलसिलेवार किए गए ट्वीट्स में सना इरशाद मट्टू ने दावा किया है कि सोमवार को वो अपना पुलित्ज़र पुरस्कार लेने न्यूयॉर्क जा रही थीं, लेकिन उन्हें दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने रोक दिया.

मट्टू ने कहा कि अमेरिका का वैध वीज़ा और टिकट होने के बावजूद उन्हें अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने से रोका गया है.

सना इरशाद मट्टू के अनुसार, "ये दूसरी बार है जब बिना किसी कारण मुझे सफर करने से रोका गया. कुछ महीने पहले जो हुआ, उस बारे में कई अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद मुझे कोई जवाब नहीं मिला. इस पुरस्कार समारोह में शामिल होना मेरे जीवन का सबसे बड़ा पल होता."

हालांकि भारत सरकार ने सना के दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन जम्मू और कश्मीर पुलिस के अधिकारियों ने समाचार एजेंसी पीटीआई को सना के मामले में बताया है कि उनका नाम नो-फ़्लाई लिस्ट में है, इस वजह से उन्हें यात्रा करने से रोका गया है.

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इसी साल मई के महीने में भारत में कोरोना संक्रमण के दौरान फ़ोटोग्राफी के लिए सना इरशाद मट्टू को फ़ीचर फ़ोटोग्राफ़ी श्रेणी में पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया था.

ये फ़ोटोग्राफ़ी उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए की थी.

28 वर्षीय सना इरशाद मट्टू श्रीनगर की रहने वाली हैं.

उन्होंने दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में जाकर फ़ोटोग्राफी की थी.

सना इरशाद साल 2018 से ही जम्मू-कश्मीर में इंडिपेंडेंट फ़ोटोग्राफ़ी कर रही हैं.

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सना ने बीबीसी से क्या क्या कहा

सना इरशाद मट्टू ने बीबीसी से कहा, "मुझे कोई वजह नहीं बताई गई कि क्यों मुझे रोका जा रहा है. मुझसे ये कहा गया कि मैं विदेश यात्रा नहीं कर सकती हूं."

सम्मान पाने से महरूम रह जाने पर अफ़सोस जताते हुए उन्होंने कहा, "वो पुलित्ज़र सम्मान था. ये हरेक पत्रकार का सपना होता है. जब आप को इस सम्मान के लिए चुना जाता है तो आप इससे जुड़े हरेक लम्हे को जीना चाहते हैं. लेकिन उन्होंने अब मुझसे ये ख़ुशी छीन ली है."

"बिना कोई वजह बताए, बिना ये कहे कि वे मुझे विदेश जाने से क्यों रोक रहे हैं... ईमानदारी से कहूं तो मेरा दिल टूट गया है..."

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सना को पहली बार कब रोका गया था?

सना को पहली बार विदेश जाने से इसी साल जुलाई में रोका गया था. तब वे एक बुक लॉन्च और फ़ोटोग्राफ़ी प्रदर्शनी के लिए दिल्ली से पेरिस जाने वाली थीं.

तब भी उन्होंने कहा था कि उनके पास फ़्रांस का वीज़ा है, लेकिन इसके बावजूद अधिकारियों ने उन्हें विदेश यात्रा नहीं करने दी.

सना ने उस वक़्त ट्विटर पर लिखा था, "मैं दिल्ली से पेरिस एक बुक लॉन्च और फ़ोटो एग्ज़ीबिशन के लिए जा रही थी. सेरेन्डिपिटी आर्ल्स ग्रांट 2020 के 10 पुरस्कार विजेताओं में से एक होने की वजह से मुझे जाना था."

"फ़्रांस का वीज़ा मिलने के बावजूद मुझे दिल्ली हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन डेस्क पर रोक दिया गया. मुझे इसके लिए कोई कारण नहीं बताया गया, बस इतना कहा कि आप अंतरराष्ट्रीय यात्रा नहीं कर सकती हैं."

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जम्मू और कश्मीर में पत्रकारों की स्थिति

अगस्त, 2019 में जम्मू और कश्मीर का स्पेशल स्टेटस जब से ख़त्म किया गया है, तब से वहां काम कर रहे पत्रकारों पर दबाव बढ़ गया है.

जम्मू और कश्मीर में इस समय तीन कश्मीरी पत्रकार जेल में हैं. उन्हें पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट जैसे कड़े क़ानूनों के तहत गिरफ़्तार किया गया है.

जम्मू और कश्मीर पुलिस के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि इन पत्रकारों के ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया है. इसका मतलब ये हुआ कि इनके नाम भी नो-फ़्लाई लिस्ट में शामिल हैं.

साल 2019 के बाद से कम से कम चार कश्मीरी पत्रकारों को विदेश जाने से रोका गया है.

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25 वर्षीय फ़्रीलांस जर्नलिस्ट आकाश हसन को इसी साल जुलाई में श्रीलंका जाने से रोका गया था. आकाश ने बताया कि वे श्रीलंका के आर्थिक संकट पर रिपोर्टिंग के लिए कोलंबो जा रहे थे.

आकाश ने तब ट्विटर पर लिखा था, "बिना चाय और पानी दिए पांच घंटों तक इंतज़ार कराने के बाद मुझे मेरा पासपोर्ट और बोर्डिंग पास लौटा दिया गया जिस पर लाल रंग की रिजेक्शन स्टैंप लगी हुई थी."

आकाश ने बीबीसी को बताया, "घंटों इंतज़ार कराने के बाद मुझसे कहा गया कि मुझे यात्रा करने की इज़ाजत नहीं है."

"मुझे कोई ख़ास वजह नहीं बताई गई थी, लेकिन एयरलाइन कंपनी के स्टाफ़ ने बताया कि मेरे ख़िलाफ़ एक लुकआउट नोटिस जारी है. जब मैं कश्मीर वापस लौटा तो मैंने इसकी वजह जानने के लिए अधिकारियों से बात करने की कोशिश की. मेरे ख़िलाफ़ कोई जांच भी पेंडिंग नहीं थी, लेकिन मुझे कोई जानकारी नहीं दी गई."

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राना अय्यूब
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राना अय्यूब और आकार पटेल का मामला

मार्च के महीने में अमेरिकी अख़बार 'वॉशिंगटन पोस्ट' के लिए लिखने वाली पत्रकार राना अय्यूब को मुंबई एयरपोर्ट पर विदेश जाने से रोक दिया गया.

वे उस वक़्त ब्रिटेन के लिए फ़्लाइट लेने वाली थीं. उन्हें 'इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर जर्नलिस्ट्स' के एक इवेंट में भाषण देने के लिए जाना था.

राना अय्यूब को कुछ दिनों बाद विदेश जाने की इजाजत दे दी गई, लेकिन इसके लिए उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा. अदालती लड़ाई जीतने के बाद ही उन्हें इस यात्रा की मंज़ूरी मिली.

अप्रैल में एमनेस्टी इंडिया के पूर्व चीफ़ आकार पटेल को बेंगलुरु एयरपोर्ट पर अमेरिका जाने से दो बार रोका गया.

इसकी वजह बताई गई कि आकार पटेल के कार्यकाल के दौरान एमनेस्टी इंडिया पर विदेशी मुद्रा अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगा था.

सुरक्षा एजेंसियों ने आकार पटेल को 'फ़्लाइट रिस्क' क़रार दिया. बाद में एक अदालत ने उन्हें कहा कि वे बिना इजाज़त लिए देश छोड़कर नहीं जा सकते हैं.

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अंगद सिंह

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पत्रकार अंगद सिंह के साथ क्या हुआ

अगस्त में एम्मी अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट हो चुके भारतीय मूल के अमेरिकी पत्रकार अंगद सिंह को कथित तौर पर दिल्ली पहुंचते ही न्यूयॉर्क के लिए डिपोर्ट कर दिया गया.

हालांकि इस मामले में भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन अंगद सिंह के परिवार ने दावा किया कि डिपोर्ट किए जाने से पहले उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया गया था.

अंगद सिंह की मां ने ये आरोप लगाया कि उनके साथ ये बर्ताव उनकी डॉक्यूमेंट्रीज़ की वजह से किया गया था. अंगद सिंह ने वाइस न्यूज़ के लिए भारत के कोरोना संकट और किसानों पर ये डॉक्यूमेंट्रीज़ बनाई थी.

प्रोफ़ेसर फिलिपो ने अपना डॉक्टोरल रिसर्च केरल में किया है

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प्रोफ़ेसर फ़िलिपो ओसेला का मामला

इस साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने प्रोफ़ेसर फ़िलिपो ओसेला को डिपोर्ट कर दिया था. वो यूनिवर्सिटी ऑफ़ ससेक्स में एंथ्रोपॉलॉजिस्ट हैं और पिछले 30 सालों से भारत आते रहे हैं.

प्रोफ़ेसर फ़िलिपो ने अपने डिपोर्टेशन को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए इस फ़ैसले को पक्षपातपूर्ण और असंवैधानिक कहा.

उन्होंने दावा किया कि सरकारी अधिकारियों ने उनके साथ अपराधियों जैसा बर्ताव किया और डिपोर्ट किए जाने की कोई वजह भी नहीं बताई.

पिछले हफ़्ते उनके मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत थे और इस आधार पर उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया है.

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जम्मू और कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग़ सिंह

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जम्मू और कश्मीर के डीजीपी का बयान

जम्मू और कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग़ सिंह ने इस साल अगस्त में अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था कि किसी पत्रकार को विदेश जाने से रोकने का फ़ैसला एहतियाती क़दम के तौर पर लिया जाता है ताकि वो बाहर जाकर ज़हरीले विचार न फैला सके.

दिलबाग़ सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, "कुछ पत्रकार हैं जो विदेश गए और वहां जाकर उन्होंने ज़हरीले किस्म के विचार फैलाना शुरू कर दिया. मीडिया वालों के बीच वे जाने-माने नाम हैं. उनमें से कुछ लोग यहां भी हैं. उनकी स्थिति बीच-बीच वाली है, वे न तो दूसरी तरफ़ वाले हैं और न ही जनता के पक्ष में. इसलिए हम एहतियात के तौर पर ऐसे लोगों पर नज़र रखते हैं."

"और उन्हें निगरानी सूची में रखने का ये मतलब है कि उन्हें विदेश यात्रा करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए तो मेरी समझ में ये बात पूरी तरह से वाजिब है. ऐसे मामले पहले भी हुए हैं. हम इसे सार्वजनिक नहीं कर सकते हैं."

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कश्मीर

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कश्मीरी पत्रकारों का डर

विदेश जाने से रोके गए किसी भी कश्मीरी पत्रकार ने अदालत में इसे चुनौती नहीं दी है. उन्हें डर है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें सरकार की नाराज़गी का सामना करना पड़ सकता है.

आकाश हसन कहते हैं कि उन्हें अदालतों से कोई उम्मीद नहीं है.

आकाश हसन का कहना है, "हमने अतीत में देखा है कि अदालतों ने इंसाफ़ देने में कश्मीरी पत्रकारों को निराश किया है. ऐसे वक़्त में जब तीन पत्रकार जेल में बंद हैं और अदालत से उन्हें जमानत नहीं मिल रही है. उन्हें पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट जैसे कड़े क़ानूनों के तहत सलाखों के पीछे रखा गया है, मुझे इन हालात में अदालतों से कोई उम्मीद नहीं लगती है."

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