जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ को लेकर बीबीसी इंटरव्यू में किए दावों पर उठे सवाल

मुकेश शर्मा और मनोज सिन्हा

जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने बीबीसी से ख़ास बातचीत की है. इस बातचीत में उन्होंने कश्मीरी पंडितों पर हो रहे हमलों से लेकर कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद के बदलावों तक पर बात की है.

इंटरव्यू में हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ को नज़रबंद या बंद करने को लेकर भी सवाल किया गया. इस सवाल के जवाब में उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने जो कहा उसे लेकर अब अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता सोशल मीडिया पर लिखकर अपनी आपत्ति जता रहे हैं.

आपत्ति जताने वालों में हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन भी शामिल हैं.

इंटरव्यू में बीबीसी संवाददाता मुकेश शर्मा ने उप राज्यपाल मनोज सिन्हा से पूछा कि 'मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ के साथ वालों का कहना है कि प्रशासन ने उन्हें नज़रबंद करके रखा है और आरोपों का पता भी नहीं है?'

इसके जवाब में मनोज सिन्हा ने कहा कि, ''उन पर तो 2019 में भी पीएसए (पब्लिक सेफ़्टी एक्ट) नहीं लगा था. वो बंद नहीं किए गए हैं. उनके पिता जी की भी दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से हत्या कर दी गई थी. उनके इर्द-गिर्द पुलिस इसलिए रखते हैं ताकि वो सुरक्षित रह सकें. वो खुद तय करें कि वो क्या करना चाहते हैं. हमारी तरफ़ से न वो नज़रबंद हैं और न बंद हैं.

मैं बड़ी ज़िम्मेदारी से और बहुत ज़ोर देकर कह रहा हूं कि वो कहीं भी जाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं. उनके घर पर सुरक्षाकर्मी नहीं तैनात हैं बल्कि उनके घर के आस-पास पुलिसकर्मी तैनात हैं, जिससे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित रहे.''

मीरवायज़ उमर फ़ारूक़

इमेज स्रोत, Getty Images

अब हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस ने जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ की नज़रबंदी पर बयान को ख़ारिज कर दिया है.

हुर्रियत ने अपने बयान में कहा है कि अगर मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ ग़ैर क़ानूनी रूप से नज़रबंद नहीं हैं, तो उन्हें 26 अगस्त को शुक्रवार की तक़रीर की अनुमति दी जाए. हुर्रियत ने मनोज सिन्हा पर जान-बूझकर ग़लत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया है.

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हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस का कहना है कि मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ को पिछले तीन सालों से घर में नज़रबंद करके रखा गया है. साथ ही उन्होंने भारत सरकार पर उन्हें सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोकने का भी आरोप लगाया है.

मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ पर मनोज सिन्हा के जवाब देते हुए इंटरव्यू के छोटे टुकड़े को ट्वीट करते हुए जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सवाल उठाए हैं.

उन्होंने लिखा कि 'उसी तरह मेरे साथियों को महीनों के लिए उनकी सुरक्षा के नाम पर चार अगस्त 2019 को उनके ही घरों में बंद कर दिया गया था. उसी तरह हम हर बार अपने गेट के बाहर ट्रक खड़ा हुआ पाते हैं क्योंकि इनपुट्स से पता चलता है कि गुपकार पर हमला हो सकता है.

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इसके अलावा पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन ने भी उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा को झूठा क़रार दिया है. उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि 'एलजी साहब को तथ्यों की पुष्टि करने की ज़रूरत है. उनके बयान असल सच्चाई नहीं बताते हैं. नेताओं को बंद करने और फिर इनकार करने की पुरानी परंपरा है. ये पिछले तीन दशकों से चल रहा है.'

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बीबीसी हिंदी

मनोज सिन्हा से बातचीत की प्रमुख बातें-

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अनुच्छेद 370 के हटने से क्या हासिल हुआ?

कोई भी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक व्यक्ति न जेल में है, न हिरासत में है. अपराधी के लिए तो जेल बनी ही है तो वे जेल में रहेंगे.

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वीडियो कैप्शन, मनोज सिन्हा इंटरव्यूः जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बोले पाकिस्तान से कश्मीर पर बात नहीं होगी
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प्रशासन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर नकेल कस रहा है जिससे वे आवाज़ न उठा सकें, जैसे ख़ुर्रम परवेज़ के बारे में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है?

ऐसे लोग जो मानवाधिकार के नाम पर आईएसआई के लिए काम करते हैं, टारगेट आइडेंटिफ़ाई करते हैं, जिनके ख़िलाफ़ प्रमाण है कि इस हत्या में फलाँ आतंकवादी को सूचना उन्होंने ही दी उनके ख़िलाफ़ एनआईए ने जाँच की है.

ख़ुर्रम परवेज़ के मामले में सात लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट 23 मई को फ़ाइल कर दी है.

अब अगर ये लोग मानवाधिकार के झंडाबरदार हैं तो भगवान बचाए. ये सब कुछ एनआई के पास रिकॉर्ड पर है. अगर किसी को लगता है कि उनके साथ गलत हुआ है तो वो न्यायपालिका जाने के लिए स्वतंत्र हैं.

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महबूबा मुफ़्ती कहती रही हैं कि जब तक पाकिस्तान से बातचीत नहीं होती तब तक कश्मीर में स्थाई शांति नहीं हो सकती?

ये उनकी राय है, मगर मैं संतुष्ट हूँ कि अगर बात करनी है तो यहाँ के लोगों से बात होगी. यहाँ के नौजवानों से बात करनी है, पाकिस्तान से बात करने की न ज़रूरत समझते हैं , न उससे कुछ होने वाला है. यहाँ के लोग जब चाहेंगे तब बात करेंगे.

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अब घाटी में पत्थरबाज़ी या हड़ताल नहीं होती मगर ये स्वेच्छा से है या सिर्फ़ डर से?

घाटी में नागरिक और नौजवान इन बातों से अब ऊब गए हैं और वो देश के लोगों के साथ जुड़ना चाहते हैं, थोड़ी संख्या में तत्व हैं जो पड़ोसी के इशारे पर काम करते हैं और इस तरह की बातें फैलाते हैं.

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